बड़े बैंक, नैतिकता और मूल्यों पर बड़े सवाल
एचडीएफसी बैंक कामहत्व उसकी उस यात्रा में निहित है जो यह दिखाती है कि अच्छी ग्रोथ और अच्छा गवर्नेंस कैसे साथ-साथ चल सकते हैं।

एचडीएफसी बैंक का महत्व उसकी उस यात्रा में निहित है जो यह दिखाती है कि अच्छी ग्रोथ और अच्छा गवर्नेंस कैसे साथ-साथ चल सकते हैं। यह कहानी बदली हुई परिस्थितियों में भी तब तक कायम रहेगी जब तक शीर्ष स्तर से मिलने वाले निर्देशों के साथ-साथ जमीनी स्तर पर भी त्वरित कार्रवाई होती रहेगी। निर्देशों का दायरा केवल बोर्ड रूम की दीवारों पर लिखे 'विजन स्टेटमेंट' के नीरस उल्लेखों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए।
किसी बड़े बैंक के चेयरमैन का अचानक इस्तीफा देना साधारण बात नहीं है, खासकर जब उस बैंक को 'इतना बड़ा कि फेल नहीं हो सकता' की श्रेणी में रखा गया हो। और भी ज़्यादा असामान्य बात यह है कि इस्तीफे के साथ ऐसा पत्र भेजा जाए जो बैंक के मूल्यों और नैतिकता पर सवाल खड़े करता हो लेकिन लगभग पांच वर्षों तक एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन रहे अतानु चक्रवर्ती ने इस महीने की शुरुआत में ठीक यही किया जिससे बाज़ार, रेगुलेटर और बैंक मैनेजमेंट सभी हिल गए। उन्होंने लिखा- 'बैंक के भीतर पिछले दो सालों में मैंने जो कुछ घटनाएं और तौर-तरीके देखे हैं, वे मेरे निजी मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं हैं।' एसेट्स और मार्केट कैप के मामले में एचडीएफसी भारत का सबसे बड़ा प्राइवेट सेक्टर बैंक है। उदारीकरण के बाद के भारत में खुदरा बैंकिंग परिवर्तन का यह पोस्टर बॉय है। यह एक झटका पूरे बैंकिंग क्षेत्र को हिला सकता है और व्यापक वित्तीय स्थिरता के बारे में सवाल उठा सकता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने 'मजबूत वित्तीय व पेशेवर रूप से संचालित बोर्ड और सक्षम प्रबंधन टीम' का हवाला देते हुए बैंक को क्लीन चिट देने में जल्दबाजी की है। समय पर दिया गया यह आश्वासन बाजारों को शांत करता है। परिणामस्वरूप बैंक की सुशासन की प्रतिष्ठा और मूल्यांकन में विश्वास प्रीमियम को भी दर्शाता है।
फिर भी, जैसा कि इस्तीफे के एक दिन बाद विश्लेषकों के कॉल में पूछे गए सवालों से स्पष्ट था, चिंताएं बनी हुई हैं। हालांकि पूरी जांच के अभाव में बैंक में संभावित मुद्दों के बारे में बात करना जल्दबाजी होगी लेकिन यह मामला एक बार फिर इस बात पर प्रकाश डालता है कि नैतिकता और सुशासन के मुद्दों पर दशकों से बनी प्रतिष्ठा कुछ ही समय में बुरी तरह क्षतिग्रस्त या टूट सकती है। इस क्षेत्र में एचडीएफसी की प्रमुख स्थिति उदारीकृत अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की दक्षता के सकारात्मक पहलुओं को दर्शाती है लेकिन इसी प्रमुखता की वजह से बैंक पर और ज़्यादा बारीकी से नज़र रखने की जरूरत है और इस पर यह जिम्मेदारी भी आ जाती है कि वह पूरी पारदर्शिता के साथ इस बात पर चर्चा करे कि ऐसी चुनौतियां कैसे पैदा होती हैं तथा उनसे कैसे निपटा जा सकता है। इस लिहाज़ से यह एक निर्णायक मोड़ है जिसके बैंक पर तत्काल प्रभाव पड़ेंगे और मध्यम व दीर्घकालिक रूप से यह पूरे भारतीय कॉर्पोरेट जगत को अपने घेरे में ले लेगा।
यह सच है कि एचडीएफसी की साख को पहले ही नुकसान पहुंच चुका है। इसी वजह से कुछ लोगों का कहना है कि चेयरमैन को अपनी चिंताएं साफ़-साफ़ और विस्तार से बतानी चाहिए थीं, न कि सिफ़र् अस्पष्ट इशारे करके चले जाना चाहिए था। इस बात में दम है, लेकिन निवर्तमान चेयरमैन के इस कदम का एक और भी बड़ा पहलू यह है कि उन्होंने बेझिझक होकर अपनी चिंताएं लिखित रूप में जाहिर कीं। इस तरह उन्होंने बैंक के कामकाज के कुछ पहलुओं पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर किया- खासकर ऐसे माहौल में, जहां इस तरह के मुद्दों पर आम तौर पर खुलकर चर्चा नहीं होती। इसके अलावा एचडीएफसी के मामले को एक व्यापक नज़रिए से और प्रशासन-प्रणाली के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ये प्रणालियां भले ही बेहतर हो रही हैं लेकिन अभी भी उनमें सुधार की काफी गुंजाइश है। यह बात बोर्ड स्तर पर विशेष रूप से लागू होती है जहां डायरेक्टर लोग उतने सवाल नहीं उठाते जितने उन्हें उठाने चाहिए, जहां मतभेद या असहमति को आम तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता और जहां मुद्दों पर खुलकर चर्चा करने के बजाय उन्हें अक्सर नजरअंदाज़ कर दिया जाता है। यह बात ध्यान देने लायक है कि चेयरमैन के इस्तीफ़े के तुरंत बाद (उससे पहले नहीं) बैंक ने तीन वरिष्ठ कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। खबरों के मुताबिक इन कर्मचारियों को दुबई में बॉन्ड की 'गलत बिक्री' में उनकी भूमिका के कारण हटाया गया था।
मोटे तौर पर घोटालों की एक के बाद एक घटनाओं से भारतीय बैंकों की साख प्रभावित हुई है। इनमें सबसे ताज़ा और चौंकाने वाला मामला आईएफडीसी फर्स्ट बैंक का है। इस बैंक के कर्मचारियों पर आरोप है कि उन्होंने सामूहिक साजिश रची और हरियाणा सरकार के खाते में 583 करोड़ रुपये का भारी-भरकम घोटाला कर दिया। बैंक ने धोखाधड़ी की पूरी रकम चुका दी है और अब यह मामला सुर्खियों से गायब हो चुका है। इस पर शायद ही कोई सवाल उठाया गया है कि ऐसी धोखाधड़ी की योजना कैसे बनाई गई और उसे किस तरह अंजाम दिया गया। हाल ही में मुख्य रूप से ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों और छोटे व्यापारियों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बने छोटे 'न्यू इंडिया कोऑपरेटिव बैंक' का पतन बैंक के शीर्ष स्तर पर हुई संदिग्ध डीलिंग्स से जुड़ा था। सारस्वत बैंक द्वारा अधिग्रहण किए जाने से स्थिति संभल गई और छोटे जमाकर्ताओं के पैसे सुरक्षित हो गए इसलिए अब इस मामले को लगभग भुला दिया गया है। इसके अलावा कई अन्य बड़े बैंकिंग घोटाले भी हुए हैं- आईसीआईसीआई बैंक में हुए उस चौंकाने वाले घोटाले का जिक्र तो अभी किया ही नहीं गया है जिसकी वजह से उसकी सीईओ चंदा कोचर को 2019 में पद से हटा दिया गया था। इसमें अन्य घोटालों की लंबी फेहरिस्त को भी जोड़ लें (आरबीआई की 'रिपोर्ट ऑन ट्रेंड एंड प्रोग्रेस ऑफ बैंकिंग इन इंडिया, 2024-25 के अनुसार, 2024-25 में सभी घोटालों की कुल राशि 34,771 करोड़ रुपये थी जबकि 2019-20 में यह आंकड़ा 1,54,096 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था) तो इस क्षेत्र पर लोगों का भरोसा एक चिंताजनक मोड़ ले लेता है।
एचडीएफसी बैंक का महत्व उसकी उस यात्रा में निहित है जो यह दिखाती है कि अच्छी ग्रोथ और अच्छा गवर्नेंस कैसे साथ-साथ चल सकते हैं। यह कहानी बदली हुई परिस्थितियों में भी तब तक कायम रहेगी जब तक शीर्ष स्तर से मिलने वाले निर्देशों के साथ-साथ जमीनी स्तर पर भी त्वरित कार्रवाई होती रहेगी। निर्देशों का दायरा केवल बोर्ड रूम की दीवारों पर लिखे 'विजन स्टेटमेंट' के नीरस उल्लेखों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। निर्देशों का वास्तविक अर्थ है- कठिन मुद्दों को सामने लाना और उन पर खुलकर चर्चा करना। भले ही इससे अल्पकाल में कुछ असहजता का सामना करना पड़े लेकिन इसका अंतिम लक्ष्य होना चाहिए उलंघनों पर रोक लगाना, व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करना और दीर्घकाल में विश्वास का निर्माण करना। जब बोर्ड कठिन मुद्दों को पूरी गंभीरता से सुलझाने के लिए तत्पर होंगे और जहां आवश्यक हो वहां कठोर कार्रवाई का समर्थन करेंगे तभी निचले स्तर पर कार्यरत लोगों तक सही संदेश पहुंच पाएगा।
विकास के पीछे पागलपन की हद तक भागना और लक्ष्य निश्चित करना, यह सब 'उच्च पदस्थ लोगों के सुर से सुर मिलाने' का ही एक हिस्सा है। यह माहौल एक ऐसा जहरीला वातावरण पैदा कर सकता है जिसमें गलत लोग भी अच्छे, बल्कि कहें तो बेहतरीन नतीजे दे सकते हैं। वे भले ही 'स्टार परफ़ॉर्मर' बन जाएं लेकिन ट्रैफिक सिग्नलों को नजरअंदाज़ कर तेजी से दौड़ने वाली गाड़ी आखिरकार दुर्घटनाग्रस्त हो ही जाती है। इस दुर्घटना का ज़िम्मेदार कौन है- वह गलत व्यक्ति या फिर वह माहौल जिसने उस गलत व्यक्ति को पैदा किया? इस सवाल का जवाब हमें शासन-प्रशासन की उन जटिलताओं की ओर इशारा करता है जहां आज के दौर में 'आंकड़ों में विकास' ही सफलता का एकमात्र पैमाना बन चुका है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार सदस्य हैं।सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


