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न्यायपालिका की भूमिका और अधिकारों की रक्षा के सवाल

सजीव और सजग लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका अहम रहती है।

न्यायपालिका की भूमिका और अधिकारों की रक्षा के सवाल
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राजेश पांडेय

अदालती फैसलों के अलावा सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुयन की लगातार आ रही टिप्पणियां भी न्यायपालिका में चल रहे विचार मंथन की झलक पेश करती हैं। उन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अदालतों के कई फैसलों की आलोचना की है। सुप्रीम कोर्ट के किसी जज द्वारा न्यायिक फैसलों की खामियों को सामने रखने के उदाहरण दुर्लभ होते जा रहे हैं। बहरहाल, पहले संवैधानिक अदालतों (सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट) के कुछ निर्णयों पर गौर करें।

सजीव और सजग लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका अहम रहती है। वह लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी स्तंभों के बीच संतुलन बनाए रखती है। संवैधानिक मूल्यों, कानून के शासन, नागरिकों की आजादी, समानता और न्याय की रक्षा करती है। जैसा कि मानव अधिकारों के चैम्पियन जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने कहा था, 'न्यायिक समीक्षा अधिकारियों को उनकी सीमाओं के दायरे में रखने के लिए संंवैधानिक नियंत्रण के बतौर काम करती हैÓ। भारत में मनमाने कानूनों, निजी विवादों, सामाजिक अन्याय और शासनतंत्र के दुरुपयोग के खिलाफ अदालतें अक्सर कारगर हथियार साबित होती रही हैं। दूसरी तरफ अलग-अलग अदालतों ने कई फैसलों में सरकारों की मनमानी का समर्थन किया है और संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी की है। कई मौकों पर उनकी भूमिका ने निराश किया है। न्याय की उम्मीद लेकर अदालतों के दरवाजों पर दस्तक देने वाले लोगों को खाली हाथ लौटना पड़ा है। फिर भी, न्यायपालिका ने समय-समय पर सरकारी तंत्र पर अंकुश लगाया है, उसकी जवाबदेही तय की है। इस सिलसिले में अभी हाल में संवैधानिक अदालतों के फैसलों ने ध्यान खींचा है।

अदालती फैसलों के अलावा सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुयन की लगातार आ रही टिप्पणियां भी न्यायपालिका में चल रहे विचार मंथन की झलक पेश करती हैं। उन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अदालतों के कई फैसलों की आलोचना की है। सुप्रीम कोर्ट के किसी जज द्वारा न्यायिक फैसलों की खामियों को सामने रखने के उदाहरण दुर्लभ होते जा रहे हैं। बहरहाल, पहले संवैधानिक अदालतों (सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट) के कुछ निर्णयों पर गौर करें। ये नागरिकों की आजादी, शांतिपूर्ण तरीकों से विरोध जताने के अधिकारों का समर्थन करते हैं। सरकारों के दमन और बुनियादी अधिकारों को कुचलने की कोशिशों को रद्द करते हैं। ये फैसले आगे के लिए नजीर बन सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए 20 जुलाई से 25 जुलाई 2026 के बीच आंदोलनकारी छात्रों पर देश भर में दर्ज सभी एफआईआर को रद्द कर दिया। भारत के चीफ जस्टिस की एक टिप्पणी के बाद इंटरनेट मीम्स के बीच कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म हुआ। इसके झंडे तले छात्रों ने जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के लिए 20 जून से आंदोलन शुरू किया था। 25 जुलाई को प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन पर विराम लगा। छात्रों और सरकार के बीच देशभर में आंदोलनों के संबंध में छात्रों पर दर्ज मामले वापस लेने की सहमति बनी थी। सरकार द्वारा वादा न निभाने के विरोध में छात्रों ने 5 सितंबर को संसद कूच का ऐलान किया। आखिरकार केंद्र और कुछ राज्य सरकारों के आग्रह पर 1 सितंबर को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई में तीन न्यायाधीशों की बेंच ने सभी एफआईआर रद्द कर दी।

2 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की कानून की एक छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) में नोएडा पुलिस द्वारा की गई नजरबंदी को रद्द कर दिया। 13 अप्रैल को नोएडा में न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी की मांग कर रहे कारखाना मजदूरों के आंदोलन से एक दिन पहले आकृति को गिरफ्तार किया गया था। उस पर आगजनी और पथराव के लिए भड़काने का आरोप है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और अचल सचदेव की बेंच ने प्रशासन को पांच लाख रुपए हर्जाना देने और किसी अन्य मामले में गिरफ्तारी की जरूरत न होने की स्थिति में आकृति को फौरन रिहा करने का आदेश दिया। आकृति के खिलाफ नोएडा के पांच पुलिस थानों में मजदूर आंदोलन के संबंध में 11 एफआईआर दर्ज हैं।

सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के बारे में है। लेकिन यह छात्रों से जुड़ा है। 3 सितंबर को देश की सबसे बड़ी अदालत ने निर्णय दिया कि बार काउंसिल को कानून के छात्रों को अनुशासित करने या उन्हें नियमों के दायरे में रखने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने नलसार यूनिवर्सिटी के विधि ग्रेजुएट्स का वकील के रूप में रजिस्ट्रेशन न करने की धमकी देने वाले काउंसिल के आदेश को रद्द कर दिया। यह धमकी छात्रों द्वारा यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने का विरोध करने पर दी गई थी।

बीसीआई अध्यक्ष मनन कुमार मिश्र का कहना था चूंकि उन्होंने नलसार यूनिवर्सिटी को जारी आपत्तिजनक पत्र वापस ले लिया है, लिहाजा मामले को खत्म कर दिया जाए। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीसीआई या राज्यों की बार काउंसिल को विधि छात्रों पर किसी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार नहीं है। बीसीआई के दायरे मेंं केवल वकील आते हैं। कोर्ट ने याचिका कर्ताओं के वकील के इस तर्क से सहमति जताई कि बीसीआई का 13 अगस्त को नलसार यूनिवर्सिटी को जारी पत्र छात्रों के बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी में गहरी सेंध लगाता है।

सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले और इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय मानवीय स्वतंत्रता, गरिमा और सम्मान की रक्षा करने के सशक्त मैसेज देते हैं। वे जोर देते हैं कि असहमति और अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करना कितना जरूरी है। इस कड़ी में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुयन के भाषण इन मूल्यों की रक्षा करने की अहमियत बताते हैं। उन्होंने जजों की नियुक्ति, उनके ट्रांसफर सहित कई मुद्दों को उठाया है। यहां जस्टिस भुयन के कुछ भाषणों का जिक्र काफी है। उन्होंने 25 जुलाई को नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी, भोपाल में जस्टिस जीपी सिंह स्मृति व्याख्यान में कहा कि अपने विचारों की अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों की बुनियादी स्वतंत्रता का हिस्सा हैं। बहस और असहमति लोकतंत्र का मूल हैं। उन्होंने छात्रों के विरोध प्रदर्शनों का हवाला देते हुए कहा कि दुर्भाग्य से सामान्य गतिविधियों को भी आपराधिक माना जा रहा है। उन्होंने बुलडोजर चलाने की कार्रवाई के संबंध में 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा लेकिन फैसला दो साल की देर से आया है।

1 अगस्त को नई दिल्ली में लीगल पॉलिसी विधि सेंटर द्व्रारा आयोजित कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भुुयन ने कहा कि न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता के अभाव से ऐेसे लोग न्यायपालिका में आ सकते हैं जो बाद में लोगों के समूह को चींटियां कहें। उन्होंने ऐसी टिप्पणियों को पूरी तरह असंवैधानिक बताया है। जस्टिस भुुयन ने जजों के ट्रांसफर की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने जनवरी में पुणे में जीवी पंडित मेमोरियल लेक्चर में कहा कि किसी जज का एक हाईकोर्ट से दूसरे हाईकोर्ट में सिर्फ इसलिए तबादला क्यों होना चाहिए कि उन्होंने सरकार के लिए असुविधाजनक कुछ आदेश दिए हैं। उन्होंने कहा वह दिन न्यायपालिका के लिए दुखद होगा जब किसी खास जज की अदालत में मामला जाते ही उस पर आने वाले फैसले का निष्कर्ष निकाल लिया जाएगा।

जस्टिस भुयन ने 30 अगस्त को नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के 13 वें दीक्षांत समारोह में कहा कि अलग राय जाहिर करने या सवाल पूछने वाले छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की धमकी नहीं दी जा सकती है। उन्होंने ऐसी कार्रवाई को असंवैधानिक और सत्ता का दुरुपयोग बताया। लोकतंत्र में प्रश्न पूछने का अधिकार प्रतिरोध की कार्रवाई नहीं है। संवैधानिक लोकतंत्र में राज्य नागरिकों की बात सुने, नागरिक एक-दूसरे की बात सुनें। हमारी संस्थाएं जवाबदेह होनी चाहिए और समाज हर असंतोष को खतरा न समझे। जस्टिस भुयन ने 4 सितंबर को पूर्व सचिव यशोवर्धन आजाद की पुस्तक-पुलिस और रिपब्लिक- का विमोचन करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों से जिस निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है, लगता है, वह खत्म हो रही है। यह गंभीर चिंता का विषय है। हम भारतीय पुलिस सेवा के युवा अधिकारियों को खुद प्रदर्शनकारियों पर हमला करते देखकर दुखी हैं।

जस्टिस उज्जवल भुयन जैसे बेबाक विचार अब न्यायाधीशों की तरफ से कम ही सुनाई पड़ते हैं। भारतीय न्यायपालिका में सरकार के विरोध और मूल्यों को सुरक्षित रखने की लंबी परंपरा रही है। यहां जस्टिस हंसराज खन्ना के एक कदम पर भी गौर करना चाहिए। उसने उच्च न्यायपालिका की निर्भीकता और जजों के साहस पर रोशनी डाली है। इमरजेंसी के समय जस्टिस खन्ना ने 1976 में एडीएम जबलपुर और शिवाकांत शुक्ला के मामले में असहमति जताने वाला निर्णय दिया था। एक हैबियस कार्पस याचिका में मीसा में नजरबंदी को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट की उक्त बेंच के सभी न्यायाधीशों का फैसला था कि देश में आपातकाल के समय नागरिक अपनी निजी स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए अदालत में नहीं जा सकते हैं। सिर्फ जस्टिस खन्ना ने कहा कि जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का अस्तित्व संविधान से पहले मौजूद था। उन्होंने नजरबंदी को गलत बताया था। उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी थी। 1977 में वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस खन्ना को सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया जाना था। लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने उनकी वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए जस्टिस बेग को सीजे बना दिया। इसके विरोध में जस्टिस खन्ना ने इस्तीफा दे दिया। इमरजेंसी के दौर में यह फैसला साहस, स्वाभिमान और गरिमा की रक्षा का प्रतीक था।

जस्टिस खन्ना ने अपने फैसले के जरिये असहमति, असंतोष और प्रतिरोध के महत्व को रेखांकित किया था। उनका उदाहरण दूसरे न्यायाधीशों के लिए प्रेरणा हो सकता है। उनके जैसे उदाहरण कम ही मिलेंगे। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने और इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला हर किसी के लिए आजादी के दायरे का विस्तार करता है। इन फैसलों की सार्थकता उस वक्त होगी जब सरकारें अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करें। इसके साथ जस्टिस भुयन के कथन न्यायपालिका में ऐसे न्यायाधीशों की मौजूदगी पर रोशनी डालते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए काम कर रहे हैं। वे इस तरह की आवाजों को मजबूत बनाते हैं। उन्हें रास्ता दिखाते हैं। और इससे जुड़े सवालों के जवाब देते हैं।


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