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मिशन-500 या कूटनीतिक आत्मसमर्पण? भारत-अमेरिका डील के अनकहे पहलू

मैंने भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों और व्यापार वार्ता पर लगातार पांच आलेख लिखे—जो विभिन्न समाचार पत्रों में समय-समय पर प्रकाशित हुए

मिशन-500 या कूटनीतिक आत्मसमर्पण? भारत-अमेरिका डील के अनकहे पहलू
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- अरुण कुमार डनायक

एक और गंभीर पहलू रूसी तेल आयात का है। इसके दूरगामी कूटनीतिक और आर्थिक परिणाम होंगे। रूसी तेल आयात पर प्रतिबंध या सीमित प्रतिबद्धता से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, मुद्रास्फीति और रणनीतिक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। इससे यह संदेश भी जाएगा कि भारत वैश्विक दबावों के सामने स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ हो रहा है।

मैंने भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों और व्यापार वार्ता पर लगातार पांच आलेख लिखे—जो विभिन्न समाचार पत्रों में समय-समय पर प्रकाशित हुए। भारत-अमेरिका डील का दावा राष्ट्रपति ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर किया। उसके बाद, मेरे पूर्व आलेखों में व्यक्त आशंकाएं और विश्लेषण एक-एक कर सत्य सिद्ध होते दिखाई दे रहे हैं। इस व्यापार समझौते ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जिस 'रणनीतिक साझेदारी' को सरकार उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, उसके भीतर कई अनसुलझे प्रश्न दबे हैं, जिन्हें अब सार्वजनिक बहस के बिना टाला नहीं जा सकता।

प्रधानमंत्री मोदी की सरकार इस समझौते को 'वंडरफुल' बताते हुए 'मिशन-500' का अहम पड़ाव मान रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति का दावा है कि भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को शून्य की ओर ले जाने, 500 अरब डॉलर से अधिक के अमेरिकी सामान खरीदने और रूसी तेल आयात बंद करने पर सहमति जताई है। भारतीय सरकार ने इन दावों की पुष्टि नहीं की और केवल अमेरिकी टैरिफ में 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किए जाने का स्वागत किया।

पारदर्शिता की इस कमी पर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर का कहना है कि सार्वजनिक डोमेन में केवल ट्रंप के बयान हैं, कोई लिखित या संयुक्त वक्तव्य नहीं। योगेंद्र यादव ने पूछा है कि क्या सरकार ने अमेरिकी दबाव में आकर कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्र में दरवाज़े खोल दिए हैं। संसद सत्र के दौरान सदन को विश्वास में लिए बिना किए गए ऐसे समझौते लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

सबसे अधिक चिंता कृषि क्षेत्र को लेकर है। अमेरिकी कृषि मंत्री ने कहा है कि यह समझौता अमेरिकी किसानों के लिए है और उनके उत्पादों को भारत के 'विशाल बाज़ार' में प्रवेश मिलेगा। अमेरिका में कृषि को भारी सब्सिडी मिलती है; ऐसे सस्ते उत्पाद यदि भारतीय मंडियों में उतरें, तो घरेलू किसानों की कीमतें और आय दबाव में आ सकती हैं। यह वही कृषि क्षेत्र है जिसे सरकार अब तक 'रेड लाइन' बताती रही थी।

हालांकि सरकार और कुछ विशेषज्ञ यह संकेत दे रहे हैं कि गेहूं, चावल और न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली सुरक्षित हैं। अन्य क्षेत्रों जैसे डेयरी, पोल्ट्री और प्रोसेस्ड फूड पर दबाव बढ़ सकता है। कृषि पर प्रभाव काफी हद तक विवरणों पर निर्भर करेगा। यदि संवेदनशील क्षेत्र संरक्षित रहते हैं, तो नुकसान कम होगा; अन्यथा, किसान आंदोलन जैसी चुनौतियां संभव हैं। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि जब तक साझा दस्तावेज़ सामने न आए, इसे अंतिम सौदा नहीं बल्कि राजनीतिक संकेत के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

मैंने पहले भी कहा था कि कृषि क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है और भारत को आयात से संरक्षण देना चाहिए, ताकि खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार सुरक्षित रहें। साथ ही, भारत और अमेरिका के बीच कृषि क्षेत्र में सहयोग बढ़ने से निर्यात अवसर, तकनीकी सहयोग और रोजगार जैसे फायदों से इनकार नहीं किया जा सकता, और इससे भारतीयों की खाद्य समस्याओं का समाधान भी संभव है। अब हमें इंतजार करना होगा कि सरकार इस डील की पूरी जानकारी सार्वजनिक करे, ताकि सभी संदेह और अनिश्चितताएं दूर हो सकें।

उद्योग जगत को तो इस समझौते का स्वागत करना ही था और उसने सरकार के सुर से सुर मिलाने में विलम्ब नहीं किया है। आर्थिक दृष्टि से सरकार और उद्योगपति इस समझौते को सकारात्मक बता रहे हंै और उम्मीद जताई जा रही है कि, इससे भारत की जीडीपी वृद्धि में लगभग 0.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। गोल्डमैन सेंसैक्स ने भी व्यापार नीति में अनिश्चितता घटने और निवेश भावनाओं में सुधार की बात कही है। शेयर बाज़ार में तेजी, रुपये की मजबूती और विदेशी पूंजी के लौटने के संकेत भी इसी उम्मीद से जुड़े हैं।

लेकिन इन सकारात्मक अनुमानों के बीच यह प्रश्न बना हुआ है कि लाभ किसे और किस कीमत पर मिलेगा। निर्यातकों और बड़े उद्योगों को राहत मिल सकती है, पर कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर जोखिम बढ़ता दिख रहा है। पहले के उच्च अमेरिकी टैरिफ से भारत का निर्यात घटा था, लेकिन आयात बढ़ने से व्यापार घाटा और गहराने की आशंका भी है।

इस समझौते का एक अपेक्षाकृत कम चर्चित, लेकिन महत्वपूर्ण पहलू प्रवासी भारतीयों से जुड़ा है। टैरिफ में कमी से अमेरिका में भारतीय वस्तुएं—जैसे वस्त्र, मसाले, दवाइयां और उपभोक्ता सामान—कुछ सस्ती हो सकती हैं। इससे प्रवासी भारतीयों की बचत बढ़ेगी और भारत को भेजी जाने वाली रेमिटेंस पर इसका सकारात्मक असर पड़ सकता है। यह लाभ वास्तविक है, लेकिन इसका दायरा सीमित है ।

एक और गंभीर पहलू रूसी तेल आयात का है। इसके दूरगामी कूटनीतिक और आर्थिक परिणाम होंगे। रूसी तेल आयात पर प्रतिबंध या सीमित प्रतिबद्धता से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, मुद्रास्फीति और रणनीतिक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। इससे यह संदेश भी जाएगा कि भारत वैश्विक दबावों के सामने स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ हो रहा है। अमेरिकी तेल महंगा है और उसकी ढुलाई लागत भी अधिक है। ऐसे में आयात संरचना बदलने से मुद्रास्फीति और चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है, और इससे आम उपभोक्ता तथा समग्र अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ना तय है।

यह प्रश्न एक बार फिर अनुत्तरित है कि भारत की नीतिगत घोषणाएं वॉशिंगटन से क्यों होती हैं, संसद से क्यों नहीं? अब असली सवाल यह नहीं रह गया है कि चेतावनियां दी गई थीं या नहीं, बल्कि यह है कि सरकार ने उन्हें अनसुना क्यों किया? क्या यह जल्दबाज़ी थी, राजनीतिक छवि-निर्माण की हड़बड़ी थी, या यह मान लिया गया था कि बाद में संसद और जनता को समझा लिया जाएगा? जब तक समझौते का पूरा, लिखित और लागू करने योग्य पाठ सार्वजनिक नहीं होता और उस पर संसद में बहस नहीं होती, जश्न मनाना आधारहीन है।

सरकार भले ही इसे उपलब्धि बता रही हो, लेकिन संसद, किसान और नीति-जगत इसे मोदी सरकार की कूटनीतिक जल्दबाज़ी और लोकतांत्रिक अपारदर्शिता का परिणाम मान रहे हैं। यह समझौता मोदी सरकार की कूटनीतिक असफलता का प्रतीक है, जहां ट्रंप के 'अमेरिका फर्स्ट' के सामने भारत झुकता दिखाई देता है। यह समय उत्सव का नहीं, बल्कि सतर्कता और जवाबदेही का है—क्योंकि दांव पर केवल व्यापार नहीं, बल्कि भारत की कृषि, ऊर्जा सुरक्षा, विदेश नीति और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता है।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत सहायक महाप्रबंधक हैं)


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