मोदी-शाह बनाम इंडिया गठबंधन!
कांग्रेस पहले से ज्यादा अलग थलग पड़ी है तो कथित इंडिया गठबंधन तो छिन्न-भिन्न हो गया है।

- अरविन्द मोहन
चुनाव जीतने के लिए इस सीमा तक के अनीतिक काम करने की जरूरत नहीं है जो बंगाल में मतदाता सूची के संशोधन और असम में विधान सभा सीटों के पुनर्गठन के काम में दिखा। बंगाल में हिंसा मुक्त चुनाव कराना जरूरी था लेकिन चुनाव केंद्र सरकार की निगरानी में कराना जरूरी न था और हजार करोड़ की पेशकश अगर हुमायूं कबीर जैसे अदना नेता को हुई थी तो उसकी जांच और धर-पकड़ की दिशा में भी कदम उठाए जाने थे।
चुनाव जीतने और लड़ने के तौर तरीकों की शिकायत अपनी जगह है लेकिन भाजपा ने हाल में सम्पन्न पांच राज्यों के चुनाव में जैसा प्रदर्शन किया है उसे कांग्रेस के प्रदर्शन से कोई बहुत ऊपर नहीं माना जा सकता। लेकिन आज भाजपा और खास तौर से उसकी मोदी शाह की जोड़ी को इस बार के चुनाव से जो राजनैतिक लाभ हुआ है उसने इस जोड़ी के साथ ही भाजपा के ग्राफ को अब तक के शीर्ष पर पहुंचा दिया है।
दूसरी ओर, कांग्रेस पहले से ज्यादा अलग थलग पड़ी है तो कथित इंडिया गठबंधन तो छिन्न-भिन्न हो गया है। अब हिसाब लगाने वाले यह बता रहे हैं कि मोदी शाह को अभी भी कांग्रेस के पुराने दिनों की स्थिति तक पहुंचने की चुनौती है लेकिन 1967 के बाद कोई पार्टी इतने राज्यों में सरकार में न थी जितनी आज भाजपा है या उसके सहयोगी हैं। 1985 में कांग्रेस लोक सभा में 413 स्थान जीत गई थी लेकिन राजनैतिक ताकत से बहुत बलवान न बनी थी। इस बार यह भी हुआ है कि भाजपा नए चुनाव जितवाने वाले अधिकारियों की टोली को भी पुरस्कृत करने में कोई लिहाज नहीं रखा तो हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में भगदड़ मची है और कांग्रेस केरलम में जीतकर भी नेता चुनने में दंड प्राणायाम कर रही है। असम कांग्रेस का सिरफुटौव्वल बढ़ गया है और अब ममता के पक्षधर भी उनकी तथा तृणमूल सरकार की गलतियां गिनवाने लगे हैं।
यह आलेख चुनावी नतीजों का विश्लेषण नहीं है। न ही इसमें भाजपा और तृणमूल द्वारा अपनाए तौर तरीकों की आलोचना है। इसमें उस प्रसंग की भी चर्चा नहीं होगी कि केरलम और पश्चिम बंगाल में वाम दलों द्वारा गुपचुप ढंग से जगह-जगह भाजपा को समर्थन दिए जाने चर्चा किस मकसद से की जा रही है। यहां असली मुद्दा दो साल से भी कम अवधि में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनैतिक वापसी और सर्वोच्चता है। पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा इसी जोड़ी की अगुआई में उतरी थी और चार सौ पार का नारा दिया था। लेकिन परिणाम आने पर यह जोड़ी मुंह छुपाये रही और उसने चालाकी से भाजपा संसदीय दल में नरेंद्र मोदी को नेता चुनवाने की जगह एनडीए संसदीय दल की बैठक बुलाकर यह औपचारिकता पूरी कराई थी। उसे लग रहा था कि भाजपा की अलग बैठक हुई तो चुनाव प्रदर्शन पर सवाल आएंगे और जवाब देने में मुश्किल आएगी। बल्कि सबसे बड़े उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन ही नहीं बिगड़ा था योगी बनाम अमित शाह की लड़ाई भी ऐसी स्थिति में आ गई थी कि दोनों के लोग एक दूसरे के उम्मीदवारों को हराने में जुटे थे और प्रधानमंत्री की जीत का अंतर काफी कम हो गया था।
इस जोड़ी ने तब की स्थिति चालाकी से संभाली और नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू को भी साथ लाने में सफलता पाई। चंद्रबाबू विकास परियोजनाएं पाकर खुश रहने वाले थे तो उनके साथ अभी तक ऐसा ही व्यवहार रखा गया है जबकि पहले उनको भाजपा विरोध के चलते जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। नीतीश कुमार को मैनेज करने और ठिकाने लगाने का काम तो उससे भी ज्यादा कुशलता से हुआ और आज इस जोड़ी का प्रताप जितना बंगाल जीतने से बढ़ा है उतना ही बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व में अपनी सरकार बनवा लेने से भी बढ़ा है। योगी की चुनौती को सीधे निपटाने का कोई बाहरी प्रयास नहीं दिखा है लेकिन आज योगी की ताकत लोक सभा वाली स्थिति की नहीं है। ऐसा उनकी सत्ता में गिरावट से नहीं हुआ है, शाह और मोदी की ताकत बढ़ने से हुआ है और पार्टी के अंदर नितिन गडकरी या राजनाथ सिंह जैसे लोग अब गलती से भी कोई बागी स्वर नहीं उठाते। सबसे बड़ा फर्क नितिन नवीन जैसे व्यक्ति को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर संघ को उसकी औकात में रहने का संदेश देकर हुआ है। यह शुरुआत जेपी नड्डा ने ही कर दी थी लेकिन फाइनल तो अमित शाह और मोदी जी ने ही किया है।
दूसरी ओर लोक सभा चुनाव के बाद बम बम कर रहे विपक्ष की तरफ से अब यह फुसफुसाहट भी नहीं आती कि अब मोदी सरकार गिरने वाली है। अब जदयू या तेलगु देशम पार्टी के कभी साथ छोड़ने की कल्पना भी दूर हो गई है। जदयू तो कभी भी भाजपा में समा सकती है। इसमें मोदी शाह की चालाकियों से ज्यादा महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा और बिहार चुनाव में मिली पराजय का हाथ है। कई जगह साफ दिखती विपक्षी जीत भी हार में बदली और इसमें मोदी शाह के प्रबंध कौशल से ज्यादा विपक्षी कुप्रबंधन का हाथ रहा। और दिन ब दिन इंडिया गठबंधन बेमानी और निष्क्रिय होता गया है। जाहिर तौर पर इसमें कांग्रेस की भूमिका सबसे बड़ी थी लेकिन ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल जैसे लोगों ने भी इसे ध्वस्त करने में कम बड़ी भूमिका नहीं निभाई है और बंगाल का चुनाव हारते ही सबको दिखने लगा कि इस कमजोर स्थिति में अगर पूरा इंडिया गठनबंधन साथ न भी लड़ता और कांग्रेस तृणमूल ही साथ होते तो कहानी कुछ और होती। और हार के बाद एकजुटता की बात सामने आए इससे पहले सिरफुटौव्वल बढ़ गया। तमिलनाडु के परिणामों और सरकार गठन ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई और अब द्रमुक गठबंधन में रहेगा यह भी संशय के घेरे में आ गया है। वह कुछ कम महत्व की चीज है। असली सवाल उत्तर प्रदेश और पंजाब में एकता का है जहां जल्दी सरकार बदलने के हालात हैं या चुनाव होंगे।
अब मोदी शाह की जोड़ी को हम चाहें तो कुछ नैतिकता जरूर पढ़ा सकते हैं कि चुनाव जीतने के लिए इस सीमा तक के अनीतिक काम करने की जरूरत नहीं है जो बंगाल में मतदाता सूची के संशोधन और असम में विधान सभा सीटों के पुनर्गठन के काम में दिखा। बंगाल में हिंसा मुक्त चुनाव कराना जरूरी था लेकिन चुनाव केंद्र सरकार की निगरानी में कराना जरूरी न था और हजार करोड़ की पेशकश अगर हुमायूं कबीर जैसे अदना नेता को हुई थी तो उसकी जांच और धर-पकड़ की दिशा में भी कदम उठाए जाने थे, सिर्फ पवन खेड़ा के पीछे फौज लगाना अनुचित था। उनसे ज्यादा सलाह की जरूरत विपक्षी नावाबों और महारानियों को है। अपने-अपने तौर-तरीके बदलने और बाहर नहीं तो मोदी शाह से सीखने, संघ जैसा कोई बड़ा एजेंडा मानकर उसके इर्द-गिर्द राजनीति करने और किसी स्तर पर कार्यकर्ताओं की भी पूछ वाला तंत्र बनाने की जरूरत है। राहुल तो लोगों में जाते हैं, मुद्दे अच्छे से उठाते हैं लेकिन बाकी कांग्रेसी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। और अखिलेश, तेजस्वी और उद्धव ठाकरे जैसे लोग तो चार कदम खुले में चलने से भी बचते हैं। ऐसे में मोदी शाह का मुकाबला असंभव है।


