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कारोबार और सत्ता के रिश्ते पर गहराती बहस

उज्जैन में सिंहस्थ की तैयारियों के कारण आने वाले वर्षों में भूमि का महत्व और बढ़ना तय है।

कारोबार और सत्ता के रिश्ते पर गहराती बहस
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  • राजु कुमार

उज्जैन में सिंहस्थ की तैयारियों के कारण आने वाले वर्षों में भूमि का महत्व और बढ़ना तय है। सड़क, बायपास, कॉरिडोर, आवासीय और व्यावसायिक विस्तार जैसी घोषणाएं किसी भी शहर के भूमि बाजार को सीधे प्रभावित करती हैं। उज्जैन भूमि प्रकरण को उस व्यापक विकास परिदृश्य में भी देखने की आवश्यकता है, जो इस समय पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल रहा है।

मध्यप्रदेश की राजनीति में समय-समय पर ऐसे विवाद सामने आते रहे हैं, जिन्होंने सत्ता और संपत्ति के रिश्ते पर सवाल खड़े किए हैं। अभी हाल ही में राष्ट्रीय दैनिक इंडियन एक्सप्रेस की विस्तृत जांच रिपोर्ट ने दावा किया है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के परिवार, करीबी रिश्तेदारों और उनसे जुड़ी कंपनियों ने पिछले दो वर्षों में उज्जैन और उसके आसपास बड़े स्तर पर भूमि खरीदी की है। रिपोर्ट में विशेष रूप से इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है कि इन खरीदों का एक बड़ा हिस्सा उन क्षेत्रों में दिखाई देता है, जहां सड़क परियोजनाएं, कॉरिडोर, बायपास, भूमि उपयोग परिवर्तन या अन्य विकास गतिविधियां प्रस्तावित अथवा क्रियान्वित हो रही हैं यानी इस खरीदी में एक खास पैटर्न दिखाई देता है।

रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस, वाम दलों और अन्य विपक्षी दलों ने मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। दूसरी ओर भाजपा ने इस प्रकरण पर जवाब दिया है कि मुख्यमंत्री के रिश्तेदार स्वतंत्र कारोबारी हैं और उनके निजी लेन-देन को मुख्यमंत्री से जोड़ना उचित नहीं है।

दो दशक पहले शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद सामने आया डंपर प्रकरण भी ऐसा ही एक मामला था। उस विवाद में भी शुरुआती बहस किसी अपराध के सिद्ध होने की नहीं थी। लेकिन आरोप इतने गंभीर थे कि मामला अदालतों तक पहुंचा, जांच हुई और वर्षों तक मध्यप्रदेश की राजनीति में बहस का विषय बना रहा।

डॉ.मोहन यादव का परिवार लंबे समय से रियल एस्टेट कारोबार में सक्रिय रहा है। उज्जैन उनका गृह नगर है। आने वाले सिंहस्थ को देखते हुए वहां लगातार विकास कार्यों की घोषणाएं हो रही हैं। ऐसी स्थिति में यदि परिवार या रिश्तेदार भूमि खरीदते हैं, तो केवल इसी आधार पर सीधे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता कि इसमें घोटाला हुआ है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा पैटर्न क्यों दिखाई दे रहा है? यदि एक खोजी रिपोर्ट भूमि अभिलेखों, मास्टर प्लान, सड़क परियोजनाओं और भूमि खरीद के बीच एक संबंध रेखांकित करती है, तो उसे केवल राजनीतिक आरोप कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में कई बार सवाल किसी एक लेन-देन से नहीं, बल्कि अनेक घटनाओं के बीच दिखाई देने वाले क्रम और प्रवृत्ति से पैदा होते हैं। उज्जैन भूमि प्रकरण में भी यही स्थिति है।

उज्जैन में सिंहस्थ की तैयारियों के कारण आने वाले वर्षों में भूमि का महत्व और बढ़ना तय है। सड़क, बायपास, कॉरिडोर, आवासीय और व्यावसायिक विस्तार जैसी घोषणाएं किसी भी शहर के भूमि बाजार को सीधे प्रभावित करती हैं। उज्जैन भूमि प्रकरण को उस व्यापक विकास परिदृश्य में भी देखने की आवश्यकता है, जो इस समय पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल रहा है। सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के तहत उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों में हजारों करोड़ रुपये की अधोसंरचना परियोजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं। मार्च 2025 तक सिंहस्थ से जुड़े 2,329 करोड़ रुपये के कार्य विभिन्न विभागों के माध्यम से प्रगति पर थे। इसके अतिरिक्त जल संसाधन विभाग की 2,533 करोड़ रुपये की तीन परियोजनाएं, ऊर्जा विभाग की 329 करोड़ रुपये की छह परियोजनाएं, 9,650 करोड़ रुपये की दो और चार लेन सड़क परियोजनाएं, 382 करोड़ रुपये की पर्यटन परियोजनाएं तथा 259 करोड़ रुपये की सांस्कृतिक परियोजनाएं प्रस्तावित अथवा क्रियान्वित हैं। मेडिसिटी और मेडिकल कॉलेज जैसी स्वास्थ्य परियोजनाएं भी इस विकास योजना का हिस्सा हैं। राज्य सरकार केंद्र से सिंहस्थ के लिए 20,000 करोड़ रुपये के विशेष पैकेज की मांग भी कर चुकी है।

ऐसी परिस्थितियों में यदि सत्ता के करीब माने जाने वाले परिवार और उससे जुड़े कारोबारी समूह उन्हीं इलाकों में सक्रिय दिखाई देते हैं, तो जनता के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। यदि किसी खोजी रिपोर्ट में विकास परियोजनाओं और भूमि निवेश के बीच एक विशेष मेल सामने आता है, तो मामला केवल जमीन खरीदने का नहीं रह जाता। वह विकास की दिशा, भूमि निवेश और सार्वजनिक पद की नैतिक जवाबदेही से भी जुड़ जाता है। ऐसे प्रश्नों पर स्वतंत्र जांच की मांग को अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता।

कांग्रेस का तर्क है कि उसने मुख्यमंत्री की जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि पर सवाल नहीं उठाया है, बल्कि भूमि खरीद और विकास परियोजनाओं के बीच दिखाई दे रहे संबंधों पर सवाल खड़े किए हैं। भाजपा की ओर से इसे पिछड़े वर्ग के नेतृत्व को बदनाम करने का प्रयास बताया गया है। यह राजनीतिक जवाब हो सकता है, लेकिन इससे मूल सवाल का समाधान नहीं होता। यदि संदेह भूमि सौदों को लेकर है, तो उसका उत्तर भूमि सौदों और उनसे जुड़े तथ्यों से ही आएगा। जांच की मांग को केवल विपक्षी राजनीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यदि वास्तव में सभी भूमि खरीद सामान्य कारोबारी गतिविधियों का हिस्सा हैं एवं विकास परियोजनाओं और जमीन खरीद के बीच कोई अनुचित संबंध नहीं है, तो निष्पक्ष जांच का सामना करना चाहिए।

इस पूरे विवाद का राजनीतिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मुख्यमंत्री बनने के बाद यह डॉ. मोहन यादव से जुड़ा पहला बड़ा व्यक्तिगत विवाद बनकर उभरा है। यदि आने वाले दिनों में और दस्तावेज, नए तथ्य या अतिरिक्त भूमि लेन-देन सामने आते हैं, तो विवाद और गहरा सकता है। जुलाई में विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। स्वाभाविक है कि विपक्ष इस मुद्दे को सदन में भी उठाएगा।

उज्जैन भूमि प्रकरण में जरूरी है कि राजनीतिक बयानबाजी से ऊपर उठकर तथ्यों की निष्पक्ष जांच हो। क्योंकि इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल अभी भी अनुत्तरित है। यदि सब कुछ सामान्य है, तो फिर सत्ता और संपत्ति के बीच यह पैटर्न बार-बार दिखाई क्यों दे रहा है? और यदि यह केवल संयोग है, तो इसकी पुष्टि करने का सबसे अच्छा तरीका स्वतंत्र जांच ही है।


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