Top
Begin typing your search above and press return to search.

मोदी अब कभी नहीं पूछेंगे कौन राहुल

एक बार नरेन्द्र मोदी ने अहंकार में पूछने की हिमाकत कर ली कि कौन राहुल, लेकिन अब भूल से भी कभी पूछने का दुस्साहस नहीं करेंगे।

मोदी अब कभी नहीं पूछेंगे कौन राहुल
X

मंगलवार को राहुल गांधी ने संसद से आकाशवाणी तक का कुछ सौ मीटर का फासला ही तय नहीं किया, देश के राजनैतिक माहौल को 360 डिग्री घुमा दिया। नरेन्द्र मोदी तो अपने सार्वजनिक जीवन के 25 साल, सेवा ही संकल्प और ऐसे ही न जाने कितने जुमलों के साथ तैयार बैठे थे कि पूरे देश में प्रचार का फिर से मौका मिलेगा। लेकिन उन पर बेचारगी ऐसी टूटी कि अखबारों के फ्रंट पेज पर विज्ञापनों में तो मोदी दिखे, लेकिन खबरों में राहुल गांधी का प्रदर्शन ही छाया रहा।

एक बार नरेन्द्र मोदी ने अहंकार में पूछने की हिमाकत कर ली कि कौन राहुल, लेकिन अब भूल से भी कभी पूछने का दुस्साहस नहीं करेंगे। उन्हें और पूरे संघी-भाजपाई कुनबे को समझ आ ही चुका है कि कौन राहुल। मंगलवार को एक-दो नहीं छह-छह बार भाजपा को अपने उन प्रवक्ताओं को प्रेस के सामने लाना पड़ा, जो बदजुबानी और कुतर्क करने के लिए ख्यात हैं। क्योंकि इंडिया गठबंधन के सांसदों का संसद से चुनाव आयोग तक पहुंचने के लिए निकाला गया मार्च इस कदर द राहुल गांधी शो में तब्दील हो जाएगा, इसकी कल्पना भाजपा को नहीं थी। पहले तो राहुल गांधी का बैरिकेड पर चढ़कर वहीं से भाजपा के समूचे तंत्र को चुनौती देना कि इस किस्म की तानाशाही देश में चलने नहीं देंगे, फिर राहुल गांधी का प्रियंका गांधी समेत कई और सांसदों के साथ आकाशवाणी के भीतर चले जाना, वहीं बरगद के पेड़ के नीचे बैठना, भूख लगी तो खान चाचा से मंगाया हुआ रोल खाना, कुछ घंटे गुजर जाने के बाद पेड़ के नीचे चटाई बिछाकर बैठना, बीच में मीडिया के जरिए संदेश देना कि हम भाजपा और ज्ञानेश कुमार को बख्शेंगे नहीं, फिर देर शाम राहुल को जबरन हिरासत में लेती दिल्ली पुलिस, उनका अहिंसक विरोध दर्ज करते हुए बस की खिड़की से बाहर निकलने की कोशिश करना, किंग्सवे कैंप में राहुल को कैद रखना और प्रियंका गांधी का ऊंचे गेट पर चढ़कर उसे खोलना और फिर रात ग्यारह बजे के आसपास राहुल का हाथ में संविधान की किताब दिखाते हुए रिहा होना, यह सब एक नहीं हजारों-लाखों-करोड़ों आवाज़ों का चीख-चीख कर बताना है कि कौन हैं राहुल, कहां से मिली है उन्हें संघर्ष और प्रतिरोध की ऐसी ताकत। अब भाजपा प्रवक्ता इस झूठ को सौ बार भी क्यों न बोल लें कि राहुल गांधी को लॉन्च करने के लिए यह सब विरोध का नाटक हो रहा है, कि राहुल गांधी चुनाव चोरी पर झूठ बोल रहे हैं, कि ज्ञानेश कुमार ने भाजपा को जिताने के लिए कोई हेरा-फेरी नहीं की, अब जनता भाजपा की बात को न सुन रही है, न मान रही है। कुछेक पत्रकार अब भी किन्तु-परन्तु करते हुए राहुल गांधी को गलत और नरेन्द्र मोदी-ज्ञानेश कुमार को सही साबित करने में लगे हैं, लेकिन वो भी जानते हैं कि भाजपा ज्यादा वक्त तक उनकी जेब भारी नहीं रख पाएगी।

मंगलवार को राहुल गांधी ने संसद से आकाशवाणी तक का कुछ सौ मीटर का फासला ही तय नहीं किया, देश के राजनैतिक माहौल को 360 डिग्री घुमा दिया। नरेन्द्र मोदी तो अपने सार्वजनिक जीवन के 25 साल, सेवा ही संकल्प और ऐसे ही न जाने कितने जुमलों के साथ तैयार बैठे थे कि पूरे देश में प्रचार का फिर से मौका मिलेगा। लेकिन उन पर बेचारगी ऐसी टूटी कि अखबारों के फ्रंट पेज पर विज्ञापनों में तो मोदी दिखे, लेकिन खबरों में राहुल गांधी का प्रदर्शन ही छाया रहा।

मोदी ने दिल्ली के सरोजिनी नगर में श्री विनायक मंदिर में पुजारी के साथ पूजा करते हुए अपना वीडियो भी बनवाया। लेकिन उस वीडियो में भी नजर आ गया कि एक सामने से शॉट लिया गया, एक ऊपर से, एक भगवान की मूर्ति के पीछे से ताकि मोदी पूरी तरह फ्रेम में आएं, क्लोज़अप शॉट, स्लो मोशन शॉट सब अच्छे से लेकर वीडियो में डाले गए। इस तरह पूजा करते हुए मोदी की अच्छी पिक्चर बन गई। वो तो पुजारी को साथ रखना मजबूरी रही होगी, वर्ना मोदी अपने साथ किसी और फ्रेम में बर्दाश्त नहीं करते हैं। लेकिन इस सबके बावजूद मोदी की फिल्म फ्लॉप ही रही। एक तो यही हास्यास्पद बात लगी कि आप इस बात की खुशी मना रहे हैं कि सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे हुए। 7 अक्टूबर 2001 को मोदी पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो अब उसी का ढोल पीटा जा रहा है। आज तक किसी नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री को ऐसा करते हुए नहीं देखा गया। लेकिन मोदी के मन में प्रचार की भूख नहीं, एक अंधा कुआं है, जिसमें जितने फुटेज डालो, वो सब पचा जाते हैं। अभी कुछ समय पहले सबसे ज्यादा वक्त प्रधानमंत्री रहने का भी जश्न मनाया था, वो भी झूठ की बुनियाद पर, क्योंकि नेहरूजी जितना लंबा कार्यकाल तो मोदी का नहीं हुआ है। अब 25 साल पद पर रहने की खुशी मनाई जा रही थी, उसमें भी रंग में भंग पड़ गया। क्योंकि चुनाव चोरी का कच्चा-चि_ा खुलने लगा है।

जंतर-मंतर पर तो वोट चोरी के खिलाफ आंदोलन लगातार चल ही रहा है। 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी भी एक नया आंदोलन यहीं से शुरु करेगी। लेकिन उससे पहले छह अक्टूबर को इंडिया गठबंधन के सांसद संसद भवन से चुनाव आयोग तक मार्च निकालेंगे यह फैसला 30 सितंबर की बैठक में ही सुना दिया गया था। भाजपा को लगा था कि हमेशा की तरह सांसदों को कुछ दूर चलते ही पुलिस हिरासत में लिया जाएगा, वो सब बस में बैठकर मीडिया के जरिए अपने विरोध को जारी रखने का संदेश देंगे, और फिर आधे एक घंटे के बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा। इस विरोध की खबरें भी मैनेज कर ली जाएंगी और जनता यही देखकर इत्मीनान कर लेगी कि विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, मतलब लोकतंत्र को मोदी ने अभी पूरी तरह मारा नहीं है। लेकिन राहुल गांधी ने तो बिल्कुल नए अंदाज में विरोध करके दिखा दिया। जैसे आजादी की लड़ाई के दौरान ब्रिटिश सरकार आंदोलनकारियों के तौर-तरीकों को समझ ही नहीं पाती थी, वैसा ही हाल मोदी सरकार का हो गया। राहुल गांधी के विरोध को दर्शाते हुए इंस्टाग्राम पर ढेरों रील्स बन चुकी हैं, लाखों-करोड़ों लोग इन्हें देख रहे हैं, पसंद कर रहे हैं, शेयर कर रहे हैं। जिस जेन ज़ी की जुबान बोलने में मोदी उलझे और फंसे दिखते हैं, वो जेन ज़ी राहुल को अपने नए आइकन की तरह दिखा रही है। कौन राहुल के बाद मोदी ने राहुल की उम्र पर भी तंज कसा था कि मैं किसी 56 साल के युवा की बात नहीं कर रहा हूं, लेकिन अब उन्हें ये भी समझ आ रहा होगा कि राहुल को उम्र की सीमा से परे जाकर जेन ज़ी ने अपना लिया है।

दरअसल राहुल गांधी इस समय पूरे देश में छाए हुए हैं। जो मीडिया राहुल गांधी की खबरों को दिखाता ही नहीं था, अब उसे भी राहुल से जुड़ी सारी खबरें देनी ही पड़ रही हैं। राहुल गांधी कोई बड़े से बड़ा बयान दें, या कोई काम करें, न्यूज चैनल वाले तो उनका नाम लेना भी हराम समझते थे और प्रिंट मीडिया में भी कहीं ओने-कोने में राहुल के बारे में चार-छह लाइन की खबर मजबूरी में दी जाती थी। भारत जोड़ो आंदोलन जैसा बड़ा काम राहुल गांधी ने किया, इतनी लंबी पदयात्रा आजाद भारत में किसी नेता ने नहीं की, लेकिन फिर भी राहुल गांधी को कवरेज न दिया जाए, इसका हुक्म सत्ता में बैठे लोगों ने अपने पालतू मीडिया को दे दिया था। भारत जोड़ो यात्रा को उपेक्षित करना मुश्किल हुआ तो फिर उसमें जबरदस्ती नकारात्मकता ढूंढ-ढूंढ कर खबरें दी गईं।

इसके बाद भी राहुल गांधी के साथ जनता जुड़ती रही तो फिर भारत जोड़ो यात्रा का असर चुनाव परिणाम तक ही सीमित कर दिया गया कि कितना भी देश नाप लिया, चुनाव में तो फिर भी हार गए। बात सही भी है कि हजारों किलोमीटर तक लोकतंत्र और संविधान बचाने, देश की आत्मा को बचाने के लिए राहुल गांधी पैदल चले लेकिन फिर भी 2024 के आम चुनाव में जीत नहीं मिली और फिर कई विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस बुरी तरह हारी। ये और बात है कि अब उस हार के असली कारण निकल कर सामने आ रहे हैं और भाजपा इस सच्चाई का सामना नहीं कर पा रही है।

पूरे देश में इस समय चुनाव चोरी के खिलाफ जबरदस्त गुस्से का माहौल बन गया है। राहुल गांधी इस गुस्से को रचनात्मक विरोध में बड़ी खूबसूरती से गूंथते हुए लोकतंत्र और संविधान बचाने निकल पड़े हैं।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it