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मोदी जी सवालों से परे : एपस्टीन फाइलों का डर सामने आया!

मोदी जी को सवालों से परे बताने की शुरुआत हो गई है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को नया काम दिया गया है

मोदी जी सवालों से परे : एपस्टीन फाइलों का डर सामने आया!
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राष्ट्रीय सुरक्षा छोटी-मोटी घटनाओं की तरह बना दी। किसी पर कोई असर नहीं। लेकिन परिस्थितियां तेजी से बदलीं। जब आप लापरवाह हो जाते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जवाबदेही से बच जाते हैं। तब कहीं और बड़ी गलतियां करते हैं। और उनमें कुछ ऐसे मामले होते हैं जो अन्तरराष्ट्रीय स्तर के होते हैं। वहां भक्त और गोदी मीडिया नहीं बचा सकते।

मोदी जी को सवालों से परे बताने की शुरुआत हो गई है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को नया काम दिया गया है। मोदी जी सर्वोपरि हैं। उनसे सवाल नहीं हो सकते।

अचानक ऐसा क्या हो गया कि प्रधानमंत्री मोदी को सवालों से ऊपर बताया जाए? एपस्टीन फाइल? और क्या हो सकता है? राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे बीजेपी संघ के कोर इशु (सबसे बड़े सवाल) का तो मोदी जी पर कोई असर नहीं पड़ा। यह बहुत खतरनाक बात है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को इतना हल्का बना दिया कि एक के बाद एक कई चूकें, राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरियां सामने आ गईं मगर पार्टी, संघ, भक्त, गोदी मीडिया किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उल्टे सेना पर, सेनाध्यक्ष पर ही दोष डाल दिया गया।

याद कीजिए, लद्दाख में जब चीनी सेना ने गलवान में घुसकर 20 भारतीय सैनिकों को शहीद कर दिया था तो गोदी मीडिया ने लद्दाख जाकर वहां से रिपोर्टिंग की कि चीनियों को रोकने का काम सेना का था सरकार क्या कर लेती?

और सेना के पास उन्हें रोकने गोली चलाने के अधिकार ही नहीं थे यह 2020 में कुछ ही समय बाद अगस्त में तब सामने आ गया जब पूर्वी लद्दाख में ही कैलाश रिज पर चीन के चार टैंक भारतीय सीमा में बढ़े आ रहे थे। साथ में चीन के पैदल सैनिक थे। और भारत के थल सेना प्रमुख जनरल मुकुंद नरवणे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से निर्देश मांगते रहे कि बताइए क्या करना है? मगर ढाई-तीन घंटे तक उन्हें कोई जवाब नहीं दिया गया। टैंक केवल आधा किलो मीटर की दूरी पर रह गए। और उसके बाद प्रधानमंत्री का जवाब आया जो उचित समझो वह करो!

यहां भी प्रधानमंत्री मोदी को इशु नहीं बनाया गया। उल्टे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में राष्ट्रीय सुरक्षा में राजनीतिक नेतृत्व की निर्णय लेने की अक्षमता पर सवाल उठाने पर उनके खिलाफ ही पहले एक एफआईआर दर्ज की गई फिर लोकसभा में उनकी सदस्यता रद्द करने और उन्हें राजनीति से ही बाहर करने, चुनाव लड़ने पर हमेशा के लिए रोक लगाने का प्रस्ताव लाया गया। मुद्दा यह था कि जो उचित समझो वह करो कहना था तो तीन घंटे पहले ही क्यों नहीं कह दिया?

हर मामले में प्रधानमंत्री को बचाया गया। श्रेय हर बात का उन्हीं को दिया जाता है। याद रखिए भाजपा सरकार नहीं कहा जाता मोदी सरकार ही कहा जाता है। लेकिन जिम्मेदारी किसी बात की उनकी नहीं है।

पहले गलवान में 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के मामले में नरेटिव बनाया गया कि दोष सेना का। फिर कैलाश रिज (पहाड़ी) के मामले में उसी सेना को नि:सहाय छोड़ दिया गया। जनरल नरवणे ने अपनी किताब में जिसके लिए अब कहा जा रहा है कि वह प्रकाशित ही नहीं हुई मगर यह नहीं कहा जा पा रहा कि लिखी ही नहीं गई में कहा है कि जब तीन घंटे बाद उनसे कहा गया कि जो उचित समझो वह करो तो उन्हें लगा कि जैसे वह एकदम अकेले पड़ गए। अंग्रेजी का एक मुहावरा उन्होंने लिखा है कि -

जैसे हाथ में गर्म आलू दे दिया। मतलब न आप उसे खा सकते हैं, न हाथ में रख सकते हैं, और न फैंक सकते हैं क्योंकि फैंकना अपमान हो जाएगा। किंकर्तव्यविमूढ़! तो राष्ट्रीय सुरक्षा के तमाम मामले हैं जहां प्रधानमंत्री मोदी फैसला नहीं ले सके, कमजोर नजर आए मगर प्रचार के दम पर राष्ट्रीय सुरक्षा को ही महत्वहीन बना दिया गया। गलवान के बाद खुद प्रधानमंत्री के यह कहने पर भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा कि न कोई घुसा है न कोई है! 20 जवान शहीद करके वहीं कब्जा करके बैठ गए। मगर प्रधानमंत्री ने कह दिया कि कोई घुसा ही नहीं।

राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कई घटनाएं हैं। पहलगाम में आतंकवादी कैसे घुस गए? कैसे 26 नागरिकों को मार दिया? कोई जवाब आज तक नहीं मिला। एक साल होने वाला है। हां मरने वालों से यह सवाल जरूर पूछा गया कि तुम वहां गए क्यों थे?

और उसके बाद आपरेशन सिंदूर करने पर जब हमारी वायु सेना दिए गए टारगेटों पर निर्णायक वार कर रही थी तो अचानक अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने सीज फायर घोषित कर दिया। हमने तत्काल मान लिया। यहीं वह बात अपने आप साफ हो जाती है कि सेना राजनीतिक नेतृत्व के आधीन है। इसलिए उसने अपने बढ़त के मौके पर भी हमले रोक दिए। और जहाज वापस आने लगे। लेकिन गलवान और कैलाश रिज के मामले जो 2020 में तीन महीने के फासले पर ही हुए कहा गया कि जिम्मेदारी सेना की है। जबकि सेना को चीन के मामले में बिना राजनीतिक नेतृत्व से पूछे गोली चलाने की अनुमति नहीं है। विदेश मंत्री जयशंकर कह चुके हैं कि वह बहुत बड़ी आर्थिक शक्ति है हम उससे कैसे लड़ सकते हैं?

जब मनचाहे कुछ भी कह दो। बेरोजगारी में पकौड़े बनाने की सलाह दे दो। पुलवामा में तो 40 जवान शहीद हुए थे। यह घटना भी गलवान, कैलाश रिज से एक साल पहले ही 2019 में हुई थी। उस समय वहां के राज्यपाल सतपाल मलिक से कह दिया चुप रहो! आज तक उसका भी पता नहीं चला कि इतना आरडीएक्स कैसे आया। 7 साल हो रहे हैं। जांच में क्या निकला?

राष्ट्रीय सुरक्षा छोटी-मोटी घटनाओं की तरह बना दी। किसी पर कोई असर नहीं। लेकिन परिस्थितियां तेजी से बदलीं। जब आप लापरवाह हो जाते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जवाबदेही से बच जाते हैं। तब कहीं और बड़ी गलतियां करते हैं। और उनमें कुछ ऐसे मामले होते हैं जो अन्तरराष्ट्रीय स्तर के होते हैं। वहां भक्त और गोदी मीडिया नहीं बचा सकते।

एपस्टीन फाइल ऐसा ही मामला है। खुद प्रधानमंत्री मोदी का नाम उसमें आ चुका है। और कांग्रेस मांग कर चुकी है कि खुद प्रधानमंत्री मोदी को सामने आकर इसका जवाब देना चाहिए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लोकसभा में इसे सत्यापित (अथेंटिकिट) करने को तैयार थे। मगर प्रधानमंत्री मोदी बच गए। लोकसभा के सभापति ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया। जबकि सरकार की तरफ से संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू यह मांग कर रहे थे।

लेकिन यह एपस्टीन फाइल तो मुसीबतों का पिटारा है। अभी तीस लाख फाइलें आई हैं। और इतनी ही और आना बाकी हैं। सब अधिकृत। अमेरिका का न्याय विभाग जारी कर रहा है। मोदी सरकार में मंत्री हरदीप पुरी का नाम आया है। वे स्वीकार भी कर चुके हैं कि इस घृणित सजायाफ्ता यौन अपराधी से वे मिले हैं। कितनी बार? मंत्री तीन-चार बार की तो मान गए। मगर टीएमसी की महुआ मोइत्रा ने फाइलें निकाल दी हैं। जिसमें चार सौ से ज्यादा बार मिले हैं। और विडंबना देखिए कि दुनिया भर में जिन नेताओं के नाम इसमें आए हैं वे इस्तीफे दे रहे हैं। और यहां इस्तीफा तो दूर प्रधानमंत्री मोदी उन्हें जन्मदिन की बधाई दे रहे हैं।

यह खुद को सबसे अलग पार्टी होने की बात करती है। दूसरों में हमेशा कमियां निकालती रहती है। पंडित जवाहर लाल नेहरू को गुजरे हुए 62 साल होने वाले हैं। मगर अभी चार दिन पहले राहुल ने कहा था लोकसभा में आएंगे ही नहीं राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने आए भी नहीं, राज्यसभा में आए और नेहरू के खिलाफ शुरू हो गए। मामला एपस्टीन फाइल में नाम आने का है, राष्ट्रीय सुरक्षा का है, अमेरिका की इकतरफा डील का है।

जो पूरी तरह भारत के खिलाफ जा रही है। कृषि और डेयरी क्षेत्र खुलने से खेती किसानी, पशुपालन के बर्बाद होने की आशंका है, युवाओं की नौकरी का है। मगर प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक सारे कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों ने कुछ नहीं किया और यह परिवार नेहरू गांधी परिवार ऐसा है वैसा से आगे बढ़ ही नहीं पाए।

नेहरू खराब थे ठीक है मगर एपस्टीन फाइल में आपका नाम क्यों है? यही सवाल कोई पूछ न पाए इसीलिए निशिकांत दुबे से कहलवाया गया कि मोदी सब सवालों से ऊपर हैं।

मोदी खुद को नान बायलोजिकल (हम आप जैसे मानव नहीं, बल्कि अवतरित) बता ही चुके हैं। अब उन्हें देवता, भगवान, गॉड बताना शुरू हो गया है। एपस्टीन फाइल का डर बड़ा है!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


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