ईरान का अद़्भुत जज्बा दुनिया के लिए मिसाल
टाइटैनिक फिल्म का एक अद्भुत दृश्य है, जब जहाज टुकड़े-टुकड़े होकर डूबता है, अमीरों में आपाधापी मची रहती है कि बचाने वाली नावों पर वे किसी भी तरह सवार हो जाएं

- सर्वमित्रा सुरजन
बहरहाल बात ईरान के लोगों की हिम्मत और अनूठी रचनात्मकता की हो रही है। संगीतकार अली ग़मसारी ने दमावंद बिजली संयंत्र के सामने बैठकर संगीत के तार छेड़े, ताकि ईरान की अधोसंरचना पर होने वाले हमलों को रोकने में मदद मिल सके। वहीं ईरान के प्रसिद्ध गायक अली ज़ंदवाकिली ने बुनियादी ढांचे की रक्षा के लिए रेलवे लाइन के किनारे गीत गाए। इधर ईरान के शरीफ विश्वविद्यालय को अमेरिका ने मिसाइल से तबाह किया।
टाइटैनिक फिल्म का एक अद्भुत दृश्य है, जब जहाज टुकड़े-टुकड़े होकर डूबता है, अमीरों में आपाधापी मची रहती है कि बचाने वाली नावों पर वे किसी भी तरह सवार हो जाएं, नीचे गरीबों के निकलने के रास्ते पर दरवाजा बंद करके ताला लगा दिया जाता है, क्योंकि उनकी जान की कीमत नहीं समझी जाती, पूरे जहाज में चीख-पुकार मची रहती है और इस बीच संगीतकारों के दल के सदस्य अपने वाद्य लेकर जाते-जाते ठहरते हैं और एक आखिरी बार अपने संगीत की प्रस्तुति देते हैं। मौत के बीच वे जिंदगी, जिंदादिली और जिजीविषा की अद्भुत संगीत रचना पेश करते हैं।
बीते दिनों ईरान के सुप्रसिद्ध संगीतकार अली ग़मसारी जब इसी तरह तेहरान में दमावंद बिजली संयंत्र के सामने पहुंचे और उन्हें देखकर कई और कलाकार भी इसी तरह अपने वाद्ययंत्रों के साथ प्रस्तुति देने बाहर आए, तो टाइटैनिक के उस दृश्य की ही याद आ गई। ग़मसारी के कई वीडियो सोशल मीडिया पर देखे जा सकते हैं, उन्होंने तेहरान के दमावंद बिजली संयंत्र में अपने वाद्य यंत्रों के साथ पहुंचकर बम के धमाके के जवाब के लिए संगीत के सुरों को चुना। बिजली संयंत्र के सामने दरी बिछाकर अपने वाद्य 'तार' के साथ ग़मसारी बैठे और दो दिनों तक बजाते रहे। उनके इस फैसले के पीछे डोनाल्ड ट्रंप की वह धमकी थी, जिसमें वे ईरान की पूरी सभ्यता को खत्म करने का ऐलान कर रहे थे।
गौरतलब है कि 28 फरवरी के बाद ट्रंप ने कई बार ईरान को कई तरह की धमकियां दीं, लेकिन बीते दिनों उनकी दो धमकियां चर्चा में रहीं। पहले तो उन्होंने ईरान की सैन्य ताकत खत्म करने के दावे के साथ ईरान को पाषाण युग में वापस भेजने की धमकी दी, इसके बाद एक और धमकी देकर मंगलवार रात आठ बजे तक का वक्त दिया कि इसके बाद वे ईरान के बिजली संयंत्रों, पुलों और सड़कों पर ऐसे हमले करेंगे जिससे एक पूरी सभ्यता नष्ट हो जाएगी। ईरान को धमकाने के लिए ट्रंप ने अपशब्दों का इस्तेमाल भी किया, जिसने उनका असली चेहरा दुनिया के सामने खोल कर रख दिया। हालांकि जो लोग ईरान को एक पिछड़ा, अशिक्षित, दकियानूसी, कट्टरपंथी, धर्मान्ध देश मानने की भूल करते थे, क्योंकि अमेरिका ने उनके सामने ईरान की ऐसी ही तस्वीर पेश की थी। उन्हें भी नजर आ गया कि असल में ईरान क्या है। अली ग़मसारी जैसे सैकड़ों-हजारों-लाखों-करोड़ों लोगों ने दुनिया को ईरान के एक ऐसे जुझारू पक्ष को दिखा दिया, जो आज के वक्त में दुर्लभ गुण हो चुका है। प्रसंगवश बता दूं कि युद्ध में अपने देश की सेवा के लिए दुनिया भर से ईरानी जनता वतन वापस लौट गई। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, चीन जैसे तमाम विकसित देशों में आराम का जीवन बिताने का मौका इन अप्रवासी ईरानियों के पास था, लेकिन अपनी सुरक्षा और आराम से पहले इनके लिए देश की रक्षा है, जिसकी खातिर वे लौट आए। जबकि अमूमन यही होता है कि जब किसी देश पर हमला हो या किसी किस्म का संकट आए, तो बाहर बैठे उसके नागरिक खैर मनाते हैं कि अच्छा है हम वहां नहीं हैं। भारत के भी लाखों लोग विदेशों में बसे हैं, जिनके लिए देशप्रेम का मतलब विदेशी धरती पर अपने त्योहार मनाना, अपने सनातनी संस्कारों को पेश करना ही है। भारत वापस आकर ये कभी यहां के प्रदूषण पर नाक-भौं सिकोड़ेंगे, तो कभी यातायात व्यवस्था की हंसी उड़ाएंगे या फिर विदेश में बैठकर देश के लोगों को देशभक्ति का ज्ञान देंगे। ऐसे में ईरान के लोगों का जज़्बा किसी अजूबे से कम नहीं है।
बहरहाल बात ईरान के लोगों की हिम्मत और अनूठी रचनात्मकता की हो रही है। संगीतकार अली ग़मसारी ने दमावंद बिजली संयंत्र के सामने बैठकर संगीत के तार छेड़े, ताकि ईरान की अधोसंरचना पर होने वाले हमलों को रोकने में मदद मिल सके। वहीं ईरान के प्रसिद्ध गायक अली ज़ंदवाकिली ने बुनियादी ढांचे की रक्षा के लिए रेलवे लाइन के किनारे गीत गाए। इधर ईरान के शरीफ विश्वविद्यालय को अमेरिका ने मिसाइल से तबाह किया तो अगले ही दिन गणित के एक प्रोफेसर ने राख और मलबे के बीच बैठकर ही ऑनलाइन क्लास ली, जबकि एक और प्रोफेसर डॉ. मसूद शादनाम ने कहा कि ये हमले ईरान में वैज्ञानिक प्रगति को प्रभावित नहीं कर सकते, क्योंकि इमारतें दोबारा बनाई जा सकती हैं, लेकिन बुद्धि को निशाने पर नहीं लिया जा सकता और विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाले प्रतिभाशाली लोग यहीं रहते हैं। अमेरिका की ईरान को पूरी तरह तबाह करने की धमकी के बीच युवा और खेल मामलों के उपमंत्री अलीरेजा रहीमी ने एक चैनल पर आकर अपने देशवासियों से अपील की कि हम मानवश्रृंखला बनाकर इन धमकियों का जवाब दें, उन्होंने कहा कि, 'बिजली संयंत्र जो हमारी राष्ट्रीय संपत्ति और पूंजी हैं, चाहे किसी भी पसंद या राजनीतिक नजरिए से देखें, वे ईरान और ईरानी युवाओं के भविष्य के हैं। हम सब हाथों में हाथ डालकर यह कहेंगे कि सार्वजनिक ढांचे पर हमला करना युद्ध अपराध है।' मंत्री की इस अपील पर देश के युवा, छात्र, खिलाड़ी, कलाकार, शिक्षक सब हाथों में हाथ डालकर मानवश्रृंखला बनाकर खड़े हो गए।
हम होंगे कामयाब की पंक्तियां याद आ गईं- हम चलेंगे साथ-साथ, डाल हाथों में हाथ, हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन, मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन। ईरान वाकई ऐसे ही कामयाबी की राह पर आगे बढ़ा। तभी तो ट्रंप को सभ्यता खत्म करने की धमकी के बाद यह कहने पर मजबूर होना पड़ा कि हम दो हफ्ते के युद्धविराम के लिए तैयार हैं, हम आगे चर्चा के लिए तैयार हैं, हम ईरान में पुनर्निर्माण के लिए मुआवजा देंगे। दरअसल ईरान को यह कामयाबी, यह नायकत्व अपने नेतृत्व और जनता की अटूट देशभक्ति के जज्बे से हासिल हुआ है। मंगलवार को जब सब कुछ खत्म करने की चेतावनी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दी थी, तो उसके जवाब में उनके समकक्ष ईरान के राष्ट्रपति डॉ.मसूद पेजेशिकयान ने कहा था कि 1.4 करोड़ से अधिक ईरानी लोगों ने देश रक्षा में शहादत के लिए तैयार रहने का इरादा जताया है। मैं भी ईरान के लिए अपनी जान देने के लिए पहले भी तैयार था, अब भी हूं और आगे भी रहूंगा। अब दुनिया देख रही है कि जिस देश का राष्ट्रपति खुद कहे कि मैं शहीद होने के लिए तैयार हूं, और जिस देश के सर्वोच्च नेता ने पहले अपनी शहादत दे दी, क्या उस ईरान को अमेरिका और इजरायल कभी हरा पाएंगे।
याद रहे कि दिवंगत अयातुल्लाह अली खामेनेई के पास मौका था कि वे युद्ध शुरु होते ही किसी बंकर में जाकर रहते ताकि उनकी जान बचे और वे अपने देश का प्रतिनिधित्व कर सकें। उनके सलाहकारों ने उनसे यही गुजारिश भी की थी। खामेनेई के करीबी रहे अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने बताया था कि खामेनेई ने अपने सुरक्षा अधिकारियों से कहा कि अगर वे ईरान के 9 करोड़ लोगों के लिए सुरक्षित शेल्टर का इंतजाम कर सकते हैं, तभी वे अपना घर छोड़कर कहीं और जाएंगे। उनके साथ उनके परिवार वालों ने भी किसी खास सुरक्षा प्रावधान से इंकार कर दिया और 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के हमले में इन सभी ने अपनी शहादत दी। खामेनेई का कहना था कि एक नेता को हमेशा अपनी जनता और गरीबों के बराबर ही रहना चाहिए। अगर कोई नेता अपने लिए अलग और खास जीवन जीने लगे, तो वह देश का नेतृत्व करने के लायक नहीं रहता।
अयातुल्लाह अली खामेनेई के बाद सुरक्षा परिषद के प्रमुख अली लारीजानी भी इसी तरह हमले में मारे गए। और जब तक वे जिंदा थे, उन्हें कई बार ईरान की सड़कों पर आम जनता के साथ, आम जनता के बीच देखे गये। अब राष्ट्रपति डॉ.पेजेशिकयान ने भी शहादत का यही जज्बा दिखाया है। डोनाल्ड ट्रंप से पूछा जाना चाहिए कि क्या असभ्य, खतरनाक और आतंक फैलाने वाले लोग ऐसे होते हैं, क्योंकि ईरान को वे दुनिया की सबसे खतरनाक कौम कहते हैं। ईरान ने साहस और देशभक्ति की नयी मिसाल ही नहीं पेश की, बल्कि इंसानियत और भाईचारा भी दिखाया है। ईरान के दुनिया भर में बने दूतावासों से रोजाना ही ट्रंप और इस युद्ध को लेकर पोस्ट हो रहे हैं, जिनमें कभी तंज होते हैं, कभी मार्मिक संदेश होते हैं। किसी पोस्ट में मीनाब शहर की मृत बच्चियों के साथ जेफ्री एपस्टीन के द्वीपों में यौनशोषण का शिकार बच्चियों को ईरान एक साथ रखकर ट्रंप और नेतन्याहू को उनका दोषी करार दे रहा है, तो किसी में दिवंगत खामेनेई के साथ स्वर्ग में इन बच्चियों को दिखा रहा है। कहीं ट्रंप की पाषाण युग में भेजने वाली धमकी पर उलाहना है। लेकिन इन सबके साथ अमेरिकी जनता को कई बार ये संदेश ईरान ने दिया है कि हमारी दुश्मनी आपसे नहीं है, हम आपका नुकसान नहीं चाहते, लेकिन ट्रंप और नेतन्याहू आपके जीवन को खतरे में डाल रहे हैं।
युद्ध में दुश्मन देश की जनता के लिए भी चिंता होना क्या पाषाण युग के लक्षण हैं या इंसानियत दिखाने की पराकाष्ठा है, ये दुनिया को तय करना है।


