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अमेरिका के सामने भारत इतना दब्बू पहले कभी नहीं रहा

आम तौर पर किसी देश का विदेश मंत्री भारत के दौरे पर आता है या भारत के विदेश मंत्री किसी देश के दौरे पर जाते हैं तो उनकी बात अपने समकक्ष से होती है।

अमेरिका के सामने भारत इतना दब्बू पहले कभी नहीं रहा
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  • अनिल जैन

आम तौर पर किसी देश का विदेश मंत्री भारत के दौरे पर आता है या भारत के विदेश मंत्री किसी देश के दौरे पर जाते हैं तो उनकी बात अपने समकक्ष से होती है। इस लिहाज से रुबियो की बात विदेश मंत्री एस. जयशंकर से होनी चाहिए थी। विदेश मंत्रियों की दोपक्षीय वार्ता में सभी मुद्दों पर बातचीत की जाती है। जो कूटनीति होनी है या जोड़-तोड़ होनी है।

यह तय करना निर्वाचित केंद्र सरकार का अधिकार है कि भारत अपनी विदेश नीति में किस दुनिया के किन देशों से अपने रिश्तों को प्राथमिकता दे। फिर भी भारत में विदेश नीति को लेकर हमेशा आम सहमति रही है और सरकारें बदलने पर बाकी नीतियां भले ही बदलती रही हों लेकिन वैदेशिक नीति के मामले में निरंतरता रही है। दुर्भाग्य से यह सिलसिला 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद टूट गया। भारत ने न सिर्फ अपनी गुट निरपेक्षता की नीति को छोड़ दिया बल्कि उसने अपने पारंपरिक मित्र देशों से भी बहुत हद तक दूरी बनाकर खुद को पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर बना लिया। यह सही है कि सोवियत संघ के बिखरने के बाद भारत की अमेरिका से निकटता बढ़ गई, जिसका वामपंथी दलों के अलावा देश के किसी भी राजनीतिक दल ने विरोध नहीं किया। हाल के दिनों में तो यह नीतिगत झुकाव इस हद तक बढ़ गया है कि भारत सरकार की ओर से सामरिक और व्यापारिक मामलों में अमेरिका ही फैसले लेता दिखने लगा है।

यह अफसोसनाक है कि ऑपरेशन सिंदूर के वक्त युद्धविराम से लेकर आज तक अनेक महत्वपूर्ण फैसलों का ऐलान अमेरिकी प्रशासन ने भारत सरकार के कुछ कहने से पहले कर दिया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तो 50 से ज्यादा मौकों पर इस बात को दोहराया कि उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री को भारत से व्यापार बंद करने की धमकी देकर युद्धविराम के लिए राजी किया। ट्रम्प के इस कथन का भारत की ओर से विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने जरूर दबे स्वरों में खंडन किया और कहा कि 'भारत ने युद्धविराम का फैसला पाकिस्तान के अनुरोध पर किया था, किसी के दबाव में नहीं।' मगर मोदी ने आज तक अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान का प्रतिवाद नहीं किया है। इस बीच ट्रम्प ने मोदी को अपमानित करने जैसे कुछ बयान भी दिए। मसलन, उन्होंने कहा कि, 'वे चाहें तो मोदी का कॅरियर तबाह कर सकते हैं, लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे।' उनके इस आपत्तिजनक बयान पर भी प्रधानमंत्री खामोश रहे।

यही नहीं, इसके बाद भारत और अमेरिका के बीच दोपक्षीय व्यापारिक समझौते पर बनी सहमति और उस समझौते की शर्तों का एकतरफा ऐलान भी अमेरिका की ओर से ही कर दिया गया। हालांकि उस समझौते की कई शर्तें विवादास्पद और भारतीय हितों के खिलाफ हैं। फिर भी भारत सरकार आज तक देश को उसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति कई बार कह चुके हैं कि उन्होंने भारत को रूस और ईरान से तेल खरीदने के लिए मना कर दिया है लेकिन उनके इस बयान का जवाब भी भारत सरकार की ओर से चुप्पी साधकर ही दिया गया। इसके बाद इस सिलसिले में नई कड़ी हाल ही में भारत यात्रा पर आने से पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने जोड़ी, जब उन्होंने वॉशिंगटन में ही यह ऐलान कर दिया कि भारत वेनेजुएला से तेल खरीदेगा और जल्द ही वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोडिगेज नई दिल्ली जाएंगी।

पिछले महीने की 23 तारीख को चार दिनों के लिए भारत आने के बाद मार्को रुबियो ने तो यह घोषणा भी कर डाली कि भारत पांच साल में अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर की खरीदारी करेगा। पहले बताया गया था कि यह खरीदारी अमेरिका से होने वाले दोपक्षीय व्यापार समझौते का हिस्सा होगी। तब ट्रम्प प्रशासन के टैरिफ वॉर के खिलाफ अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आया था। जब फैसला आया तो उसने व्यापार समझौते की पूरी पृष्ठभूमि बदल डाली। बहरहाल, समझौता अभी कहीं अटका हुआ है, जबकि खरीदारी की शर्त पर भारत के सहमत होने की घोषणा रुबियो ने कर डाली है। इस पर भारत सरकार की ओर से विरोध न जताया जाना उनकी बात की पुष्टि के रूप में ही देखा जा सकता है। ऐसे और भी उदाहरण भी हैं, जिनसे अमेरिका दोपक्षीय एवं अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अपने ढंग से पुनर्परिभाषित करता दिख रहा है।

जाहिर है कि वह अपने मित्र अथवा सहयोगी देशों को अपने मातहत दिखाकर अपनी नव-औपनिवेशिक नीति को आगे बढ़ाता मालूम पड़ रहा है। सवाल है कि क्या मोदी सरकार इसमें सहभागी बनने को तैयार है? यह सवाल देश के बड़े जनमत को बेचैन कर रहा है।

अमेरिका के सामने भारत की यह स्थिति तब है जब अमेरिका अपना महाशक्ति होने का रुतबा गंवा रहा है। उसकी यह स्थिति ईरान से जारी उसके युद्ध के दौरान साफ दिख रही है। उसने इज़रायल के साथ मिलकर विश्व बिरादरी में वर्षों से लगभग अलग-थलग पड़े जिस ईरान को खत्म करने के लिए सैन्य अभियान चलाया था, उसी ईरान से अब वह समझौते के लिए लालायित नजर आ रहा है। अमेरिका और ट्रम्प की दयनीयता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह युद्धविराम के लिए ईरान को मनाने के लिए पाकिस्तान पर निर्भर है। रूस, चीन, इज़रायल के अलावा ईरान, तुर्किये, कतर, पाकिस्तान आदि कई इस्लामी देश ट्रम्प के अमेरिका की हैसियत में आ रही गिरावट को समझ रहे हैं। सभी की निगाह में वह थोथा चना बन गया है।

इसके विपरीत 140 की आबादी वाले भारत की सरकार अभी भी अमेरिका को अपना तारणहार मान रही है। इसकी ताजा झलक मार्को रुबियो की हाल की भारत यात्रा के दौरान भी दिखी। रुबियो 23 मई को जब दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर उतरे तो वहां की तस्वीरें देखकर भाजपा और सरकार के इकोसिस्टम ने सोशल मीडिया में बढ़-चढ़कर प्रचारित किया कि भारत ने अमेरिका को उसकी औकात बता दी। दरअसल अमेरिकी विदेश मंत्री की आगवानी करने अमेरिकी राजदूत और भारत सरकार के दो जूनियर अधिकारी पहुंचे थे। सवाल है कि क्या किसी देश का विदेश मंत्री आता है तो विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री उसकी आगवानी करने जाते हैं। कहने का आशय यह है कि प्रोटोकॉल के तहत ही रुबियो को हवाईअड्डे पर रिसीव किया गया था लेकिन सरकार के प्रचार तंत्र का हिस्सा बन चुके मीडिया ने भी इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।

उसके बाद जो हुआ वह अभूतपूर्व रहा। अमेरिकी विदेश मंत्री हवाईअड्डे से निकले और दनदनाते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचे। ऐसा लग रहा था जैसे वहां मोदी भी पलक पांवड़े बिछाए उनका इंतजार कर रहे थे। वहां अमेरिकी विदेश मंत्री ने प्रधानमंत्री के साथ एक घंटे तक दोपक्षीय वार्ता की, जिसके बारे में बताया गया कि ऊर्जा सुरक्षा से लेकर तकनीक, व्यापार और पश्चिम एशिया के संकट के बारे में बात हुई। सोचने वाली बात है कि यह प्रोटोकॉल का कितना बड़ा उल्लंघन है कि भारत का प्रधानमंत्री किसी देश के विदेश मंत्री के साथ दोपक्षीय वार्ता कर रहा है?

आम तौर पर किसी देश का विदेश मंत्री भारत के दौरे पर आता है या भारत के विदेश मंत्री किसी देश के दौरे पर जाते हैं तो उनकी बात अपने समकक्ष से होती है। इस लिहाज से रुबियो की बात विदेश मंत्री एस. जयशंकर से होनी चाहिए थी। विदेश मंत्रियों की दोपक्षीय वार्ता में सभी मुद्दों पर बातचीत की जाती है। जो कूटनीति होनी है या जोड़-तोड़ होनी है, जो समझौता या मोल-भाव होना है वह उनके बीच होता है। जब दोनों किसी सहमति पर पहुंच जाते हैं तो उसके बाद औपचारिकता के तौर पर प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात होती है। उस मुलाकात में विदेशी मेहमान अपने देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का संदेश प्रधानमंत्री को देते हैं और तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं।

ऐसा कभी नहीं होता है कि प्रधानमंत्री किसी देश के विदेश मंत्री के साथ दोपक्षीय वार्ता करे। प्रधानमंत्री की तो किसी प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति के साथ ही द्विपक्षीय वार्ता होती है। कूटनीति में आम तौर पर ऐसा ही होता है। प्रधानमंत्री चाहे कितने भी छोटे देश का हो, नई दिल्ली आएगा तो प्रधानमंत्री के साथ वार्ता करेगा और विदेश मंत्री चाहे कितने भी बड़े देश का हो, वह विदेश मंत्री से ही वार्ता करेगा। लेकिन पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि अमेरिकी विदेश मंत्री से सीधे प्रधानमंत्री ने एक घंटे तक बातचीत की। ऐसा भी नहीं था कि रुबियो कोई बड़ा प्रस्ताव लेकर आए हैं। कम से कम सार्वजनिक रूप से तो ऐसा नहीं दिखा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


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