भारत को चीन के प्रति सख्त रवैया अपनाने की जरूरत
दुनिया की दो बड़ी ताकतों भारत और चीन के बीच रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण हैं। दोनों देशों के बीच 1962 में भीषण युद्ध के अलावा सीमा पर अक्सर झड़प होती रहती है

- राजेश पांडेय
चीन ने सीमा को गर्म रखने के अलावा कई अन्य मोर्चों पर भारत को नुकसान पहुंचाने के फैसले अभी हाल में किए हैं। वैसे, वह हमेशा भारत को कमजोर बनाने की कोशिश करता है। पाकिस्तान से उसकी गहरी दोस्ती का सबसे बड़ा कारण भारत ही है। अक्टूबर के महीने में चीन ने कई वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए हैं। इनसे भारत सीधे प्रभावित होगा। उसने भारत को सोलर मैन्युफैक्चरिंग टेक्नालॉजी देने पर रोक लगा दी है।
दुनिया की दो बड़ी ताकतों भारत और चीन के बीच रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण हैं। दोनों देशों के बीच 1962 में भीषण युद्ध के अलावा सीमा पर अक्सर झड़प होती रहती है। कई स्थानों खासकर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में सीमा विवाद से यह स्थिति बनती है। भारत-चीन के बीच सीमारेखा तय करने वाली 1914 की मैकमोहन रेखा को चीन नहीं मानता है। वह समूचे अरुणाचल प्रदेश पर दावा पेश करता है। यों भी चीन का रवैया विस्तारवादी है। वह दूसरे देशों के कई इलाकों पर दावे जताता है। उसका कुछ द्वीपों के संबंध में जापान और फिलीपीन्स से विवाद सुर्खियों में रहता है। वह स्वतंत्र देश ताइवान को भी अपना हिस्सा बताता है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को 2027 तक ताइवान पर कब्जा करने का लक्ष्य दिया है। ताजा विवाद भारत से संंबंधित है।
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के डायरेक्टर जनरल शत्रुजीत कपूर ने 23 अक्टूबर को राजस्थान में एक सम्मान समारो हमें खुलासा किया कि अरूणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों से कई स्थानों पर टकराव चल रहा है। कपूर जल्द ही रिटायर होने वाले हैं। लगता है, उन्होंने सरकार की सहमति से यह जानकारी उजागर की है। यह जुलाई से चल रहे तनाव की सरकारी तौर पर पहली पुष्टि थी। ध्यान रहे, ऐसी खबरें आ रहीं थी कि अरुणाचल प्रदेश में ताकसिंग के पास अस्फिला में भारत-चीन के बीच जुलाई से तनातनी जारी है। पीएलए ने नियंत्रणरेखा के 6-7 किलोमीटर अंदर टेंट लगा लिए हैं। 24 अक्टूबर को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, हमने पहले भी देखा है कि जब समय-समय पर चीनी सैनिक स्थापित पैटर्न से अलग हटकर गश्त करते हैं तब भारत-चीन की सीमा पर गड़बड़ी होती है।
निश्चित तौर पर भारत की यह प्रतिक्रिया चीन को पसंद नहीं आई है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने जवाब दिया कि उसकी सेना अपनी संप्रुभता को सुरक्षित रखने के लिए सीमा पर सामान्य गश्त करती है। यहां एक और घटनाक्रम का जिक्र सामयिक होगा। 2 अक्टूबर को भारत सरकार ने लद्दाख के 28 स्थानों के नाम और पहचान घोषित कर दिए। इसके कुछ ही घंटे बाद चीन ने कहा कि उसने कभी भी तथाकथित केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख को मान्यता नहीं दी है। बीते कुछ वर्षों से दोनों देशों के बीच नक्शे में स्थानों के नाम घोषित करने की जवाबी कार्रवाई चल रही है। 2017 के बाद चीन ने कई बार सीमारेखा पर स्थानों के नाम घोषित किए हैं। चीन ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाए जाने का विरोध किया था। उसने पाकिस्तान के कहने पर सुरक्षा परिषद में चर्चा के लिए यह मुद्दा पेश किया था। लेकिन परिषद के स्थायी सदस्यों अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस ने चीन का समर्थन नहीं किया था।
सवाल उठता है, चीन थोड़े समय के अंतर से भारत की सीमा का अतिक्रमण क्यों करता है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद हल करने के लिए कई बार सहमति बन चुकी है। सैनिक कमांडरों के बीच बातचीत के 36 दौर हो चुके हैं। फिर भी, चीनी सेना दस्तक देती रहती है। रक्षा विशेषज्ञ इसके कई कारण बताते हैं। वह लगातार अतिक्रमण के जरिये थोड़ी-थोड़ी जमीन हड़पता है। उस इलाके पर अपने दावे को मजबूत और जीवंत बनाए रखता है। इसके सबूत लद्दाख, अरुणाचल में उसकी हलचल से मिलते हैं। ऐसा ही वह दूसरे देशों के साथ करता है। चीनी नौसेना के जहाज और गश्ती नौकाएं जापान, फिलीपीन्स, ताइवान के आसपास आक्रामक आवाजाही करती हैं।
अपने दावे को ठोस बनाए रखने के अलावा चीन की विवादित गतिविधियों के कारण उसकी अंदरूनी स्थितियों में भी खोजे जा सकते हैं। इन दिनों उसकी माली हालत पतली है। इस समय दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था गिरावट के दौर में है। लोगों की आमदनी कम होने की वजह से घरेलू उपभोक्ता मांग कमजोर है। प्रॉपर्टी बाजार लंबे समय से संकट में है। मकानों की बिक्री कम होने और कर्ज के बोझ से कई बड़ी हाउसिंग कंपनियां ध्वस्त हो चुकी हैं। ईरान युद्ध ने पेट्रोल, डीजल, गैस की कीमतों में इजाफा किया है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा एनर्जी आयातक है। हालांकि इस साल जुलाई-सितंबर की तिमाही में विकास दर 4.5प्रतिशत रही। यह दूसरी तिमाही में 2022 के बाद सबसे कम 4.3प्रतिशत पर पहुंच गई थी। इस मामूली बढ़ोतरी में मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात की बड़ी भूमिका है। लेकिन घरेलू मांग में कमी को देखते हुए स्थिति कमजोर बने रहने के आसार ज्यादा हैं।
पुराने दुश्मन भारत से सीमा विवाद की चिंगारी भड़काए रखने से जनता का ध्यान आर्थिक मुश्किलों से कुछ समय के लिए तो हटाया जा सकता है। एक और कारण है। सर्वोच्च नेता शी जिनपिंग अपने अगले पांच वर्षीय कार्यकाल के लिए सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी की मुहर लगवाना चाहते हैं। 26 अक्टूबर से बीजिंग में शुरु हुए पार्टी के चार दिनी सत्र में इसकी भूमिका तैयार हो सकती है। 2028 में पांच साल में एक बार होने वाली पार्टी कांग्रेस से इसे मंजूरी मिलने की पूरी संभावना है। एक पार्टी और एक नेता के शासन वाले चीन में शी चौथी बार सर्वोच्च पद पर बने रहने वाले पहले नेता होंगे। भारत और दूसरे देशों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा आक्रामक रवैये से शी को पार्टी खास कर पीएलए नेतृत्व के उग्र तबके की भावनाएं शांत रखने में मदद मिलेगी।
चीन ने सीमा को गर्म रखने के अलावा कई अन्य मोर्चों पर भारत को नुकसान पहुंचाने के फैसले अभी हाल में किए हैं। वैसे, वह हमेशा भारत को कमजोर बनाने की कोशिश करता है। पाकिस्तान से उसकी गहरी दोस्ती का सबसे बड़ा कारण भारत ही है। अक्टूबर के महीने में चीन ने कई वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए हैं। इनसे भारत सीधे प्रभावित होगा। उसने भारत को सोलर मैन्युफैक्चरिंग टेक्नालॉजी देने पर रोक लगा दी है। उसने मेट्रो रेल और हाईवे के निर्माण में काम आने वाली टनल बोरिंग मशीनरी (टीबीएम) के निर्यात पर अंकुश लगाया है। इससे भारत में कई कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट प्रभावित हो सकते हैं। तीन हजार टन वजन की बोरिंग मशीन मुंबई-अहमदाबाद हाईस्पीड रेल कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट के लिए अहम है।
चीन 2024 के बाद से भारत को टीबीएम के निर्यात में देर कर रहा है। इस साल मार्च में तनाव कम होने के बाद मशीनों की सप्लाई शुरू हो गई। चीन ने अब नए सिरे से प्रतिबंध लागू किए हैं। चीन के व्यापार मंत्रालय का कहना है कि चीन से विवाद रखने वाले संवेदनशील देशों को टीबीएम और अन्य भारी मशीनरी का निर्यात करने के लिए लाइसेंस और पूर्व अनुमति जरूरी है। चीन का यह रुख उस वक्त है जब भारत उससे बहुत बड़े पैमाने पर सामान का आयात करता है। हालांकि, भारत ने 2020 में गलवान में चीन से खूनी संघर्ष के बाद चीनी निवेश सीमित करने के लिए कड़े कदम उठाए थे। लेकिन भारत ने कुछ समय बाद बिजली सहित कुछ अन्य अहम क्षेत्रों में चीनी निवेश के लिए दरवाजे खोल दिए। वैसे, इसके साथ भारत ने चीन से सामान की आवाजाही सीमित करने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। स्विट्जरलैंड के थिंकटैंक ग्लोबल ट्रेड अलर्ट के अनुसार भारत ने जुलाई-सिंतबर तिमाही में अंधाधुंध निर्यात रोकने के लिए 18 एंटी डंपिंग और सब्सिडी से संंबंधित जांच शुरू की थी। इसका सबसे बड़ा निशाना चीन है।
चीन से वर्षों पुराने सीमा विवाद और बड़े युद्ध के बावजूद भारत बड़े पैमाने पर चीनी सामान का आयात करता है। चीन से भारत का व्यापार घाटा साल-दर-साल बढ़ रहा है। किसी सरकार ने चीन से आयात रोकने के लिए कड़ी कार्रवाई नहीं की है। 2020 में गलवान में हिंसक संघर्ष के बाद भी चीन से अंधाधुध आयात जारी है। विदेश मंत्री जयशंकर और वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण चीन से व्यापार असंतुलन पर चिंता जताते हैं। फिर भी, सरकार चीनी सामान पर टैरिफ बढ़ाने और अन्य कठोर उठाने से हिचकती है। निर्मला सीतारमण ने इस माह के तीसरे सप्ताह में बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष-विश्व बैंक के सम्मेलन में चीन से बढ़ते व्यापार असंतुलन का जिक्र किया। वे कहती हैं, दुनिया में व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिए टैरिफ और अन्य दंडात्मक कार्रवाई की जाती है लेकिन भारत इन पर यकीन नहीं करता है। वह बैठ कर बातचीत करना सही मानता है।
चीन से भारत का व्यापार घाटा पिछले पांच वर्षों से 9 से 11 लाख करोड़ रुपए के बीच चल रहा है। 2025-26 में घाटा लगभग 12 लाख करोड़ रुपए हो गया था। वर्तमान वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले छह महीनों में व्यापार घाटा 6.56 लाख करोड़ रुपए हो चुका था। यह 2025-26 की समान अवधि के मुकाबले 27 प्रतिशत अधिकहै। सीता रमण स्वीकार करती हैं कि दस साल से चीनी बाजारों में भारतीय प्रोडक्ट की पहुंच बढ़ाने का मामला उठाया जा रहा है। लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलता है। वित्तमंत्री का यह कथन भारत सरकार की बेबसी जाहिर करता है।
यूरोपीय देशों और चीन के बीच भी व्यापार में काफी गैरबराबरी है। 27 देशों के यूरोपियन यूनियन ने अपने बाजार तक चीनी माल की पहुंच पूरी तरह बंद करने के तरीकों पर गंभीरता से विचार शुरू कर दिया है। इस दिशा में पहल करते हुए यूरोप में चीन की हाइब्रिडकारों की बिक्री को तीन लाख 50 हजार तक सीमित करने का निर्णय लिया जा चुका है। भारत से भी ऐसे कदमों की अपेक्षा है। चीन की आक्रामक गतिविधियों को देखते हुए तो यह और भी जरूरी हो जाता है। हालांकि चीन के वैश्विक कारोबार में भारत की हिस्सेदारी बहुत अधिक नहीं है। लेकिन ऐसे देशों की संख्या बढ़ रही है जो चीन के व्यावसायिक प्रभुत्व को चुनौती देने लगे हैं।
सितंबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जिनपिंग के बीच सम्मेलन से अलग हटकर चर्चा हुई थी। लेकिन बातचीत के अधिकृत ब्योरे में चीन से झड़प का कोई जिक्र नहीं था। देखिए एक तरफ तो जिनपिंग भारत की यात्रा करते हैं। दूसरी ओर उनकी सेना सीमा पर आक्रामक कार्रवाई करती रही। भारत को इसकी जानकारी थी। फिर भी, उसने उस वक्त सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा था। भारत ने अक्टूबर में जाकर इसको स्वीकार किया। भारत क्यों हर मोर्चे पर उसे नीचा दिखाने वाले देश के प्रति नरम रवैया अपना रहा है। यह तथ्य भारत की कमजोरी को सामने लाता है। उसके एक महाशक्ति के सामने कमजोर पड़ने का संकेत देता है। विश्लेषक महसूस करते हैं कि भारत को किसी बिजनेस लॉबी के दबाव में आए बिना चीन को उसकी भाषा में जवाब देने की जरूरत है। चीन के खिलाफ शुरू की गई एंटीडंपिंग और सब्सिडी की जांच जैसे फैसलों का दायरा बढ़ाने की जरूरत है।


