Top
Begin typing your search above and press return to search.

अफसरशाही की जवाबदेही तय करना जरूरी

उत्तर प्रदेश के मेरठ में ​िजला पुलिस प्रमुख के एक वीडियो के सामने आने के बाद दलितों का बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हो गया है।

अफसरशाही की जवाबदेही तय करना जरूरी
X

जगदीश रत्तनानी

भ्रष्टाचार, आचार संहिता के उल्लंघन और पारदर्शिता कम करने की किसी भी कोशिश के खिलाफ सख़्त कार्रवाई के साथ-साथ इस बात पर जोर दिया जा सकता है कि दिखावे या ग्लैमर की बजाय सेवा-भाव को प्राथमिकता दी जाए। खासकर जनता से सीधे जुड़े कामों में अधिकारियों को नागरिकों की कमेटियों के साथ मिलकर काम करने के लिए कहा जाना चाहिए ताकि लोगों का भरोसा जीता जा सके।

उत्तर प्रदेश के मेरठ में ​िजला पुलिस प्रमुख के एक वीडियो के सामने आने के बाद दलितों का बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हो गया है। इस वीडियो में वे पुलिस वैन में एक वकील और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को पीटते हुए दिख रहे हैं। ये प्रदर्शनकारी एक 20 साल की लड़की की हत्या की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे थे। 2015 बैच के आईपीएस अधिकारी अविनाश पांडे की यह शर्मनाक और आपराधिक हरकत दिखाती है कि भारत की प्रमुख प्रशासनिक सेवाएं कई स्तरों पर देश को निराश कर रही हैं। वैसे यह कोई अकेली घटना नहीं है जो प्रशासन की सड़ी-गली, बदसलूकी वाली और ज़मीनी हकीकत से कटी हुई कार्यशैली को दिखाती हो। समय-समय पर ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं जो प्रशासनिक सेवाओं के शीर्ष स्तर को एक ऐसे खास वर्ग के रूप में दिखाती हैं जिसने सत्ता के दुरुपयोग और सरकारी तंत्र के शोषण को सामान्य मान लिया है।

मेरठ का मामला यह सवाल खड़ा करता है कि ऐसे व्यक्ति को नौकरी पर कैसे रखा गया और फिर उसे मेडल और अहम ज़िम्मेदारी कैसे दी गई? हमें ऐसे मामलों में मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण पर तो सवाल उठाने ही चाहिए, साथ ही वरिष्ठ अफ़सरों की भर्ती, नियुक्ति, प्रमोशन और सुपरविज़न की पूरी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाने चाहिए। देश को उन धारणाओं को चुनौती देनी चाहिए जिन्होंने सिविल सर्विस को 'शासन का स्टील फ्रेम' और इसकी 100 साल पुरानी भर्ती करने वाली संस्था- संघ लोक सेवा आयोग (यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन) को इसका 'संरक्षक' मानने की सोच को मज़बूत किया है।

एक जटिल और लंबे समय से चल रहे सिस्टम को बदलना मुश्किलों भरा काम है। खासकर जब ब्यूरोक्रेसी के राजनीतिकरण को लेकर नई चिंताएं हों। ये चिंताएं 'लेटरल एंट्री' व्यवस्था पर हुई बहस में साफ दिखीं। सरकार ने 2024 में इसकी घोषणा की थी परन्तु बाद में आरक्षण कोटे को दरकिनार करने पर हुए जायज हंगामे के कारण इसे वापस ले लिया गया। यह एक अमेरिकी मॉडल है जिसमें चुनाव जीतने वाला नेता प्रशासन में अपने समर्थकों को नियुक्त करता है। कहा जा रहा है कि एक नई लेटरल एंट्री पॉलिसी तैयार की जा रही है। इसे आरक्षण की रक्षा करनी होगी और तथाकथित 'स्पॉइल्स सिस्टम' के जाल में फंसने से बचना होगा।

'लेटरल एंट्री' केंद्र सरकार की एक विशेष भर्ती प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से निजी क्षेत्र और गैर-सरकारी विशेषज्ञों को बिना पारंपरिक यूपीएससी परीक्षा दिए सीधे सरकारी विभागों में उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता है। इसके तहत मुख्य रूप से संयुक्त सचिव, निदेशक और उप-सचिव जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर भर्तियां की जाती हैं। जाहिर है, भारत राजनीतिक ब्यूरोक्रेसी का जोखिम नहीं उठा सकता। हालांकि कुछ लोग तर्क देंगे कि हाल के वर्षों में अहम पदों का पहले ही काफी हद तक राजनीतिकरण हो चुका है।

इन सब बातों को देखते हुए सुधारों पर एक व्यापक राजनीतिक सहमति अभी भी बन सकती है। एक तरफ़ तो सावधानी से बनाई गई नीति के ज़रिए नए सदस्यों को सीधे भर्ती (लेटरल एंट्री)करना एक तरीका है वहीं दूसरी तरफ़ सिस्टम में मौजूद उन लोगों को हटाना भी उतना ही ज़रूरी है जिन्होंने साफ़ तौर पर अपने अधिकार का गलत इस्तेमाल किया है- जैसा कि मेरठ का मामला जो इन दिनों सुर्खियों में है। आज प्रशासन के ऊपरी स्तर का मतलब है लगभग असीमित शक्तियों वाले एक क्लब की स्थायी सदस्यता। हालांकि 2014 से भ्रष्टाचार के आरोप में लगभग 400 लोगों को नौकरी से निकाला गया है। यह फरवरी 2026 तक कुल 10,171आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की संख्या का 4 प्रतिशत से भी कम है। ज़्यादातर अधिकारी रिटायरमेंट तक नौकरी करते रहते हैं जो कि गैर-सरकारी क्षेत्र में बहुत कम देखने को मिलता है। शक्तिशाली पदों पर कम निगरानी के साथ लगातार नौकरी मिलने का वादा गलत तरह के उम्मीदवारों को आकर्षित करता है और उन्हें बनाए रखता है; ये ज़्यादातर ऐसे लोग होते हैं जो जोखिम नहीं लेना चाहते और बदलते दौर में जहां नए विचारों और इनपुट की ज़रूरत है- जीवन भर की सुरक्षा की तलाश में रहते हैं।

यूपीएससी के माध्यम से शीर्ष स्तर पर होने वाली भर्तियों के लिए जीवन भर की नौकरी (स्थायी सेवा) की पेशकश करने की आवश्यकता नहीं है, जिसमें पदोन्नति राजनीतिक दबावों से पूरी तरह सुरक्षित होती है। ठीक उसी तरह और उसी सीमा तक जैसा कि वर्तमान भर्ती प्रणाली में है। 'अग्निवीर' से प्रेरित एक ऐसा ढांचा जो शुरुआती नियुक्तियों को एक निश्चित अल्पकालिक कार्यकाल तक सीमित करता है और सेवा विस्तार के लिए मध्य-कैरियर में कड़े मूल्यांकन का प्रावधान करता है, सीमा पर तैनात सैनिकों की तुलना में वरिष्ठ नौकरशाहों के लिए कहीं अधिक आवश्यक है। इसे 'स्पॉइल्स सिस्टम' (यानी राजनीतिक वफ़ादारी के आधार पर नियुक्तियां और पदोन्नति) में बदलने से रोकने के लिए कड़े सुरक्षा मानकों के साथ, स्वतंत्र और वैधानिक सार्वजनिक पैनलों की देखरेख में एक पारदर्शी, प्रदर्शन पर आधारित प्रतिधारण (सेवा में बनाए रखने की) प्रणाली को तैयार करना संभव होना चाहिए। यह दृष्टिकोण लेटरल एंट्री के साथ मिलकर खाली पदों को भरने और व्यापक अनुभवों वाले लोगों के लिए अवसरों के नए द्वार खोलने का काम कर सकता है। लेटरल एंट्री के कारण यह व्यवस्था को उसकी 'रिप वैन विंकल' जैसी गहरी नींद और शिथिलता से झकझोर कर बाहर ला सकती है जिसमें वह डूब चुकी है।

भारत को अपनी नौकरशाही का ग्लैमर भी कम करना चाहिए। नौकरशाह बहुत बड़े-बड़े कार्यालयों में बैठते हैं, उन्हें आलीशान घर मिलते हैं, वे बड़ी-बड़ी गाड़ियां इस्तेमाल करते हैं और उन्हें बड़ी संख्या में सपोर्ट स्टाफ़ व पर्सनल असिस्टेंट मिलते हैं जो निजी नौकरों और सहायकों की तरह काम करते हैं। दुनिया भर में राजनीतिक नेता अपना बैग खुद उठाते हैं। यहां नौकरशाहों के जूते पॉलिश करने के लिए भी नौकर होते हैं। इसे तुरंत बंद किया जाना चाहिए। कर्नाटक के डीजीपी डॉ. एमए सलीम की हाल ही में तारीफ़ हुई थी क्योंकि उन्होंने सीनियर अधिकारियों के घरों पर निजी काम में लगे लगभग 3,000 कर्मचारियों को वापस मुख्य पुलिसिंग के काम में लगा दिया था। दुर्भाग्य से ऐसे कदम बहुत कम उठाए जाते हैं।

भ्रष्टाचार, आचार संहिता के उल्लंघन और पारदर्शिता कम करने की किसी भी कोशिश के खिलाफ सख़्त कार्रवाई के साथ-साथ इस बात पर जोर दिया जा सकता है कि दिखावे या ग्लैमर की बजाय सेवा-भाव को प्राथमिकता दी जाए। खासकर जनता से सीधे जुड़े कामों में अधिकारियों को नागरिकों की कमेटियों के साथ मिलकर काम करने के लिए कहा जाना चाहिए ताकि लोगों का भरोसा जीता जा सके और जिनकी सेवा उन्हें करनी है, उनकी असल ज़रूरतों को पूरा किया जा सके। मुंबई का उदाहरण सबके सामने है कि कैसे 1993 के भयानक दंगों के बाद वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थानीय मोहल्ला कमेटियों के साथ मिलकर लोगों का पुलिस पर भरोसा फिर से कायम किया।

अंतत: हम इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते कि नौकरशाही काफी हद तक लोगों की सेवा करने में नाकाम रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रोजेक्ट्स को लागू करने में नौकरशाही की धीमी गति पर नाराजगी जताई है। ठीक उसी तरह जैसे उनसे पहले डॉ. मनमोहन सिंह ने सरकार और सरकारी संस्थानों में सुधारों की बात कही थी। पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सिविल सर्वेंट्स से एक सवाल पूछा जो बहुत मशहूर हुआ था- 'जब आप में लोगों की सेवा करने का जज़्बा ही नहीं है तो आपकी काबिलियत का मैं क्या करूं?' जब इस सवाल में छिपी चुनौती का सामना किया जाएगा तभी नौकरशाही में सुधार आएगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it