संविधान के आलोक में विश्वास की पूंजी से हों कानूनी बदलाव
सत्ता की ताकत का बेजा इस्तेमाल करने की जगह लोक कल्याण और जन परंपराओं को पुष्ट करने में लगाना होगा। तभी लोकतंत्र मजबूत होगा।

- नीतीश कुमार सिंह
हरेक राज्य सरकार को बेशक लोक व्यवहार से सुंदर संस्कृतियों को नत्थी कर आचारवान और परस्पर हक अदायगी का कानूनी प्रावधान करने चाहिए, परंतु उनमें विभिन्न समाजों की आशंकाएं मिटाकर उनकी जगह सिर्फ आशा का संचार होना चाहिए। समान नागरिक संहिता के बारे में भी यही बात लागू होती है जिस पर करीब सौ साल की धीमी परंतु गंभीर बहस है।
उत्तराखंड व गुजरात के बाद अब असम में 'एक समान नागरिक संहिता कानून' पारित होने से अल्पसंख्यक समाज में परंपरा और निजी मामलों में हस्तक्षेप की आशंका व्याप्त है, जो स्वाभाविक है। भारत जैसे प्रगतिशील, विविधतापूर्ण और बहु सांस्कृतिक देश में उच्च सामाजिक संबंधों और परंपराओं को तरज़ीह मिलनी चाहिए परंतु राज्य दर राज्य चुनाव जीतती राजनीतिक पार्टी को किसी समुदाय से जुड़े कोई भी बदलाव पूर्णतया लोकतांत्रिक तरीके से करने चाहिये। यही इस देश का तकाजा है। अंतिम व्यक्ति के विश्वास की पूंजी संग विचार खुलकर लें जिसकी दरकार आज सभी राज्यों की है। सत्ता की ताकत का बेजा इस्तेमाल करने की जगह लोक कल्याण और जन परंपराओं को पुष्ट करने में लगाना होगा। तभी लोकतंत्र मजबूत होगा।
हरेक राज्य सरकार को बेशक लोक व्यवहार से सुंदर संस्कृतियों को नत्थी कर आचारवान और परस्पर हक अदायगी का कानूनी प्रावधान करने चाहिए, परंतु उनमें विभिन्न समाजों की आशंकाएं मिटाकर उनकी जगह सिर्फ आशा का संचार होना चाहिए।
समान नागरिक संहिता के बारे में भी यही बात लागू होती है जिस पर करीब सौ साल की धीमी परंतु गंभीर बहस है।
असम के ही हालिया कानून के जरिए- एक पत्नी प्रथा, शादी में पुरुषों की उम्र 21, महिलाओं की 18, लिव इन रिलेशनशिप के लिए पंजीकरण और परित्यक्त महिलाओं के भरण-पोषण को एक जैसे कानूनी ढांचे के अंदर लाया गया। इस बीच, अल्पसंख्यक समुदायों की आशंका थी कि उनके धार्मिक और परंपरागत पहलुओं पर हमला तो नहीं हो रहा। ऐसे मामलों में किसी भी सरकार को हरेक नागरिक के लोक पहलू पर ध्यान केंद्रित करना था। उसका संवैधानिक कर्तव्य है कि देश के किसी हिस्से में किसी प्रक्रिया से बंधुता में खलल न हो और समुदायों का विश्वास जीता जाए।
संविधान सभा भी धर्मनिरपेक्ष राज्य की दिशा में विभिन्न पहलुओं पर चिंता व्यक्त करते हुए एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता और आशंका के पाटों के बीच विचार-विमर्श कर रहा था। संविधान सभा में 23 नवंबर, 1948 को नीति निदेशक सिद्धांत के अनुच्छेद-44 संबंधी प्रस्ताव 'नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता- राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा' पर चर्चा हुई।
संविधान सभा के सदस्य केएम मुंशी ने इस प्रस्ताव में मौलिक अधिकार संबंधी अनुच्छेद 19 का उल्लंघन और अल्पसंख्यकों के प्रति अन्याय का मसला आने पर कहा था- 'धार्मिक आचरण लौकिक आचरण सहित होना चाहिए। यदि सामाजिक कल्याण के क्षेत्र हों तो इस विषय में संसद को कानून बनाने का अधिकार होगा, जिसमें अल्पसंख्यकों के मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं होगा।' उन्होंने आगे कहा कि, किसी भी उन्नत मुस्लिम देश में निजी कानून को अटल नहीं माना गया है कि व्यवहार संहिता को बनाने का निषेध हो। तुर्कीए या मिस्र में इन देशों के अल्पसंख्यकों को ऐसे अधिकार नहीं दिए गए हैं। पूर्व साम्राज्य में भी केंद्रीय विधान मंडल ने शरियत कानून पारित किया तब खोजा और कच्छी मेमन लोग अत्यंत असंतुष्ट थे। वह उस समय कुछ हिंदू परंपराओं का पालन करते थे। धर्म परिवर्तन के समय से ही उनका पालन करते आए थे। वे शरियत के अनुसार नहीं चलना चाहते थे। खोजा और कच्छी मेमन को अनिच्छा से इसे मानना पड़ा। उस समय उनके अधिकार कहां थे? वहीं यूरोप के कई देशों में व्यवहार संहिता है और सभी को इसे मानना पड़ता है।'
उन्होंने आगे कहा- 'धर्म का सामाजिक संबंध या उत्तराधिकार से क्या संबंध है? हिंदू संहिताओं में ही कई प्रावधान मनु और याज्ञवल्क्य या अन्य शास्त्रों के विचारों से भिन्न हैं। हमारा समाज प्रगतिशील है। एक कानून न होने का कुछ जगहों पर नुकसान देखा तो गया है लेकिन अंतिम संहिता बनाने के पहले विचार-विनिमय अत्यावश्यक है। अभी कहीं मयूख, दयाभाग, मिताक्षरा कानून है जिन्हें भिन्न-भिन्न हिंदू कानून माना जाता है। एक समान नागरिक संहिता नहीं होने का अल्पसंख्यकों ही नहीं, बहुसंख्यकों पर भी प्रभाव पड़ता है। अंग्रेजी राज में हमारे मस्तिष्क में था कि निजी कानून धर्म का भाग है यह भावना अंग्रेजों और उनके न्यायालयों ने उकसाई थी।'
संविधान सभा के सदस्य मोहम्मद इस्माइल साहब ने निजी कानून- विवाह, उत्तराधिकार, संपत्ति, संविदा आदि को धर्म और संस्कृ ति का भाग बताया और असांप्रदायिक राज्य बनाने के विचार में निजी कानून से छेड़-छाड़ नहीं होने की बात कही। ऐसे ही एक अन्य सदस्य नसरुद्दीन अहमद ने कहा कि निजी कानून को उस जाति की पूर्ण सहमति के बिना परिवर्तित नहीं किया जाएगा। इस संबंध में उन्होंने अपना संशोधन भी पेश किया था लेकिन संविधान सभा ने उसे नहीं माना था।
अंतत: संविधान सभा के सदस्य डा. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा- 'देश में अपराधिक से लेकर संपत्ति हस्तांतरण का कानून एक ही है। सिर्फ विवाह और उत्तराधिकार बचे हैं परंतु सारे भारत में मुसलमानों का निजी कानून एक नहीं था। 1935 तक पश्चिमेत्तर सीमा प्रांत में शरियत कानून लागू नहीं था।' उत्तराधिकार व अन्य विषयों में वहां हिंदू कानून लागू था। 1939 में केंद्रीय विधान मंडल ने हस्तक्षेप किया वहां मुसलमान पर हिंदू कानून बंद कराया गया और शरियत कानून लागू करना पड़ा था। 1937 तक संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत व मुंबई में उत्तराधिकार के विषय में काफी हद तक हिंदू कानून लागू था।'
उन्होंने आगे बताया कि मालाबार में 'मरुमक्थायम कानून' हिंदू और मुसलमान दोनों पर लागू था, जो मातृ प्रधान कानून है। उन्होंने सुझाव दिया कि- 'राज्य देश के लिए एक व्यवहार संहिता के निर्माण का प्रयत्न करेगा।'
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में विभिन्न जन समुदायों पर सैकड़ों साल में दर्जनों संस्कृतियों का असर पड़ा। इससे लोक व्यवहार में आमूल परिवर्तन भी हुए। अंग्रेजों की सांप्रदायिक और फूट डालकर राज करने की नीति ने समाज, धर्म और संस्कृतियों का काफी हद तक बेड़ा गर्क किया। आज उन बातों को समझकर विश्वास बहाली के साथ प्रगतिशील, सौहार्द्र और उच्च मानवीय मूल्यों की सामाजिक परंपरा और कानूनी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और राजनीति शास्त्र के शिक्षक हैं)


