देश के लिए फायदेमंद है चाइल्ड केयर में निवेश करना
न्यूयार्क में मेयर का चुनाव जीतने वाले जोहरान ममदानी की जीत का एक बड़ा कारण शहर के सभी बच्चों के लिए राज्य प्रायोजित चाइल्ड केयर की गारंटी देना था।

— डॉ. पवित्र मोहन- अश्मिता गुलेछा
एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) की पालना योजना के तहत परिकल्पित राज्य प्रायोजित डे-केयर सेंटर में बड़ी संभावनाएं हैं लेकिन वे वर्तमान में महत्वाकांक्षा न होने और कम बजटीय आवंटन से विवश होने से ग्रस्त हैं। मजबूत परिवारों को मजबूत सहायक संरचनाओं की आवश्यकता होगी। समाज और राज्य की जिम्मेदारी है कि वे इन्हें सम्मान के साथ प्रदान करें।
न्यूयार्क में मेयर का चुनाव जीतने वाले जोहरान ममदानी की जीत का एक बड़ा कारण शहर के सभी बच्चों के लिए राज्य प्रायोजित चाइल्ड केयर की गारंटी देना था। लोक कल्याण पर खर्च न करने की नीति रखने वाले, विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रम्प के समय और अमेरिका में दूर-दक्षिणपंथ की नई और यहां तक कि अंधी दिशा में जा रहे देश में यह एक साहसिक वादा था। ममदानी की जीत इंगित करती है कि अमेरिकी मतदाता साहसिक विचारों के साथ काम करते हुए समग्र विकास को बढ़ावा देते हैं। भारत के संदर्भ में बच्चों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए एक बड़ी चुनौती को देखते हुए इस विषय पर गंभीर चर्चा हो सकती है कि कैसे और क्यों बच्चों पर केंद्रित जमीनी स्तर के विकास का एजेंडा विभिन्न दलों के राजनीतिक एजेंडे में वरीयता प्राप्त कर सकता है।
बच्चों को हर जगह एक सुरक्षित, सहायक व पोषण करने वाले वातावरण की आवश्यकता होती है। आधुनिक दुनिया और इसकी अर्थव्यवस्था ने सामाजिक-आर्थिक स्तर पर बच्चों की देखभाल करने के लिए परिवारों की क्षमता को सीमित कर दिया है। छोटे परिवार के आकार, माता-पिता दोनों को घर से बाहर काम करने की आवश्यकता, लंबे समय तक काम के घंटे, लोगों को काम के लिए बाहर जाने की जरूरत; इन सभी मुद्दों ने अपने बच्चों की देखभाल करने की परिवारों की क्षमता को कम कर दिया है।
हालांकि अमीर परिवार निजी चाइल्ड केयर का खर्च उठा सकते हैं और उनके बच्चे घर पर या संस्थानों में बढ़ते रहते हैं, परन्तु गरीब परिवारों में बच्चे समुचित चाइल्ड केयर के बिना बढ़ते हैं जो अक्सर उनकी वृद्धि, विकास और भावनात्मक क्षमता को अत्यंत सीमित कर देते हैं। आमतौर पर किसी भी देखभाल करने वाले की अनुपस्थिति में उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य से भी समझौता किया जाता है।
यह देखा गया है कि ग्रामीण भारत, विशेष रूप से ग्रामीण राजस्थान के कई हिस्सों में पुरुष श्रम-रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन करते हैं जबकि महिलाएं और बच्चे अक्सर पीछे रह जाते हैं। महिलाएं जलाऊ लकड़ी इक_ा करने, पानी लाने, खेतों में काम करने और बुजुर्गों की देखभाल करने का काम करती हैं। उनके पास खुद की या अपने बच्चों की देखभाल करने के लिए समय नहीं होता। अधिकतर ऐसा होता है कि छोटे बच्चे खुद अपनी देखभाल करते हंै या उनका कोई बड़ा भाई-बहन उनकी देखभाल करता है जो अक्सर खुद ही एक छोटा बच्चा होता है। कभी-कभी दादा-दादी को बच्चों की देख-भाल करने का जिम्मा दिया जाता है पर ज्यादातर मामलों में वे स्वयं अपनी शारीरिक स्थितियों के कारण असमर्थ होते हैं। फलत: कई बार ऐसी स्थितियां बनती हैं कि कभी बच्चे कुओं में गिर जाते हैं या जानवरों द्वारा रौंद दिए जाते हैं अथवा अकेलेपन का शिकार हो कर निष्क्रिय पड़े रहते हैं।
राजस्थान की कई बस्तियों में जहां डे-केयर सेंटर चलाये हैं, उनमें देखा गया है कि ऐसे केंद्रों में रखे गए अधिकांश बच्चे अच्छी तरह से विकसित होते हैं और स्कूलों में उन बच्चों की तुलना में बहुत बेहतर प्रदर्शन करते हैं जिन्हें खुद के हाल पर छोड़ दिया जाता है। उनकी माताओं ने यह भी बताया कि जब वे काम के लिए जाती हैं तो अपने बच्चों की भलाई के बारे में उन्हें बहुत कम चिंता रहती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे खुद के आराम के लिए कुछ समय भी निकाल लेती हैं। शहरी अहमदाबाद में कई प्रवासी परिवार निर्माण स्थलों पर काम करते हैं जहां बच्चों को अक्सर इधर-उधर भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है जिससे उन्हें चोट लगने, उनके उपेक्षित रह जाने और कुपोषण का बहुत खतरा होता है। इन स्थलों पर गैर-सरकारी संगठनों और नियोक्ताओं द्वारा प्रबंधित डे-केयर सेंटर इन परिवारों के बच्चों को सुरक्षा, शिक्षा और पोषण प्रदान करते हैं।
इन स्थितियों में बाल देख-भाल सीमित परिस्थितियों में की जाती है जो सरकार की मदद के बिना संचालित होती है और वह एक अधिकार नहीं होता। यह देखते हुए कि विकास के लिए बच्चों के प्रारंभिक वर्ष मूलभूत हैं और परिणामों को आजीवन आकार देते हैं, न्यूनतम निवेश से होने वाले भारी लाभों को देखते हुए और अधिक क्षेत्रों तथा राज्यों में बाल देख-भाल मॉडल का विस्तार करने की आवश्यकता है। इस बारे में किए गये कई अध्ययन इसका समर्थन करते हैं। जर्नल ऑफ ग्लोबल हेल्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 0-3 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए केंद्र-आधारित चाइल्ड केयर पर अध्ययनों की एक प्रणालीगत समीक्षा बच्चों के विकास, पोषण और विकास मेट्रिक्स में सकारात्मक परिणामों से जुड़ी है। 2011 की एक लैंसेट समीक्षा में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि चूंकि बच्चों का विकास हो रहा होता है तो बढ़ते केंद्र-आधारित प्रारंभिक शिक्षण कार्यक्रम बच्चों के संज्ञानात्मक विकास, स्कूल की तैयारी में सुधार करते हैं और मजबूत शैक्षणिक प्रदर्शन का समर्थन करते हैं।
हाशिए में रहने वाले बच्चों के लिए ये लाभ अधिक गहन होते हैं। वैश्विक साक्ष्य से पता चलता है कि संज्ञानात्मक कामकाज और सामाजिक-भावनात्मक कौशल का निर्माण बेहतर शिक्षा, रोजगार तथा वयस्क होने पर कमाई में बदल जाता है। यह गरीबी के अंतर-पीढ़ीगत चक्र को तोड़ने में मददगार होता है। जमैका से एक ऐतिहासिक अध्ययन (गर्टलर, पॉल, एट अल 'लेबर मार्केट रिटर्न्स टू एन अर्ली चाईल्डहुड स्टिमुलेशन इंटरवेन्शन इन जमैका', साईंस- 2014) ने पाया कि जिन बच्चों को पोषण और प्रारंभिक प्रोत्साहन प्राप्त हुआ, उन्होंने 20 साल बाद उन लोगों की तुलना में 25 प्रतिशत अधिक आय अर्जित की जिन्हें ऐसे अवसर और सुविधाएं नहीं मिली थीं।
इसके अलावा, यह दिखाने के लिए अकाट्य सबूत हैं कि कम और मध्यम आय वाले देशों में भी बड़ी संख्या में माताओं को काम करने में सक्षम बनाने में चाइल्ड केयर की उपलब्धता किस प्रकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। जैसे-जैसे अधिक संख्या में माताएं कार्यबल में शामिल होती हैं, समग्र रोजगार दर बढ़ती है। इकानॉमिस्ट इम्पैक्ट के चाइल्ड केयर डिविडेंड इनिशिएटिव ('ब्रिजिंग द एक्सेस गैप' क्वांटिफाइंग द इकोनॉमिक रिटर्न ऑफ पब्लिक इन्वेस्टमेंट इन चाइल्ड केयर') द्वारा किए शोध का अनुमान है कि चाइल्ड केयर सेवाओं तक पहुंच गुणक प्रभाव के माध्यम से हर साल राष्टीय सकल घरेलू उत्पाद में 1 फीसदी तक की वृद्धि हो सकती है।
यह महत्वपूर्ण है कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में कार्यबल में माताओं की कम भागीदारी की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। महिलाओं के लिए यह कीमत व्यक्तिगत और वित्तीय दोनों हैं। यह न केवल कैरियर के विकास को धीमा और कमाई को कम करता है बल्कि उनकी स्वतंत्रता तथा काम देने वाली एजेंसी की क्षमता को भी कम करता है। कम मातृ श्रम शक्ति भागीदारी दर के कारण घरेलू आय नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है जिससे राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक विकास कम होता है। द इकानॉमिस्ट की रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि अपर्याप्त चाइल्ड केयर कितना महंगा हो सकता है- नाइजीरिया में लगभग पांच में से एक बच्चा स्कूल जाने की उम्र से कम का है और अधिकांश छोटे बच्चों की देखभाल घर पर की जाती है। वहां 2022 में महिलाओं की काम करने की सीमित क्षमता के कारण देश के सकल घरेलू उत्पाद का 1.09 प्रतिशत आय का नुकसान हुआ।
चाइल्ड केयर उद्योग में सृजित नौकरियों के कारण आर्थिक लाभ भी उत्पन्न होते हैं। चाइल्ड केयर में निवेश करना महिलाओं और बच्चों को उनकी पूरी क्षमता का एहसास दिलाने के साथ ही लघु और दीर्घकालिक आर्थिक लाभ को अनलॉक करने का एक स्पष्ट मार्ग दिखाता है। यदि पूर्व-प्राथमिक आयु वर्ग के प्रत्येक छोटे बच्चे के पास चाइल्ड केयर तक पहुंच होती तो 2023 और 2030 के बीच लाखों माताएं कमाई कर सकती थीं। उपरोक्त रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि अकेले भारत में 62 लाख माताएं कार्यबल में शामिल हो सकती हैं।
एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) की पालना योजना के तहत परिकल्पित राज्य प्रायोजित डे-केयर सेंटर में बड़ी संभावनाएं हैं लेकिन वे वर्तमान में महत्वाकांक्षा न होने और कम बजटीय आवंटन से विवश होने से ग्रस्त हैं। मजबूत परिवारों को मजबूत सहायक संरचनाओं की आवश्यकता होगी। समाज और राज्य की जिम्मेदारी है कि वे इन्हें सम्मान के साथ प्रदान करें। हर जगह बच्चों को अच्छी चाइल्ड केयर की आवश्यकता होती है- चाहे वह न्यूयॉर्क में हो, अमेरिका का एक शहर या ग्रामीण राजस्थान की एक बस्ती 'नया घर' में हो।
इस तरह की देखभाल प्रदान करने की जिम्मेदारी देश की है।
(डॉ. पवित्र मोहन बेसिक हेल्थकेयर सर्विसेज की सह-संस्थापक एवं अश्मिता गुलेच्छा बेसिक हेल्थकेयर सर्विसेज में रिसर्च एंड पॉलिसी एग्जीक्यूटिव हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


