ईरान युद्ध से भारतीय अर्थव्यवस्था को जोरदार झटका संभव
पश्चिम एशिया में चल रहे व्यापक युद्ध, जिसमें अमेरिका-इज़राइल जोड़ी और ईरान शामिल हैं

- नन्तू बनर्जी
भारत को ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करने, लॉजिस्टिक्स को प्रबंधित करने और गैर-ज़रूरी चीज़ों के आयात में भारी कटौती करके अपने व्यापार संतुलन को बचाने पर ध्यान देना चाहिए। अभी के लिए, उसे होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आयात से स्वयं को अलग करना चाहिए, रणनीतिगत रिज़र्व का इस्तेमाल करना चाहिए और मुद्रा के उतार-चढ़ाव को प्रबंधित करना चाहिए।
पश्चिम एशिया में चल रहे व्यापक युद्ध, जिसमें अमेरिका-इज़राइल जोड़ी और ईरान शामिल हैं, और जो इस क्षेत्र के 10 देशों में फैल गया है, से भारत पर बड़ा आर्थिक असर पड़ने की उम्मीद है। इस क्षेत्र में भारत का 120 अरब डॉलर का व्यापार, भारी तेल आयात, कुल भुगतान संतुलन, बाहरी निवेश का आना, विदेश से भारत में धनप्रेषण और रुपये की विनिमय दर की स्थिरता जैसी कई दूसरी चीज़ें दांव पर लगी हैं। इसके कारण भारत सरकार को अगले वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अपने सालाना बजट खर्च और आय के अनुमानों को फिर से लिखना पड़ सकता है।
कच्चे खनिज तेल की कीमतें एक हफ्ते में ही 20प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ गई हैं। देश की कमजोरी लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) की आपूर्ति के मामले में ज़्यादा है, जिसका लगभग 80प्रतिशत पश्चिम एशिया से आता है। तेल की ज़्यादा कीमतों से देश में महंगाई बढ़ना तय है क्योंकि ये परिवहन, रासायनिक खाद के उत्पादन और खेती के उत्पादन की लागत, लॉजिस्टिक श्रृंखला और मैन्युफैक्चरिंग इनपुट से जुड़ी हैं।
भारत के पश्चिम एशिया के साथ आर्थिक संबंध बहुत गहरे हैं। जब ईरान, जिसके पास इस इलाके में बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन का सबसे बड़ा स्टॉक है, इस इलाके के देशों में अपने लक्ष्यों पर खुलेआम हमला कर रहा था, तब भारत की व्यापारिक और आर्थिक गतिविधियां रुक गईं। पश्चिम एशिया में भारत के 99अरब डॉलर के निर्यात का 17 प्रतिशत, कच्चे तेल की ज़रूरत का 55प्रतिशत और हर साल भारत भेजे जाने वाले धन का 38 प्रतिशत हिस्सा उसी क्षेत्र से आता है। खबरों के मुताबिक, लगभग एक करोड़ भारतीय फारस की खाड़ी इलाके में रहते और काम करते हैं, और अपने कमाई में से 51अरब डॉलर से ज़्यादा धन अपने भारत स्थित घर भेजते हैं। प्रवासी कामगारों और पेशेवरों के लिए, भेजा गया धन सिर्फ़ वित्तीय हस्तांतरण से कहीं ज़्यादा है। यह रोज़ी-रोटी, परिवार को सहयोग और आर्थिक स्थिरता दिखाता है।
भारत सरकार ने अमेरिका-इजऱाइल-ईरान के बीच चल रहे युद्ध के चलते लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की कोई कमी न हो, यह पक्का करने के लिए आपातकालीन नियम लागू कर दिए हैं। इस युद्ध से भारत के ऊर्जा आयात पर असर पड़ा है। 7 मार्च को, भारत ने कथित तौर पर पश्चिम एशियाई स्रोत से आपूर्ति में रुकावट के कारण एलपीजी सिलिंडर के दाम बढ़ा दिए। कतर एनर्जी, जो भारत को लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) और उससे जुड़े उत्पादनों का एक बड़ा आपूर्तिकर्ता है, ने ईरानी ड्रोन हमलों के बाद अपनी रास लफ्फान फैसिलिटी में उत्पादन बंद कर दिया है।
ईरान द्वारा अपनी फैसिलिटी पर बमबारी के बाद कतर ने एलएनजी उत्पादन रोक दिया। इसने पेट्रोनेटएलएनजी जैसी भारतीय कंपनियों समेत प्रभावित खरीदारों के संदर्भ में 'फोर्स मेच्योरÓ घोषित कर दिया है, अर्थात स्थितियों पर अधिक शक्तिशाली बल का नियंत्रण है, और इसलिए आपूर्ति और खरीद की जवाबदेही से दोनों पक्ष मुक्त हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल और गैस टैंकरों की आवाजाही में रुकावट आई है, जिसमें खाड़ी के दूसरे आपूर्तिकर्ता भी शामिल हैं। 14.2 किलोग्राम के घरेलू सिलिंडर की कीमत दिल्ली में 60 रुपये बढ़कर 913 रुपये हो गई है। 19 किलोग्राम के वाणिज्यिक सिलिंडर की कीमत में 115 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। अप्रैल 2025 के बाद घरेलू उपभोक्ताओं के लिए यह पहली बड़ी बढ़ोतरी है। बढ़ी हुई कीमतों का असर 33 करोड़ से अधिक भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ता है और इससे महंगाई बढ़ने की उम्मीद है। वाणिज्यिक कीमतों में बढ़ोतरी से रेस्टोरेंट और होटलों में खाने की लागत बढ़ सकती है।
इसी तरह, तेल की कीमतें भी बढ़ रही हैं। हफ़्ते के आखिर तक, ब्रेंटक्रूड ऑयल की कीमतें प्रति बैरल लगभग 30प्रतिशत बढ़ गईं, जो 2024 के स्तर से पहली बार ज़्यादा हो गईं। अमेरिका-इज़राइल-ईरान युद्ध से भारत में ऊर्जा संकट और कुल मिलाकर कीमतों में बढ़ोतरी का खतरा है। देश का लगभग 40 प्रतिशत तेल आयात इसी इलाके से होता है, इसलिए कच्चे तेल की ज़्यादा कीमतों से खाने-पीने की चीज़ों और ऊर्जा की महंगाई बढ़ना तय है। भारतीय रुपया भी बड़े दबाव का सामना कर रहा है, जो रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे घरेलू खर्च और बढ़ गया है।
इलाके की असुरक्षा की वजह से शिपिंग, माल ढुलाई और इंश्योरेंस की लागत बढ़ रही है, जिससे खाड़ी देशों के साथ व्यापार पर असर पड़ रहा है। अगर ऊंची कीमतें बनी रहती हैं, तो अगले वित्तीय वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी की वृद्धि दर पहले के सात प्रतिशत से ज़्यादा के अनुमान से घटकर 6.5प्रतिशत से भी कम हो सकती है। हालांकि भारत युद्ध में शामिल नहीं है, लेकिन देश का खाड़ी ऊर्जा आपूर्ति के साथ गहरा आर्थिक एकीकरण, व्यापार गलियारे का इस्तेमाल, रेमिटेंस फ्लो, शिपिंग और विमानन मार्ग सम्बंध और मुद्रा का प्रवाह पहले से ही उसके व्यापार और शेयर बाजार, बाहरी कर्ज के दबाव और घरेलू और विदेशी निवेश आदि पर असर डाल रहे हैं।
भारत को ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करने, लॉजिस्टिक्स को प्रबंधित करने और गैर-ज़रूरी चीज़ों के आयात में भारी कटौती करके अपने व्यापार संतुलन को बचाने पर ध्यान देना चाहिए। अभी के लिए, उसे होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आयात से स्वयं को अलग करना चाहिए, रणनीतिगत रिज़र्व का इस्तेमाल करना चाहिए और मुद्रा के उतार-चढ़ाव को प्रबंधित करना चाहिए। अभी माना जाता है कि भारत के पास लगभग 50 दिनों का कच्चा तेल और इसके उत्पाद भंडार में है, जिसमें रिफाइनरी और वाणिज्यिक इन्वेंटरी में लगभग 10 करोड़ बैरल हैं। भारत को होर्मुज को बाईपास करने के लिए रूस, अटलांटिक बेसिन (अमेरिका और पश्चिम अफ्रीका) और लैटिन अमेरिका (ब्राज़ील, वेनेज़ुएला) से खरीदारी बढ़ानी चाहिए। भारतीय रिफाइनर हिंद महासागर और अरब सागर में भंडारण किए गए रूसी तेल का इस्तेमाल तुरंत बफर के तौर पर कर सकते हैं। चूंकि भारत के पास सीमित रणनीतिगत एलपीजी रिज़र्व है, इसलिए सरकार दूसरे गैर-होर्मुज मार्गों से आपूर्ति करने वालों से जल्दी शिपमेंट हासिल करने को प्राथमिकता दे सकती है। कृषि उत्पादनों के निर्यात (जैसे ईरान को चाय और बासमती चावल) में संभावित रुकावटों से निपटने के लिए, निर्यातकों को सलाह दी जा सकती है कि वे जोखिम प्रबंधित करने के लिए कॉस्ट, इंश्योरेंस और फ्रेट (सीआईएफ) शर्तों से फ्री ऑन बोर्ड (एफओबी) पर स्विच करें। समय निकलता जा रहा है। सरकार को चल रहे क्रूर खाड़ी युद्ध के व्यापार और आर्थिक असर से निपटने के लिए जल्दी फैसले लेने चाहिए।


