जंतर-मंतर 2.0- सरकार के सामने सीजेपी की नई चुनौती
उभरते हुए लोकतंत्रों के लिए एक नए युग की शुरुआत करने वाला देश अब एक चक्र पूरा कर चुका है।

डॉ. मलय मिश्रा
उभरते हुए लोकतंत्रों के लिए एक नए युग की शुरुआत करने वाला देश अब एक चक्र पूरा कर चुका है। अब समय आ गया है कि देश की लोकतांत्रिक भावना, एक नए समाज के रूप में दृढ़ संकल्प, साहस और आत्मविश्वास के साथ पूरी तरह साकार हो। गणतंत्र के नागरिकों के लिए मुक्ति का दिन करीब है और वे अपना हक मांगेंगे। विरोध को दबाने के लिए सख्त कार्रवाई शायद सरकार की आखिरी कोशिश हो।
देश की सबसे बड़ी अदालत के मुखिया की अनजाने में बनाई गई 'कॉकरोच जनता पार्टीÓ (सीजेपी) ने 10 अक्टूबर से जंतर-मंतर पर देशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है। यह जगह कुछ महीने पहले ही बेचैन 'जेन ज़ीÓ की लड़ाई का मैदान बनी थी जिसने सरकार को पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की नाकामी के कारण अपने शिक्षा मंत्री को हटाने पर मजबूर कर दिया था। यह 'जंतर-मंतर 2.0Ó होगा जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की जाएगी। उन पर आरोप है कि उन्होंने संदिग्ध विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के ज़रिए 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13.4 करोड़ मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया। सीजेपी का दावा है कि इस प्रक्रिया को कोई संवैधानिक मंज़ूरी नहीं मिली है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने ऐलान किया है कि एक बार मुख्य चुनाव आयुक्त के हटने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बारी होगी।
यह सत्ता-तंत्र के लिए एक अशुभ चेतावनी है जो एक्टिविस्टों, सिविल सोसाइटी संगठनों, विपक्षी गठबंधन और अलग-अलग सेक्टरों के समूहों के हमले का सामना कर रहा है। इनकी मांग है कि चुनाव आयोग को उसके मौजूदा स्वरूप में भंग कर दिया जाए, एसआईआर लागू होने के बाद हुए सभी चुनाव रद्द हों और ज्ञानेश कुमार पर सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में बड़े पैमाने पर चुनाव में धांधली करने के आरोप में एक आम अपराधी की तरह मुक़दमा चलाया जाए। इसे लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 157वीं जयंती पर कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए, खासकर मुंबई के शिवाजी पार्क और दिल्ली के जंतर-मंतर पर।
चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में विशेष सुधार अभियान को लागू करने में हुई गड़बड़ियों के पीछे की बड़ी साज़िश का पता लगाने के लिए कुछ ज़रूरी सवालों पर बात करनी ज़रूरी है। प्रक्रिया में हुई गड़बड़ियों को छोड़ भी दें- जैसे सीईसी और दो आयुक्तों को चुनने वाली तीन-सदस्यीय समिति का गठन, जिसे बिना किसी विपक्षी सदस्य की मौजूदगी या वोटिंग के 'वॉइस वोटÓ से पास किए गए संशोधन के ज़रिए तय किया गया था और जो काफ़ी हद तक सरकार के पक्ष में झुकी हुई थी, साथ ही उन्हें अपनी ड्यूटी के दौरान किए गए या 'कथित तौर पर किए गएÓ किसी भी काम के लिए आजीवन सुरक्षा (इम्युनिटी) दी गई थी। यह बात भी सामने आई है कि दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों के दौरान 14 बार औपचारिक रूप से असहमति जताई थी और फिर उसी मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठकर यह माना कि चुनाव आयोग के सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। प्रेस नोट जारी करके यह भी कहा गया कि सब ठीक है। सबसे हैरानी की बात यह है कि चुनाव आयोग की ओर से सरकार जवाब दे रही थी। जब राज्य की अहम संस्थाओं से समझौता किया जाता है तो लोकतंत्र खत्म हो जाता है और नागरिकों को सड़कों पर उतरना ही पड़ता है।
फॉर्म 6 और फॉर्म 7 के बारे में जो बातें सामने आई हैं, यथा डिजिटल प्लेटफार्म ईसीआई नेट के ज़रिए मनमाने ढंग से नाम जोड़ना, हटाना और बदलाव करना- यह काम नियमों के अनुसार डिजिटल प्लेटफार्म ईर्आरओ नेट द्वारा किया जाना था। ऐसा लगता है कि इससे एक खास समुदाय को निशाना बनाया गया। इस सब में मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले काम किया। दो अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद सारे फ़ैसले एक ही व्यक्ति ने लिए जबकि नियमों के अनुसार विवाद की स्थिति में बहुमत की राय को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी। इससे यह सवाल उठता है कि ये फैसले किसके फ़ायदे के लिए किए गए? इस तरह बाहर किए जाने से किसे फ़ायदा होता जबकि संविधान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 'यूनिवर्सल एडल्ट फ्रैंचाइज़Ó (सभी वयस्कों को वोट का अधिकार) और 'एक व्यक्ति, एक वोटÓ के ज़रिए आखिरी वोटर को भी शामिल किया जाए। क्या इस प्रक्रिया को 'नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़नÓ (एनआरसी) बनाने की योजना से नहीं जोड़ा जा सकता। यानी बड़े पैमाने पर लोगों को वोटिंग के अधिकार से वंचित करने की प्रक्रिया, जिससे दो मुख्य श्रेणियां बनती हैं- वे जो वोट दे सकते हैं और इसलिए नागरिक हैं (सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंज़ूर परिभाषा के अनुसार) और दूसरे जो वोट नहीं दे सकते और इसलिए गैर-नागरिक हैं? क्या इसे 'एक देश, एक चुनावÓ के बड़े प्रोजेक्ट से जोड़ा जा सकता है ताकि उन लोगों को बाहर किया जा सके जिन्हें नागरिक नहीं माना जाता या जो अवांछित हैं? इससे देश का बंटवारा पूरा हो जाएगा और सत्ताधारी पार्टी के लिए फ़ायदेमंद इलाक़े तय करने की परिसीमन की प्रक्रिया में मदद मिलेगी।
पिछले दो वर्षों से कांग्रेस ने 'वोट चोरी' का नारा दिया है और इसे राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बनाया है। इस बात को ज़ोर-शोर से उठाया गया है कि चुनावी धांधलियों में सत्ताधारी पार्टी की क्या भूमिका रही है। बिहार, हरियाणा, महाराष्ट्र और बंगाल में उनकी लगातार चुनावी जीत ने इस बात को अच्छी तरह साबित कर दिया है। फिर सवाल यह है कि जो पार्टी 12 साल से ज़्यादा समय से केंद्र में बेरोकटोक सत्ता का आनंद ले रही थी और जिसके प्रधानमंत्री को आदर्श माना जाता था, वह जनता के जनादेश को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करने के लिए इतने निचले स्तर पर क्यों उतरेगी? बढ़ती बेरोज़गारी, बिना नौकरी वाली ग्रोथ, बढ़ती असमानता और कुछ कॉरपोरेट घरानों द्वारा सरकारी संसाधनों की लूट के कारण ज़्यादातर वोटरों ने सरकार के कामकाज को नकारात्मक रूप से देखा है। विडंबना यह है कि सिस्टम ने इन्हीं लोगों को दरकिनार कर दिया है। ज़्यादातर भारतीयों- गरीब, अशिक्षित, हाशिए पर रहने वालों और प्रवासी मज़दूरों के लिए वोट देने का अधिकार उनकी सबसे बड़ी ताकत है; वे इसे किसी भी संदिग्ध तरीके से खोना बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसलिए, बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा और कई राज्यों में लाखों वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की बात सामने आने से समाज का एक बड़ा वर्ग नाराज़ है। हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं और लोग अब ज़बरदस्ती दबाए जाने को तैयार नहीं हैं।
इस सब में न्यायपालिका की भूमिका काफी निराशाजनक रही है। जब मामला हाथ से निकल रहा हो और विपक्ष मज़बूत हो रहा हो तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में खुद संज्ञान क्यों नहीं लिया? बड़ा सवाल यह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की वैश्विक छवि का क्या होगा? हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर स्टीवन लेविट्स्की और डैनियल ज़िबलाट ने अपनी मशहूर किताब 'हाउ डेमोक्रेसीज़ डाईÓ (लोकतंत्र कैसे खत्म होते हैं) में इसका जवाब दिया है- 'लोकतंत्र जनरलों के हाथों नहीं बल्कि चुने हुए नेताओं- राष्ट्रपतियों या प्रधानमंत्रियों के हाथों खत्म हो सकते हैं जो उसी प्रक्रिया को कमज़ोर करते हैं जिसने उन्हें सत्ता में पहुंचाया था... तानाशाही की ओर ले जाने वाले चुनावी रास्ते का दुखद विरोधाभास यह है कि लोकतंत्र के हत्यारे लोकतंत्र की ही संस्थाओं का इस्तेमाल धीरे-धीरे, चुपके से और यहां तक कि कानूनी तौर पर उसे (लोकतंत्र को) खत्म करने के लिए करते हैंÓ। यह नुकसान ऐसा है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती और इसे छिपाने की कोई भी कोशिश इसकी छवि को और भी खराब करेगी। दुनिया देख रही है कि दिल्ली में क्या हो रहा है।
उभरते हुए लोकतंत्रों के लिए एक नए युग की शुरुआत करने वाला देश अब एक चक्र पूरा कर चुका है। अब समय आ गया है कि देश की लोकतांत्रिक भावना, एक नए समाज के रूप में दृढ़ संकल्प, साहस और आत्मविश्वास के साथ पूरी तरह साकार हो। गणतंत्र के नागरिकों के लिए मुक्ति का दिन करीब है और वे अपना हक मांगेंगे। विरोध को दबाने के लिए सख्त कार्रवाई शायद सरकार की आखिरी कोशिश हो। यह तो साफ़ है कि खेल का नतीजा क्या होगा लेकिन अभी स्पष्ट नहीं है कि अंत कब और कैसे होगा?
(लेखक सेवानिवृत्त राजनयिक हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


