चुनाव में हार के बाद केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के सामने मुश्किल चुनौती
सीपीआई(एम) को राज्य में भाजपा की बढ़ती ताकत का ज़ोरदार मुकाबला करना होगा।

- पी. श्रीकुमारन
सीपीआई(एम) को राज्य में भाजपा की बढ़ती ताकत का ज़ोरदार मुकाबला करना होगा। खास बात यह है कि भाजपा ने जिन तीन सीटों पर जीत हासिल की है, वे पहले सीपीआई(एम) के पास थीं। यह काम बेहद ज़रूरी है। इसमें जऱा भी देरी नहीं होनी चाहिए वरना, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में सीपीआई(एम) का जो हश्र हुआ, वही केरल इकाई का भी हो सकता है।
2026 के राज्य विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार से वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) पूरी तरह से हिल गया है। लेकिन इस समय की सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि संकोच और निराशा की भावना को झटक दिया जाए और इस उदासी भरे माहौल से बाहर निकला जाए। हार के कारणों की पहचान करने और सुधार के कदम उठाने का काम अभी से शुरू हो जाना चाहिए। चार दशकों से भी ज़्यादा समय में एलडीएफ का यह अब तक का सबसे खराब विधानसभा प्रदर्शन है। 1982 के बाद से हुए हर चुनाव में, एलडीएफ को कम से कम 43.5प्रतिशत वोट मिले थे। इससे पहले उसका सबसे कम वोट प्रतिशत 2016 में 43.48प्रतिशत और 2001 में 43.7प्रतिशत रहा था। इस बार पहली बार गठबंधन 40 प्रतिशत के आंकड़े से नीचे गिर गया है। 2026 में यह आंकड़ा 37.34प्रतिशत रहा।
सीपीआई(एम) और सीपीआई दोनों को लगभग बराबर वोट शेयर मिले हैं- जिन सीटों पर उन्होंने चुनाव लड़ा, उनमें उन्हें लगभग 39प्रतिशत वोट मिले। लेकिन सहयोगी दल केरल कांग्रेस (एम) का प्रदर्शन बहुत खराब रहा और उसे एक भी सीट नहीं मिली। पार्टी जिन 12 सीटों पर चुनाव लड़ी, वे सभी सीटें वह हार गई। यहां तक कि पार्टी के प्रमुख जोस के. मणि भी पाला सीट से चुनाव हार गए। यह वही सीट है जिसे उनके पिता के.एम. मणि का गढ़ माना जाता था।
एलडीएफके एक और घटक दल आरजेडी को एक सीट पर जीत मिली। जहां तक सीपीआई(एम) की बात है, पार्टी 77 सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन उसे सिर्फ 26 सीटों पर ही जीत मिली। सीपीआई 24 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन उसे 2021 की 17 सीटों के मुकाबले इस बार सिर्फ 8 सीटों पर ही जीत मिली।
इसके विपरीत, यूडीएफ ने 2026 के चुनावों में शानदार जीत हासिल की है। यूडीएफ को कुल 102 सीटें मिलीं, जो पिछले चुनाव के मुकाबले 62 सीटें ज़्यादा हैं। कांग्रेस 92 सीटों पर चुनाव लड़ी और उसने 63 सीटों पर जीत हासिल की, जो 2021 के मुकाबले 42 सीटों की बढ़त है। पार्टी के वोट शेयर में 7.14प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और उसे कुल 45.03प्रतिशत वोट मिले। सहयोगी दल आईयूएमएल 27 सीटों पर चुनाव लड़ी और 22 सीटें जीती, जबकि 2021 में उसे सिर्फ 15 सीटें मिली थीं। केरल कांग्रेस 8 सीटों पर चुनाव लड़ी और उसने 7 सीटों पर जीत हासिल की। एक और सहयोगी दल आरएसपी, जिसे 2021 के चुनावों में एक भी सीट नहीं मिली थी, इस बार 4 में से 3 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रहा। यूडीएफ के अन्य घटक दलों- सीएमपी, केडीपी, और आरएमपी- को एक-एक सीट पर जीत मिली।
जहां तक भाजपा की बात है, पार्टी ने एक बार फिर राज्य विधानसभा में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और तीन सीटों पर जीत हासिल की। एनडीए के वोट शेयर में 1.79प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह बढ़कर 14.20प्रतिशत हो गया। पार्टी को छह विधानसभा सीटों पर दूसरा स्थान मिला।
अब उन कारणों का विश्लेषण करने का समय आ गया है जिनकी वजह से एलडीएफ को इतनी बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इस सूची में सबसे ऊपर है सत्ता-विरोधी लहर का ज़ोरदार असर। इसका असर सबसे ज़्यादा साफ़ दिखाई दिया। उतना ही अहम कारण था सीपीआई(एम) के कुछ नेताओं की बगावत, जोपय्यानूर, तलिपरम्बा और अंबलप्पुझा में पार्टी के उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़े थे। इन तीनों ने ही भारी बहुमत से जीत हासिल की, जिससे सीपीआई(एम) खेमे में हड़कंप मच गया। अगला मुद्दा है अल्पसंख्यक वोटों का एलडीएफ से दूर होना- खासकर मुसलमानों के वोटों का। मुसलमानों ने एलडीएफ का साथ इसलिए छोड़ा, क्योंकि एलडीएफ नेताओं ने एसएनडीपी प्रमुख वेल्लापल्लीनटेसन द्वारा मुसलमानों के खिलाफ की गई तीखी और बेकाबू टिप्पणियों की आलोचना करने से इंकार कर दिया था। इस नाकामी की एलडीएफ को भारी कीमत चुकानी पड़ी।
एक और वजह रही है कुछ एलडीएफ नेताओं का घमंडी सार्वजनिक रवैया। इससे लोगों के साथ एलडीएफ का जुड़ाव और कमज़ोर हुआ, और लोगों के मन में इस गठबंधन और सरकार के प्रति नफऱत पैदा हो गई। जब तक गठबंधन के नेता इस हार से सही सबक नहीं सीखते, लोगों से उनका यह अलगाव और भी गहरा होता जाएगा।
एक चौंकाने वाले घटनाक्रम में, आंकड़ों से पता चलता है कि सीपीआई(एम) के वोटों में 12.5 लाख से ज़्यादा की कमी हुई। इनमें से लगभग चार लाख वोट भाजपा के खाते में चले गए, जिसके वोट शेयर में चार लाख वोटों की बढ़ोतरी देखने को मिली है! सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजग़ी की लहर कितनी ज़ोरदार थी, यह 13 मंत्रियों और एलडीएफ के संयोजक की हार से साफ ज़ाहिर हो गया। एलडीएफ को पांच ज़िलों में एक भी सीट नहीं मिली: मलप्पुरम, वायनाड, एर्नाकुलम, कोट्टायम और इडुक्की। उसे कोझिकोड जैसे अपने मज़बूत गढ़ों में भी चौंकाने वाला नुकसान उठाना पड़ा, जहां वह 13 में से सिर्फ 1 सीट ही जीत पाई। कोल्लम और तिरुवनंतपुरम- जो पहले उसके मज़बूत गढ़ माने जाते थे- वहां भी गठबंधन का हश्र कुछ ऐसा ही रहा।
एलडीएफ की इस करारी हार की एक बड़ी वजह यह है कि सीपीआई(एम) का पार्टी संगठन सरकार की कमियों को उजागर करने में नाकाम रहा। यहां यह बताना ज़रूरी है कि जब पिनाराई पार्टी के सचिव थे, तो उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुरूप सरकार पर पार्टी के नियंत्रण को मज़बूती से कायम रखा था। लेकिन, मौजूदा पार्टी सचिव एम.वी. गोविंदन पार्टी सचिव से अपेक्षित मध्यस्थता और हस्तक्षेप वाली भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाने में असफल रहे। सीपीआई(एम) के उन कार्यकर्ताओं को वापस लाने की सख्त ज़रूरत है जिन्होंने पार्टी छोड़ दी है। खास बात यह है कि तालिपरम्बा और पय्यानूर से चुनाव लड़ने वाले बागी नेताओं ने साफ तौर पर कहा है कि वे कभी किसी दूसरी पार्टी में शामिल नहीं होंगे। वे बस इतना चाहते हैं कि सीपीआई(एम) सुधार के कदम उठाए!
आखिरकार, खासकर सीपीआई(एम) को राज्य में भाजपा की बढ़ती ताकत का ज़ोरदार मुकाबला करना होगा। खास बात यह है कि भाजपा ने जिन तीन सीटों पर जीत हासिल की है, वे पहले सीपीआई(एम) के पास थीं। यह काम बेहद ज़रूरी है। इसमें जऱा भी देरी नहीं होनी चाहिए वरना, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में सीपीआई(एम) का जो हश्र हुआ, वही केरल इकाई का भी हो सकता है।
यह सोचना भी बहुत डरावना है। एलडीएफ नेताओं के सामने अब काम साफ है। उन्हें अपनी सुस्ती छोड़नी होगी और भगवा मार्च की बढ़ती ताकत को रोकने के काम में अपनी पूरी ताकत झोंक देनी होगी। वामपंथ को यह काम सही तरीके से करना ही होगा। यह एक ऐतिहासिक ज़रूरत है।


