युद्ध को लेकर मोदी का देश को डराने वाला संदेश
देश में जहां भी और जब भी चुनाव होते हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दूसरे सारे काम छोड़कर अपनी भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार में जुट जाते हैं

- अनिल जैन
प्रधानमंत्री ने युद्ध को लेकर लोकसभा में करीब 35 मिनट का लिखित भाषण दिया। उनका यह भाषण ऐतिहासिक रहा। वह इस मायने में कि प्रधानमंत्री के रूप में उनका संसद में यह पहला लिखित भाषण था। ऐतिहासिक इसलिए भी कि यह पहला मौका रहा जब उन्होंने अपने पूरे भाषण में कांग्रेस या जवाहरलाल नेहरू की कर्कश आलोचना करना तो दूर, उनका नाम तक नहीं लिया। उनका भाषण सराहनीय भी रहा।
देश में जहां भी और जब भी चुनाव होते हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दूसरे सारे काम छोड़कर अपनी भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार में जुट जाते हैं और इस सिलसिले में वे धार्मिक पर्यटन भी करना नहीं भूलते। उस दौरान वे आम तौर पर विदेश यात्राओं पर भी नहीं जाते हैं और यहां तक कि संसद का सत्र चल रहा होता है तो वे वहां महत्वपूर्ण चर्चाओं के दौरान भी उपस्थित नहीं रहते। इस बार भी पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के दौरान वे चुनावी रैलियों में व्यस्त हैं। हालांकि युद्ध शुरू होने के 23 दिन बाद उन्होंने युद्ध को लेकर अपनी खामोशी तोड़ी और चुनावी रैलियों में से कुछ समय चुराकर अपनी सुरक्षा की परवाह किए बगैर 23 मार्च को संसद में नमूदार हुए।
प्रधानमंत्री ने युद्ध को लेकर लोकसभा में करीब 35 मिनट का लिखित भाषण दिया। उनका यह भाषण ऐतिहासिक रहा। वह इस मायने में कि प्रधानमंत्री के रूप में उनका संसद में यह पहला लिखित भाषण था। ऐतिहासिक इसलिए भी कि यह पहला मौका रहा जब उन्होंने अपने पूरे भाषण में कांग्रेस या जवाहरलाल नेहरू की कर्कश आलोचना करना तो दूर, उनका नाम तक नहीं लिया। उनका भाषण सराहनीय भी रहा, क्योंकि ईरान पर इज़रायल और अमेरिका के हमले के परिणामस्वरूप शुरू हुए युद्ध के 23 दिन बाद ही सही, उन्होंने स्वीकार किया कि इस युद्ध की वजह से भारत के सामने भी चुनौती आ खड़ी हुई है, जिसका हमें एकजुट होकर मुकाबला करना है।
मोदी का यह संसदीय संबोधन एक तरह से राष्ट्र के नाम संदेश भी था और साथ ही विपक्षी दलों के नाम, देश की नौकरशाही के नाम व युद्ध के समय जमाखोरी करने वालों के नाम भी संदेश था। अपने इस संबोधन में उन्होंने अपनी सरकार की विदेश नीति की भी खूब सराहना की। वैसे प्रधानमंत्री का यह संबोधन जितना सराहनीय और ऐतिहासिक रहा, उससे कहीं ज्यादा डरावना भी रहा क्योंकि उन्होंने कहा कि 'जैसे हमने कोरोना महामारी की चुनौती का मुकाबला किया था, वैसे ही इस चुनौती का भी मुकाबला करेंगे।Ó सब जानते हैं कि कोरोना की चुनौती का मुकाबला मोदी सरकार ने किस तरह किया था!
गौरतलब है कि अपने इस भाषण से पहले तो पीएम मान ही नहीं रहे थे कि युद्ध की वजह से भारत में भी रसोई गैस और पेट्रोल का संकट खड़ा हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था पर भी वे किसी तरह का संकट होने से इनकार कर रहे थे, बावजूद इसके कि देश-दुनिया के तमाम अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ इस बारे में आगाह कर रहे थे। चूंकि प्रधानमंत्री नहीं मान रहे थे, लिहाजा उनकी सरकार, उनकी पार्टी और उसके प्रचार तंत्र का हिस्सा बन चुका मीडिया भी नहीं मान रहा था कि कोई संकट है।
हालांकि युद्ध शुरू होने के एक सप्ताह बाद ही देश के विभिन्न हिस्सों में रसोई गैस यानी एलपीजी सिलेंडर के लिए गैस एजेंसियों के दफ्तरों और गोदामों पर लोगों की लाइनें लगनी शुरू हो गई थीं। लाइनों में खड़े लोगों के मार-पीट और धक्का-मुक्की करने, बीमार होने और मरने की खबरें आने लगी थीं। होटल, रेस्तरां और धार्मिक स्थलों पर चलने वाली नि:शुल्क भोजनशालाएं भी एलपीजी सिलेंडर के अभाव में बंद होने की खबरें आ रही थीं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम की चुनावी रैलियों में लगातार इस संकट को नकारते हुए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर अफवाह फैलाने और लोगों को डराने का आरोप लगा रहे थे। ऐसा करते हुए वे देश की मौजूदा समस्याओं के लिए नेहरू को जिम्मेदार ठहराना भी नहीं भूल रहे थे। यही काम टीवी चैनलों की डिबेट में उनकी पार्टी के वाचाल प्रवक्ता भी कर रहे थे और टीवी चैनलों के एंकर व सत्ता की दलाली करने वाले पत्रकार उनके सुर में सुर मिला रहे थे।
छह साल पहले कोरोना महामारी के वक्त भी प्रधानमंत्री ने ऐसा ही किया था। उस समय भी जब केरल में कोरोना का पहला मामला सामने आया था तब राहुल गांधी तथा कई विशेषज्ञ सरकार को ऐहतियात बरतने के लिए आगाह कर रहे थे, परन्तु सरकार के तमाम मंत्री और टीवी चैनलों के उजड्ड एंकर राहुल गांधी का मज़ाक उड़ाते हुए उन पर लोगों को डराने का आरोप लगा रहे थे। उस समय तक दुनिया के तमाम देशों ने अपने यहां भीड़ भरे कार्यक्रमों पर रोक लगा दी थी, लेकिन मोदी अपने गृह राज्य गुजरात में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सम्मान में 'नमस्ते ट्रम्पÓ के भव्य आयोजन में व्यस्त थे। उस आयोजन में करीब 50 हजार प्रवासी भारतीय भी अमेरिका से भारत आए थे, जिनमें से अधिकांश अपने साथ 'कोरोनाÓ भी लाए थे। अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में करीब सवा लाख लोगों की मौजूदगी में वह कार्यक्रम संपन्न हुआ था। उस मौके पर मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ अहमदाबाद की सड़कों पर रोड शो भी किया था।
उस समय तक देश में कोरोना महामारी ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे, जिसकी खबरें भारतीय मीडिया में तो कम लेकिन विदेशी मीडिया में प्रमुखता से आने लगी थीं। उस कार्यक्रम से निबटने के बाद ही प्रधानमंत्री मोदी अलर्ट हुए थे। पहले उन्होंने एक दिन के 'जनता कर्फ्यूÓ और लोगों से ताली-थाली बजाने का आह्वान किया था और फिर देशव्यापी लॉकडाउन घोषित कर दिया था। देश भर में हाहाकार मचा हुआ था। कोरोना वायरस से प्रभावित लोग इलाज के लिए मारे-मारे घूम रहे थे, जबकि सरकारी अस्पतालों में इलाज के पर्याप्त इंतज़ाम नदारद थे। ऑक्सीजन सिलेंडरों की जमकर कालाबाजारी हो रही थी।
इलाज के लिए एक से उस दूसरे अस्पताल भटक रहे लोगों और दूध, फल, सब्जी बेचने वालों पर पुलिस डंडे बरसा रही थी। महानगरों और बड़े शहरों में काम करने वाले प्रवासी मजदूर अपने बच्चों और बुजुर्गों के साथ भूखे-प्यासे पैदल ही सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर अपने घर-गांव लौट रहे थे। पीड़ित और परेशान लोगों की तकलीफें सुनने वाला कहीं कोई नहीं था। देश एक तरह से पुलिस स्टेट में तब्दील हो चुका था लेकिन सरकारी तंत्र, सत्तारूढ़ पार्टी और उसका इकोसिस्टम मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम उस वैश्विक महामारी के लिए भी एक समुदाय विशेष को जिम्मेदार बताते हुए उसके खिलाफ नफ़रत फैलाने के अपने पसंदीदा घृणित खेल में मगन था।
उसके कुछ समय बाद कोरोना की दूसरी लहर के समय पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में चुनाव चल रहे थे। उस समय भी लोग उचित इलाज के अभाव में मर रहे थे और महीनों तक चले देशव्यापी लॉकडाउन ने आर्थिक रूप से गरीब और मध्यवर्ग की कमर तोड़ दी थी। इस स्थिति से बेफ़िक्र होकर मोदी बंगाल की रैलियों में रवींद्रनाथ टैगोर जैसा भेष बनाकर 'दीदी ओ दीदीÓ करते हुए वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की खिल्ली उड़ा रहे थे। बाद में कोरोना की वैक्सीन को लेकर भी मोदी सरकार का रवैया बेहद गैरजिम्मेदाराना रहा था। उन्होंने देश-दुनिया में वाह-वाही बटोरने के लिए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों पर दबाव बनाकर जल्दबाजी में वैक्सीन तैयार करवा कर लोगों को अनिवार्य रूप से लगवाई थी, जिसके दुष्परिणाम देश की जनता आज तक भुगत रही है। बच्चे और नौजवान हार्टअटैक से असमय मौत का शिकार हो रहे हैं। यह मामला जनहित याचिकाओं के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में भी गया है और सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कोविड-19 वैक्सीन के गंभीर दुष्प्रभावों और मौतों के मामलों में पीड़ितों को मुआवजा देने के निर्देश दिए हैं, लेकिन इससे बचने के लिए सरकार झूठ बोल रही है कि वैक्सीनेशन का कार्यक्रम ऐच्छिक था, यानी सरकार का कोई दबाव नहीं था और लोगों ने स्वेच्छा से वैक्सीन लगवाई थी।
चूंकि अभी पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध से पैदा हुए संकट को लेकर प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि हम इस संकट का मुकाबला भी कोरोना के संकट की तरह करने में सफल होंगे, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी सरकार किस तरह इस संकट का मुकाबला करेगी। खुद प्रधानमंत्री इस संकट को लेकर कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विपक्ष इस संकट पर संसद में चर्चा कराने की मांग कर रहा है लेकिन सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस संकट पर चर्चा के लिए जो सर्वदलीय बैठक पिछले सप्ताह बुलाई थी, उस बैठक में उन्होंने राजधानी में होते हुए भी शामिल होना उचित नहीं समझा। युद्ध समाप्त कराने को लेकर कूटनीतिक मोर्चे पर भी भारत सरकार ने अपनी जो फजीहत कराई है, वह तो एक अलग ही कहानी है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)


