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मोदी की अपील में नैतिक बल गायब, पाखंड भरपूर

ईरान और अमेरिका-इज़रायल के बीच छिड़े युद्ध के ठीक 72वें दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इल्हाम हुआ कि इस युद्ध से पैदा हुए वैश्विक संकट की चपेट में भारत भी आ रहा है।

मोदी की अपील में नैतिक बल गायब, पाखंड भरपूर
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अनिल जैन

प्रधानमंत्री ने तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में एक सरकारी कार्यक्रम में कहा कि ऊर्जा बचाने के लिए लोगों को वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने को तरज़ीह देनी चाहिए, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर पेट्रोल-डीजल की खपत और रसोई ईंधन के इस्तेमाल में कटौती करनी चाहिए। उन्होंने लोगों से तेल कम खाने, शादी-विवाह समारोहों में सादगी बरतने और खेतों में रासायनिक खाद का उपयोग कम करने की अपील भी की।

ईरान और अमेरिका-इज़रायल के बीच छिड़े युद्ध के ठीक 72वें दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इल्हाम हुआ कि इस युद्ध से पैदा हुए वैश्विक संकट की चपेट में भारत भी आ रहा है। युद्ध शुरू होने के तत्काल बाद राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेता और तमाम आर्थिक व सामरिक विशेषज्ञ जब इस संकट को लेकर भारत सरकार को आगाह कर रहे थे तो प्रधानमंत्री सहित उनकी सरकार के तमाम मंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी के बाद बहादुर प्रवक्ता ऐसी नसीहतों की खिल्ली उड़ा रहे थे। पांच राज्यों में धुआंधार चुनाव प्रचार करते हुए मोदी कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों पर लोगों को अनावश्यक रूप से डराने का आरोप लगा रहे थे। वे देश में किसी भी तरह के संकट को नकारते हुए देश की आर्थिक मजबूती का दावा कर रहे थे। पांच राज्यों के चुनाव प्रचार से निवृत्त होने के बाद अब मोदी ने चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों से निबटने के लिए सात सूत्रीय अपील देशवासियों से की है।

प्रधानमंत्री ने तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में एक सरकारी कार्यक्रम में कहा कि ऊर्जा बचाने के लिए लोगों को वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने को तरज़ीह देनी चाहिए, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर पेट्रोल-डीजल की खपत और रसोई ईंधन के इस्तेमाल में कटौती करनी चाहिए। उन्होंने लोगों से तेल कम खाने, शादी-विवाह समारोहों में सादगी बरतने और खेतों में रासायनिक खाद का उपयोग कम करने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि विदेशी मुद्रा बचाने के लिए लोगों को कम से कम सोना तो एक साल बिल्कुल भी नहीं खरीदना चाहिए। 'लोकल फॉर वोकल' का अपना घिसा-पिटा जुमला दोहराते हुए उन्होंने स्वदेशी उत्पादों का ज्यादा इस्तेमाल करने ओर विदेश यात्राओं से बचने पर भी जोर दिया।

ये सारी बातें प्रधानमंत्री ने अगले दिन अपने गृह राज्य गुजरात के वड़ोदरा में भी एक रैली को संबोधित करते हुए कही। प्रधानमंत्री की इस अपील या उनकी नसीहतों में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे असहमत हुआ जा सके। वैसे भी सादगी, संयम, अपरिग्रह और मितव्ययिता जैसे जीवन मूल्य सिर्फ किसी संकट के समय ही क्यों, हमेशा ही अपनाए जाने चाहिए। मगर सोचने वाली बात यह है कि ये सारे मूल्य लोगों से अपनाने की अपील कौन कर रहा है और जो कर रहा है उसकी अपील में कोई नैतिक बल है भी या नहीं?

यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि जिन कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री ने यह अपील देश के लोगों से की, उन कार्यक्रमों में लोगों की भीड़ जुटाने के लिए हजारों निजी और सरकारी बसों का इस्तेमाल किया गया। यही नहीं, ऐसी अपील करने से पहले व बाद में मोदी ने हैदराबाद, जामनगर, सोमनाथ और वड़ोदरा में रोड शो किए, जिनमें महज दो किलोमीटर प्रति लीटर पेट्रोल-डीजल की खपत वाली वाली लाखों-करोड़ों रुपये की कीमत वाली दर्जनों गाड़ियां शामिल रहीं। दिलचस्प बात यह भी है कि लोगों को विदेश यात्राओं से बचने की नसीहत देने वाले मोदी खुद शुक्रवार (15 मई) को पांच देशों की यात्रा पर जाने वाले हैं।

मोदी की बेहद खर्चीली निजी जीवन-शैली की बात न की जाए तो भी सवाल उठता है कि देश के किसी न किसी हिस्से में उनकी रोजाना करोड़ों रुपयों के खर्च से होने वाली रैलियां या रोड शो से अथवा धार्मिक पर्यटन से देश को क्या हासिल होता है? प्रधानमंत्री जिन तथाकथित विकास परियोजनाओं का शिलान्यास या उद्घाटन करने के लिए बेहद महंगी यात्राएं करते हैं, वह उद्घाटन और शिलान्यास ऑनलाइन भी तो हो सकता है। मोदी के प्रचार-प्रेम की हालत यह है कि किसी छोटी-मोटी रेल लाइन का उद्घाटन करना हो या कोई नई ट्रेन शुरू होनी हो, उसे झंडी दिखाने के लिए वे खुद जाते हैं, जबकि यह काम एक समय स्थानीय सांसद, विधायक या रेलवे के अफसर ही कर लेते थे।

मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक करीब 95 देशों की यात्राएं की हैं जिन पर 5000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हुए हैं। कोई नहीं जानता कि उन विदेश यात्राओं का हासिल क्या रहा? उन यात्राओं के दौरान मोदी को कुछ देशों के सर्वोच्च सम्मान के रूप में मेडल और उनके उद्योगपति मित्रों को कारोबारी ठेके जरूर उन देशों से मिल गए लेकिन एक साल पहले जब पहलगाम में आतंकवादी हमला हुआ और उसके बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ 'ऑपरेशन सिंदूरÓ के नाम से सैन्य कार्रवाई की तब भारत के पक्ष में बोलने के लिए कोई देश सामने नहीं आया। दुनिया भर को भारत का पक्ष बताने और उसका समर्थन हासिल करने के लिए सांसदों के प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों में भेजने पड़े। उस खर्चीली कवायद का नतीजा भी शून्य रहा।

सवाल है कि प्रधानमंत्री फिजूलखर्ची रोकने और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए इतने ही फ़िक्रमंद हैं तो अपनी निरर्थक विदेश यात्राओं पर विराम क्यों नहीं लगाते? जिन देशों से कोई व्यापारिक अथवा सामरिक समझौते होने होते हैं, उन पर उन देशों में स्थित भारतीय राजदूत भी हस्ताक्षर कर सकते हैं। आखिर राजदूत होते किसलिए हैं? लेकिन छोटे से छोटे समझौते पर हस्ताक्षर करने भी पीएम खुद जाते हैं।

हकीकत यह है कि मोदी की इन विदेश यात्राओं से न तो भारत में विदेशी निवेश आया, न बेरोजगारी कम हुई, न किसानों की हालत सुधरी, न रुपया मजबूत हुआ। अलबत्ता 80 करोड़ लोगों के लिए पांच किलो मुफ्त सरकारी अनाज पर गुजारा करने की नौबत जरूर आ गई। भारत के कृषि प्रधान देश होने की बात अब इतिहास हो गई है। दलहन-तिलहन के उत्पादन में भारत कभी अव्वल हुआ करता था, लेकिन अब उसे भी आयात करना पड़ रहा है। हालत यह है कि खाने के तेल से लेकर पेट्रोल-डीजल तक के लिए हमें विदेशों पर निर्भर होना पड़ रहा है, जबकि तेल के भंडार भारत में भी भरपूर हो सकते थे, परन्तु भारत की सबसे बड़ी तेल व गैस उत्पादक कंपनी तेल एवं प्राकृतिक गैस कंपनी (ओएनजीसी) की हालत जान-बूझकर खराब की गई, ताकि तेल और गैस उत्पादन का काम निजी क्षेत्र में फल-फूल सके। हां, पिछले 12 वर्षों में गोरक्षा के नाम पर दंगे करते, निरीह लोगों को प्रताड़ित करते और वोट मांगते हुए भारत बीफ निर्यात में ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया के बाद अपना तीसरा स्थान बनाने में जरूर कामयाब हो गया है। यद्यपि इसके बावजूद हमारे विदेशी मुद्रा भंडार की हालत ठीक नहीं है।

पिछले 12 साल में देश भर में शहरों, कस्बों, गांवों, रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों के नाम बदलने का काम भी खूब हुआ है; और अभी भी हो रहा है, जिन पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं। इसके अलावा पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर प्राचीन धार्मिक स्थलों को पर्यटन केंद्र में तब्दील करने का जुनून भी भाजपा की सरकारों पर सवार है। करोड़ों-अरबों रुपये के खर्च से होने वाली इन फ़िज़ूल कवायदों से आखिर देश को क्या हासिल हुआ है?

यह सब कहने का आशय यही है कि प्रधानमंत्री जिस धरातल पर खड़े होकर लोगों से सादगी अपनाने और फ़िजूलखर्ची से बचने की अपील कर रहे हैं, वह धरातल नैतिक रूप से बेहद कमजोर है। अगर उनकी अपील में जरा भी नैतिक बल होता तो उनकी पार्टी के प्रवक्ताओं को और उनकी सरकार के प्रचारतंत्र का हिस्सा बन चुके मीडिया को जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी द्वारा उनके समय में की गई ऐसी अपीलों की याद नहीं दिलानी पड़ती। नेहरू ने 1962 में चीन के हमले का सामना करने के दौरान देश के लोगों से पैसा और अपने आभूषण दान करने की अपील की थी तो सबसे पहले उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने 367 ग्राम सोने के अपने आभूषण देश को समर्पित किए थे। इसका असर यह हुआ था कि देश भर की महिलाओं ने अपने आभूषण, यहां तक कि मंगलसूत्र भी नेशनल डिफेंस फंड में दान कर दिए थे।

इसके बाद सन् 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के चलते जब देश में खाद्यान्न संकट पैदा हुआ था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन सोमवार को एक समय उपवास करने की अपील की थी। यह अपील करने से पहले शास्त्री जी ने अपने परिवार में इस नियम का पालन करवाया था। इसी से उनकी अपील को नैतिक बल मिला था और समूचे देश ने उनकी अपील पर अमल किया था। इसी तरह 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय इंदिरा गांधी ने भी लोगों से अपने खर्च कम करने और बिजली बचाने की अपील की थी। हालांकि उन्होंने लोगों से पैसा या सोना दान करने की अपील नहीं की थी, फिर भी लोगों ने बढ़-चढ़ कर नेशनल डिफेंस फंड में पैसा दान किया था। अफसोस की बात है कि मोदी या उनकी सरकार ने अपनी ओर से देश के सामने कभी कोई ऐसी मिसाल पेश नहीं की, जिससे लोग प्रेरित होकर उनकी अपील पर खुशी-खुशी अमल करें। कुल मिलाकर मोदी की अपील उनकी नाकामियों का इक़बालिया बयान है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


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