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भारत के क्षेत्रीय दिग्गज कर रहे 'उत्तर के शासकों' की घेराबंदी का सामना

हम यहां भारतीय संघ के बारे में दो बिल्कुल अलग-अलग दृष्टिकोणों के टकराव को देख रहे हैं।

भारत के क्षेत्रीय दिग्गज कर रहे उत्तर के शासकों की घेराबंदी का सामना
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-टी एन अशोक

हम यहां भारतीय संघ के बारे में दो बिल्कुल अलग-अलग दृष्टिकोणों के टकराव को देख रहे हैं। एक तरफ, क्षेत्रीय सत्ताधारी दल 'बहुलवादी प्रतिरोध' का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां राज्य की पहचान ही राजनीति का मुख्य आधार होती है। दूसरी तरफ, भाजपा 'केंद्रीकृत एकीकरण' का प्रतिनिधित्व करती है, जो इन क्षेत्रीय गढ़ों को शासन के एक ही, राष्ट्रीय दृष्टिकोण को लागू करने में अंतिम बाधाओं के रूप में देखती है।

भारत का चुनावी नक्शा कोई एक जैसी चीज़ नहीं है। यह अलग-अलग, और अक्सर अपनी बात पर अड़े रहने वाले राजनीतिक अंदाज़ों का एक संग्रह है। जैसे-जैसे तमिलनाडु में चुनाव प्रचार के आखिरी घंटे चल रहे हैं और पश्चिम बंगाल एक बड़ी दांव वाली, दो चरणों वाली लंबी चुनावी दौड़ के अन्तिम चरण की ओर बढ़ रहा है, उनके पीछे का संदेश एक ही है जिस पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी भी है। संदेश है कि वे पारंपरिक क्षेत्रीय गढ़, जो लंबे समय से भारतीय संघवाद की मज़बूत दीवारें बने हुए थे, अब धीरे-धीरे और सोची-समझी रणनीति के तहत जोरदार घेराबंदी का सामना कर रहे हैं।

दशकों तक, भारतीय लोकतंत्र की कहानी राज्यों की भाषाओं में लिखी जाती रही। चेन्नई में, यह 'द्रविड़ मॉडल' था, जिसकी पहचान करिश्मा और अस्मिता से होती थी। कोलकाता में, यह 'कैडर मशीन' थी, जिसकी पहचान वैचारिक वर्चस्व से होती थी।

लेकिन 2026 की गर्मियों में, ये क्षेत्रीय किले यह महसूस कर रहे हैं कि आरामदेह और बिना किसी चुनौती वाले वर्चस्व का दौर अब खत्म होने वाला है। इसकी जगह अब एक राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक मशीन के दखल के खिलाफ़ एक सीधी और ज़ोरदार लड़ाई ने ले ली है।

चेन्नई के उमस भरे और हलचल भरे गलियारों में, एम. के. स्टालिन न सिफ़र् अपने विरोधियों से, बल्कि अतीत के साये से भी लड़ रहे हैं। 'भगवान-राजा' का दौर—यानी एम. जी. रामचंद्रन या जयललिता जैसे फ़िल्मी अंदाज़ वाले, आम इंसान से कहीं बढ़कर माने जाने वाले मसीहाओं का दौर—अब खत्म हो चुका है। उन्होंने अपने पीछे एक ऐसा खालीपन छोड़ दिया है जिसे कोई भी भाषणबाज़ी नहीं भर सकती।

स्टालिन ने राजनीतिक शायरी की जगह प्रशासनिक गद्य को अपनाने की कोशिश की है। उनकी सरकार गठबंधन बनाने की एक बहुत ही सधी हुई और पेंचीदा बुनावट वाली है: जिसमें किसानों के संगठनों, अलग-अलग समुदायों और वामपंथी झुकाव वाले छोटे-छोटे गुटों के अलग-अलग हितों को एक साथ पिरोया गया है। यह एक ज़बरदस्त और आधुनिक रणनीति है, लेकिन यह नाज़ुक भी है।

भाजपा, जो अन्नाद्रमुक के कंधे पर सवार है, ने इस नाज़ुकता को पहचान लिया है। वे सीधे-सीधे जीत हासिल करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं—जो कि द्रविड़ धरती पर किसी राष्ट्रीय पार्टी के लिए अभी भी पहुंच से बाहर की बात है—लेकिन वे बड़ी होशियारी से द्रमुक के जीत के अंतर को कमज़ोर कर रहे हैं। अनुमानों से पता चलता है कि द्रमुक, जिसके पास 2021 में 133 सीटें थीं, फिसल कर बहुत कम यानी 115-120 सीटों पर आ सकती है।

स्टालिन की शासन शैली, जो नई दिल्ली के खिलाफ 'टकराव वाले संघवाद' पर आधारित है, उनके शासन को राष्ट्रीय वर्चस्व का एकमात्र विकल्प बनाने का एक सोचा-समझा प्रयास है। लेकिन अगर सीटें कम होती हैं, तो द्रमुक का स्थिर बहुमत एक 'त्रिशंकु विधानसभा' की उथल-पुथल में बदल सकता है। यदि ऐसा होता है तो इससे यह साबित हो जाएगा कि एक सुव्यवस्थित गठबंधन भी उस राष्ट्रीय पार्टी के लगातार दबाव का मुकाबला नहीं कर सकता, जो हर एक निर्वाचन क्षेत्र के लिए, इंच-दर-इंच लड़ने को तैयार हो।

अगर तमिलनाडु एक शतरंज का खेल है, तो पश्चिम बंगाल एक सड़क की लड़ाई है। इस राज्य का राजनीतिक विकास बहुत तेज़ और क्रूर रहा है: वामपंथ का तीन दशकों का वर्चस्व 2011 में खत्म हो गया, और उसके बाद पैदा हुए खालीपन में, दो विरोधी ताकतों के बीच एक निर्णायक युद्ध छिड़ गया है।

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अभी भी मुख्य ताकत बनी हुई है, लेकिन भाजपा का बढ़ता ग्राफ ही इस चुनाव की असली कहानी है। खुद को एकमात्र विपक्षी दल के रूप में पेश करके, भाजपा ने इस मुकाबले को और भी अहम बना दिया है, और इसे केंद्र बनाम राज्य की सत्ता के बीच एक जनमत संग्रह में बदल दिया है।

गणित का हिसाब-किताब बहुत ही कड़ा है। भाजपा सौ का आंकड़ा पार करने के लिए ज़ोरदार कोशिश कर रही है—ताकि उसकी सीटों की संख्या तीन अंकों (90-110) तक पहुंच जाए। टीएमसी के लिए चुनौती अपनी मौजूदा स्थिति को बनाए रखने का है। हालांकि 213 सीटों से घटकर 185 सीटें होना—या सबसे बुरे हालात में 155 सीटें भी रह जाना—ममता बनर्जी को साधारण बहुमत तो दिला ही देगा, लेकिन यह एक बहुत बड़े बदलाव का संकेत होगा। यह टीएमसी के पूर्ण वर्चस्व के अंत और भाजपा के एक स्थायी, मज़बूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित होने का संकेत होगा; उस राज्य में, जहां एक दशक पहले तक भाजपा के लिए सांस्कृतिक रूप से पैठ बनाना लगभग नामुमकिन माना जाता था।

हम यहां भारतीय संघ के बारे में दो बिल्कुल अलग-अलग दृष्टिकोणों के टकराव को देख रहे हैं। एक तरफ, क्षेत्रीय सत्ताधारी दल 'बहुलवादी प्रतिरोध' का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां राज्य की पहचान ही राजनीति का मुख्य आधार होती है। दूसरी तरफ, भाजपा 'केंद्रीकृत एकीकरण' का प्रतिनिधित्व करती है, जो इन क्षेत्रीय गढ़ों को शासन के एक ही, राष्ट्रीय दृष्टिकोण को लागू करने में अंतिम बाधाओं के रूप में देखती है।

राष्ट्रीय दल—कांग्रेस और भाजपा—अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए अलग-अलग रास्ते अपना रहे हैं। तमिलनाडु में कांग्रेस, जो एक छोटी सहयोगी पार्टी है, अभी भी क्षेत्रीय ताकतों के सहारे ही आगे बढ़ रही है। वहीं दूसरी ओर, भाजपा ने छोटी सहयोगी की भूमिका को त्याग दिया है और इसके बजाय राष्ट्रीय राजनीति में एक आक्रामक अगुवा की भूमिका निभाने का फैसला किया है।

अप्रैल 2026 का असली जनादेश केवल सीटों की संख्या में ही नहीं, बल्कि इन राज्यों की ढांचागत मज़बूती में देखने को मिलेगा। क्या कोई क्षेत्रीय पार्टी केवल एक सक्षम सरकार चलाकर ही टिक सकती है, या उसे एक 'दिग्गज' बनने के करिश्मे की भी ज़रूरत होती है?

तमिलनाडु में, इस सवाल का जवाब फिलहाल विधानसभा की सीटों पर मिल रहे बेहद करीबी चुनावी नतीजों में लिखा जा रहा है। पश्चिम बंगाल में, इसकी परीक्षा केंद्रीय एजेंसियों के दबाव और मतदाता सूची से जुड़े विवादों वाले एक बेहद ही अस्थिर और तनावपूर्ण माहौल में हो रही है। चाहे ये गढ़ अपनी मज़बूती बनाए रखें या फिर ढह जाएं, भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक स्थायी बदलाव आ रहा है: क्षेत्रीय वर्चस्व का दौर अब खत्म हो रहा है और उसकी जगह लगातार चलने वाले, राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक संघर्ष का दौर शुरू हो रहा है।

जैसे-जैसे ये राज्य चुनावों की ओर बढ़ रहे हैं, इन चुनावों के नतीजों का असर नई दिल्ली और राज्यों की राजधानियों के बीच सत्ता के संघीय संतुलन की अनिश्चितता के रूप में सामने आता दिख रहा है।


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