पीएफबीआर की सफलता से शुरू होगी भारत की असली चुनौती
भारत के विस्तार पर सबसे बड़ी बाधा विखंडनीय प्लूटोनियम भंडार है, विशेष रूप से 2035-2045 के बीच।

— एस रघोत्तम
भारत के विस्तार पर सबसे बड़ी बाधा विखंडनीय प्लूटोनियम भंडार है, विशेष रूप से 2035-2045 के बीच। वर्तमान में ब्रीडर कार्यक्रम सीमित संख्या में असुरक्षित रिएक्टरों से प्राप्त प्लूटोनियम पर निर्भर है। वहीं, भारत ने अपने सुरक्षित रिएक्टरों के लिए आयातित यूरेनियम से खर्च किया हुआ ईंधन जमा कर लिया है। यह महत्वपूर्ण प्लूटोनियम बेकार पड़ा है।
अभी खत्म हुए अप्रैल की शुरुआत में भारत के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (उन्नत परमाणु रिएक्टर- पीएफबीआर) की सफलता ने, जो बिजली उत्पादन के दौरान खर्च किए गए ईंधन की तुलना में अधिक नया ईंधन उत्पन्न करता है, एक बहुप्रतीक्षित उपलब्धि को चिह्नित किया है। इसने 1950 के दशक में होमी जहांगीर भाभा द्वारा परिकल्पित तीन स्तरीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण में भारत के परिचालन प्रवेश का संकेत दिया है। यह उपलब्धि बहुत बड़ी है- दशकों तक प्रौद्योगिकी से वंचित रहने और संदेह व अनिश्चितता के बावजूद भारत ने अपने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के दम पर दृढ़ संकल्पित होकर व्यावसायिक पैमाने पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (एफबीआर) का निर्माण किया है।
फिर भी हमें सोशल मीडिया और यहां तक कि मुख्यधारा के मीडिया में व्याप्त प्रचार से परे देखना होगा। पीएफबीआर अंतिम लक्ष्य नहीं है। वास्तव में यह वह बिंदु है जहां कार्यक्रम अपने सबसे कठिन चरण में प्रवेश करता है। सवाल यह है कि क्या भारत इस कार्यक्रम को देश की बढ़ती ऊर्जा सम्बन्धी जरूरतों और वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन के लिए प्रासंगिक बनाए रखने के लिए औद्योगिक पैमाने पर तेजी से विकसित कर सकता है।
भाभा के कार्यक्रम का तर्क अक्सर एक सुव्यवस्थित प्रगति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है- चरण 1 यूरेनियम रिएक्टर प्लूटोनियम को उप-उत्पाद के रूप में उत्पन्न करते हैं; चरण 2 एफबीआर उस प्लूटोनियम का उपयोग करके अधिक विखंडनीय पदार्थ का उत्पादन करते हैं और चरण 3 एक स्व-संचालित थोरियम चक्र पर चलता है। हमारी आज की अड़चन रिएक्टर नहीं बल्कि विखंडनीय भंडार- प्लूटोनियम है।
परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुमानों और हालिया बयानों के अनुसार भारत के पास पीएफबीआर और दो अन्य 500 मेगावाट के रिएक्टर, एफबीआर 1 और 2 को शुरू करने एवं चलाने के लिए पर्याप्त पृथक प्लूटोनियम है। यदि आज अंतिम स्वीकृति व निधि मिल जाती है और निर्माण कार्य सुचारू रूप से चलता है तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि ये इकाइयां वर्ष 2035 तक चालू हो जाएंगी। हालांकि तैयार ईंधन की आपूर्ति यहीं समाप्त हो जाती है।
ब्रीडर रिएक्टरों का नाम उनकी खपत से अधिक ईंधन उत्पादन करने की क्षमता के आधार पर रखा गया है लेकिन यह दर ब्रीडिंग अनुपात पर निर्भर करती है। मिश्रित ऑक्साइड (एमओएक्स) ईंधन का उपयोग करने वाले पीएफबीआर और एफबीआर 1 और 2 के लिए ब्रीडिंग अनुपात मामूली 1.03 से 1.05 है। इसके परिणामस्वरूप कूलिंग, रिप्रोसिसिंग और ईंधन में पुन: निर्माण को ध्यान में रखते हुए सिस्टम के दोगुना होने का समय लगभग 30 वर्ष है। यानी प्रत्येक रिएक्टर को एक और इकाई शुरू करने के लिए पर्याप्त अधिशेष प्लूटोनियम उत्पन्न करने में इतना समय लगेगा। इस दर पर एफबीआर कार्यक्रम का विस्तार संभव नहीं होगा। इसमें ठहराव आ जाएगा।
अगले एक दशक और उससे भी अधिक समय तक यह विस्तार नए रिएक्टरों के निर्माण पर कम और भारत के प्रथम चरण के दाबयुक्त भारी जल रिएक्टरों (पीएचडब्ल्यूआर) से प्रयुक्त ईंधन के पुनर्संसाधन पर अधिक निर्भर करेगा। भारत के प्रयुक्त ईंधन में कई टन अविभाजित प्लूटोनियम मौजूद है। इस सामग्री को प्रचलन में लाना ही पहले तीन रिएक्टरों से आगे एफबीआर विस्तार की गति निर्धारित करेगा।
यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बुनियादी ढांचा अभी भी इस स्तर तक नहीं पहुंच पाया है। तारापुर में एकीकृत परमाणु पुनर्चक्रण संयंत्र (इंटीग्रेटेड न्यूक्लियर रिसायकलिंग प्लांट- आईएनआरपी) क्षमता का विस्तार करेगा लेकिन इसके 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है और इसकी उत्पादन क्षमता केवल 3-4 और सभी एफबीआर की जरूरत पूरा कर पाएगा। इस बीच, एफबीआर ईंधन के पुनर्संसाधन के लिए निर्मित कल्पक्कम स्थित फास्ट रिएक्टर फ्यूल साइकिल फैसिलिटी (एफआरएफसीएफ) में 2030 तक विलंब हो गया है। यहां तक कि परिचालन में आने पर भी इसकी क्षमता केवल प्रारंभिक तीन रिएक्टरों के लिए ही निर्धारित है। जब तक पुनर्संसाधन क्षमता में पर्याप्त विस्तार नहीं किया जाता, रिएक्टरों का अगला सेट संभवत: 2045 के बाद ही शुरू हो पाएगा और थोरियम की ओर सार्थक परिवर्तन 2060 के बाद ही संभव हो सकेगा।
भारत के पास इतना समय नहीं है। दो संरचनात्मक बदलावों ने समय सीमा को कम कर दिया है। पहला है ऊर्जा परिवर्तन; भारत को 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य को पूरा करने, औद्योगिक रूप से प्रतिस्पर्धी बने रहने और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अगले दो दशकों के भीतर बड़े पैमाने पर स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार करना होगा। दूसरा है मांग की प्रकृति: कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उदय और हाइपरस्केल डेटा सेंटर मॉडल।
इन केंद्रों को चौबीसों घंटे लगातार, उच्च घनत्व वाली बिजली की आवश्यकता होती है। अत्यधिक महंगे भंडारण के बिना नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत ऐसी बिजली प्रदान नहीं कर सकते। परमाणु विखंडन ही एकमात्र ऐसा स्रोत है जो स्वच्छ, हर मौसम में पर्याप्त मात्रा में बिजली प्रदान कर सकता है और यही कारण है कि दुनिया इसकी ओर लौट रही है।
अमेरिका 2050 तक अपनी क्षमता को चार गुना बढ़ाकर 400 गीगावाट करना चाहता है जबकि चीन का लक्ष्य 500 गीगावाट है। भारत ने 2047 तक 100 गीगावाट का लक्ष्य रखा है। इस विस्तार का अधिकांश हिस्सा कम से कम 2040 तक यूरेनियम आधारित होगा जो एक धीमा, महंगा और अपव्ययी मार्ग है; और भारत के लिए, हथियारों से लैस आपूर्ति श्रृंखलाओं और अवरोधों के इस दौर में एक संभावित रणनीतिक जाल है। भारत का एफबीआर कार्यक्रम एक बड़ा लाभ है लेकिन तभी जब इसे अब से 2040 के बीच तेजी से बढ़ाया जाए अन्यथा भारत पीछे रह जाएगा।
रूस अपनी प्रोरिव (ब्रेकथ्रू) परियोजना को आगे बढ़ा रहा है जो एक एकीकृत मॉडल है जिसमें लेड कूल्ड ब्रीडर (ब्रेस्ट-ओडी-300) को वहां स्थित ईंधन सुविधाओं के साथ जोड़ा गया है। यह भारत के कल्पक्कम मॉडल के समान है लेकिन इसे निर्यात के लिए डिज़ाइन किया गया है। चीन ने 2023 के अंत में अपने पहले वाणिज्यिक पैमाने के ब्रीडर सीएफआर-600 को चालू करके भारत को पीछे छोड़ दिया और इस वर्ष दूसरी इकाई भी चालू हो गई है। चीन ने मोल्टन सॉल्ट रिएक्टरों (एमएसआर) के मामले में भी वैश्विक स्तर पर बढ़त हासिल कर ली है जो थोरियम के उत्पादन के लिए ब्रीडर मार्ग को पूरी तरह से दरकिनार कर सकते हैं।
टेरापावर, कोपेनहेगन एटॉमिक्स और मोल्टेक्स जैसी पश्चिमी स्टार्टअप कंपनियां भी थोरियम के उपयोग और अपशिष्ट में कमी लाने के लिए फास्ट रिएक्टर और एमएसआर (मल्टीपल स्केलर) बनाने की होड़ में लगी हैं। यदि इनमें से कोई भी मॉडल पहले सफल हो जाता है तो भारत के कार्यक्रम पर अपना रास्ता छोड़ने का दबाव पड़ेगा। हमारे अपने पीएचडब्ल्यूआर कार्यक्रम के साथ ऐसा ही हुआ क्योंकि यह समय पर सफल नहीं हो पाया इसलिए हमने कुडनकुलम में रूसी रिएक्टरों का सहारा लिया। एफबीआर कार्यक्रम के लिए भी यही जोखिम मौजूद है।
भारत के विस्तार पर सबसे बड़ी बाधा विखंडनीय प्लूटोनियम भंडार है, विशेष रूप से 2035-2045 के बीच। वर्तमान में ब्रीडर कार्यक्रम सीमित संख्या में असुरक्षित रिएक्टरों से प्राप्त प्लूटोनियम पर निर्भर है। वहीं, भारत ने अपने सुरक्षित रिएक्टरों के लिए आयातित यूरेनियम से खर्च किया हुआ ईंधन जमा कर लिया है। यह महत्वपूर्ण प्लूटोनियम बेकार पड़ा है क्योंकि हमारे पास सुरक्षित पुनर्संसाधन की सुविधा नहीं है।
इसका समाधान यह है कि नागरिक विस्तार को सैन्य कार्यक्रम से अलग किया जाए- जैसा कि एक दोहरी प्रणाली के माध्यम से भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के तहत यूरेनियम प्राप्त करने के मामले में किया गया था-
पहली प्रणाली: रणनीतिक उद्देश्यों के लिए फी एफबीआर, एफबीआर-1 व 2 और संबंधित ईंधन सुविधाओं को असुरक्षित प्रणाली में बनाए रखा जाए।
दूसरी प्रणाली: एक सुरक्षित प्रणाली का निर्माण किया जाए- एफबीआर 3 और उसके बाद के संयंत्र और आयातित यूरेनियम से प्राप्त उपयोग में लाए? गए ईंधन में मौजूद प्लूटोनियम का उपयोग करने वाली नई पुनर्संसाधन और ईंधन निर्माण सुविधाएं।
यह वाणिज्यिक प्रणाली आयातित यूरेनियम को एफबीआर के तीव्र विस्तार के लिए ईंधन के रूप में उपयोग करने की अनुमति देगी जिससे 100 गीगावॉट के लक्ष्य को गति मिलेगी। यह 2035-2040 की समय सीमा में थोरियम ब्लैंकेट की शुरुआत की भी अनुमति देगी ताकि 2045-2050 तक थोरियम रिएक्टरों में परिवर्तन शुरू करने के लिए आवश्यक यू-233 भंडार का निर्माण किया जा सके।
इन सब के लिए स्पष्टता, दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और तत्काल निर्णय लेने की आवश्यकता है। पीएफबीआर की सफलता से सरकार को आगे बढ़ने का आत्मविश्वास मिलना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


