मोदी युग में भारत वाकई बदला मगर गया तो पीछे!
आखिरकार, प्रधानमंत्री मोदी ने एक नया रिकार्ड कायम कर लिया। मोदी के शीर्ष मंत्रिमंडलीय साथियों की प्रशस्तियों से पूरे देश को यह रिकार्ड बनने का पता चला

- राजेंद्र शर्मा
इन चुनावों में खुद भाजपा के अपने अल्पसंख्यक मोर्चे के नेता तक बिल्कुल बेरोजगार हैं—चुनाव में उनकी उपस्थिति तो उनके मुस्लिम-विरोधी तेवर को कमजोर जो कर देगी। सच है कि मोदी युग ने भारत को इतना बदल दिया है कि उसे पहचानना ही मुश्किल हो गया है। पहले भी सांप्रदायिक ताकतें हुआ करती थीं, सांप्रदायिक गबड़बड़ियां भी हुआ करती थीं, शासन के आचरण में भी थोड़ा-बहुत पक्षपात भी हो सकता था, लेकिन शासन और राज्य की मुद्रा आमतौर पर निष्पक्ष होती थी।
आखिरकार, प्रधानमंत्री मोदी ने एक नया रिकार्ड कायम कर लिया। मोदी के शीर्ष मंत्रिमंडलीय साथियों की प्रशस्तियों से पूरे देश को यह रिकार्ड बनने का पता चला। यह रिकार्ड है देश में सबसे लंबे समय तक सार्वजनिक पद (वास्तव में मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री जैसे शीर्ष पद) पर रहने का। इस 22-23 मार्च को नरेंद्र मोदी को उच्च सार्वजनिक पदों पर रहते हुए 8,931 दिन हो गए। इसके साथ ही नरेंद्र मोदी ने पवन चामलिंग का रिकार्ड तोड़ दिया, जो 24 वर्ष तक सिक्किम के मुख्यमंत्री रहे थे। पवन चामलिंग का मुख्यमंत्री का कार्यकाल, 8,930 दिन का ही था। नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला था और 2014 की 26 मई से प्रधानमंत्री के पद पर हैं। और नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री के पद पर रहकर गुजरात को और प्रधानमंत्री के पद पर रहकर देश को जिस दिशा में आगे बढ़ाया है, उसमें बहुत ही मुखर निरंतरताएं हैं। इसलिए, इस रिकार्ड के बहाने 24 वर्ष के नरेंद्र मोदी के इस पूरे कार्यकाल की ही, जिसे 'सेवा' का रिकार्ड बताने पर मोदी के मंत्रिमंडलीय साथियों का खास जोर रहा है, कुछ विशेषताओं को यहां रेखांकित करना अनुपयुक्त नहीं होगा।
मोदी के बाद नंबर दो माने जाने वाले, अमित शाह ने गोल-मोल प्रशस्तियों को दोहराने के साथ ही, इनसे कुछ आगे भी जाने की कोशिश की है। यह कहने के बाद कि 'सेवा के मोदीजी के दशक अपना ही एक युग बन गए हैं', शाह एक्स पर अपनी पोस्ट में इस युग में हुए मुख्य बदलाव भी गिनाते हैं। 'चाहे गरीबों को उनके अधिकार देना हो, चाहे विकास के नये मानक कायम करना हो या वैश्विक मंचों पर राष्टï्र का गौरव बढ़ाना हो, मोदी युग ने भारत को इतना बदल दिया है कि इसको पहचानना ही मुश्किल है।' शाह ने अपने बयान के आखिर में संभवत: अनजाने में जिस एक बड़ी सच्चाई को उगल दिया है, उससे हम भी पूरी तरह सहमत हैं। वाकई 'मोदी युग ने भारत को इतना बदल दिया है कि इसको पहचानना ही मुश्किल है।' आइए, अब जरा इस पर भी तो नजर डाल लें कि मोदी युग ने भारत को किस तरफ इतना बदला है कि पहचान में ही नहीं आता है।
मोदी युग के भारत की बदली हुई पहचान का एक पहलू, सचमुच खुद को भारतीय मानने वाले हर देशवासी को जरूर चुभा होगा। अभी गुजरी ईद पर एक ओर तो प्रधानमंत्री ने अपनी मुबारकबाद दी और दूसरी ओर इसी ईद के गिर्द कम से कम पांच खबरें बिना किसी प्रयास के स्मृति में गढ़ी रह गयीं। पहली खबर प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से थी, जहां गंगा में एक नाव पर रोजा-इफ्तार करने के लिए, 14 मुस्लिम नौजवानों को शुरूआती तौर पर 14 दिन के लिए जेल भेज दिया गया। भाजपा युवा मोर्चा के एक नेता की शिकायत पर पहले गंगा पर नाव में बिरयानी खाकर धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने का आरोप लगाया गया, फिर बिरयानी खाकर 'हड्डियां गंगा में डालने का और अंत में मल्लाह की नाव जबरन छीनकर ले जाने का। इसी के पीछे-पीछे दूसरी खबर आई, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के क्षेत्र, गोरखपुर से। यहां पुलिस ने एक खुली जगह पर इफ्तार करने के बाद, चार नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने बिरयानी खाकर, 'हड्डियां एक नाले में डाल दी थीं। नाला एक मंदिर के करीब था और मंदिर के पुजारी की शिकायत थी कि बिरयानी की 'हड्डियां डालकर, उस नाले का पानी दूषित कर दिया गया, जिस नाले से मंदिर के लोग पानी पीते थे, जिस पानी में खाना बनाते थे और जिस पानी से देव प्रतिमाओं को स्नान कराते थे!
जरा और बाद में उत्तर प्रदेश में ही मैनपुरी में तथा एक अन्य जगह से, पुलिस अधिकारियों के ईद पर सामूहिक नमाज के लिए इक_ïे हुए लोगों को अकारण धमकाने-धौंस देने के वीडियो वायरल हुए। पांचवीं खबर, राजधानी दिल्ली में उत्तम नगर से थी, जहां उच्च न्यायालय के आदेश पर पुलिस की बहुत भारी तैनाती के बाद और दर्जनों की गड़बड़ी फैलाने की कोशिश के लिए गिरफ्तारी के बाद, ईद का शांति से निकल जाना, सब के लिए राहत की एक बड़ी खबर बन गया। हिंदुत्ववादी योद्घा लगातार यहां ईद पर खून बहाने की धमकियां दे रहे थे। याद रहे कि यह तो सिर्फ बानगी है। अल्पसंख्यकों के धार्मिक त्यौहारों को तथाकथित हिंदुत्ववादियों द्वारा झगड़े और इकतरफा पुलिस-प्रशासनिक कार्रवाइयों का मौका बनाया जाना, मोदी युग के भारत में जैसे नियम ही बन चुका है। इससे पहले, क्रिसमस पर भी जगह-जगह हमलों तथा गड़बड़ी की खबरें आई थीं। मोदी युग में अल्पसंख्यकों में मुसलमान खासतौर पर निशाने पर हैं, लेकिन ईसाई और यहां तक कि सिख, जैन तथा बौद्घ भी, सुरक्षित कोई नहीं है।
यह बढ़ता सांप्रदायीकरण, मौजूदा सत्ताधारियों द्वारा सचेत रूप से फैलाया जा रहा है और राजसत्ता समेत सभी उपलब्ध औजारों का इस्तेमाल कर के फैलाया जा रहा है। राजसत्ता के समाज के संप्रदायीकरण के लिए सुनियोजित इस्तेमाल का इतिहास, उस मोदी युग जितना ही पुराना है जिसकी बात अमित शाह करते हैं। मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के गुजरात में सत्ता संभालने के चंद महीनों में ही, गुजरात का 2002 का कुख्यात दंगा हो चुका था, जो वास्तव में प्रशासन की शह से, संघ परिवार द्वारा अंजाम दिया गया, मुस्लिमविरोधी नरसंहार ही था। इसके कुछ ही महीने बाद, इस नरसंहार को ही अपना शुभंकर बनाकर नरेंद्र मोदी ने चुनाव में भाजपा को जीत दिलायी और तब तक गुटों में बंटी रही गुजरात भाजपा में अपनी स्थिति सबसे मजबूत कर ली।
मोदी युग में वक्त के साथ सांप्रदायीकरण का यह खेल ज्यादा से ज्यादा बढ़ता तथा ज्यादा से ज्यादा खुलेआम ही होता गया है। इसी क्रम में 2024 के आम चुनाव के समय से, खुलेआम मुस्लिमविरोधी दुहाई का सहारा लेने को नरेंद्र मोदी ने खुद ही अपना प्रमुख हथियार बना लिया है। अपनी मुस्लिमविरोधी पहचान को स्थापित करने के लिए वह पहले 'तुष्टिकरण'-विरोध की जिस शब्दावली का सहारा लेते थे, उसे छोड़कर अब उन्होंने 'घुसपैठियों' के खतरे की शब्दावली को पकड़ लिया है। विशेष रूप से झारखंड, एक हद तक महाराष्टï्र और पिछले ही दिनों बिहार के चुनाव में 'घुसपैठियों के खतरे' के नारे को जमकर भुनाने के बाद, अब खासतौर पर असम तथा प. बंगाल के चुनाव में संघ-भाजपा सबसे ज्यादा इसी नारे के सहारे हैं। नतीजा यह है कि इन चुनावों में खुद भाजपा के अपने अल्पसंख्यक मोर्चे के नेता तक बिल्कुल बेरोजगार हैं—चुनाव में उनकी उपस्थिति तो उनके मुस्लिम-विरोधी तेवर को कमजोर जो कर देगी। सच है कि मोदी युग ने भारत को इतना बदल दिया है कि उसे पहचानना ही मुश्किल हो गया है। पहले भी सांप्रदायिक ताकतें हुआ करती थीं, सांप्रदायिक गबड़बड़ियां भी हुआ करती थीं, शासन के आचरण में भी थोड़ा-बहुत पक्षपात भी हो सकता था, लेकिन शासन और राज्य की मुद्रा आमतौर पर निष्पक्ष होती थी। यहां तक कि प्रधानमंत्री की हैसियत से अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 2002 के नरसंहार के बाद मुख्यमंत्री की हैसियत से नरेंद्र मोदी को उनका यही 'राजधर्म' याद दिलाया था। पर मोदी युग में, सांप्रदायिक भेदभाव ही राजधर्म है!
मोदी युग में कुछ और भी बदला है, जिसने उस भारत को पहचानना मुश्किल बना दिया है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ 100 साल से ज्यादा लड़कर, आजादी हासिल की थी। इस लड़ाई से बनी इस देश की अपनी पहचान को ही मोदी इस युग ने जिस हिकारत से साथ बदला है, उसका जिक्र हम जरा और आगे करेंगे। पहले, इस लड़ाई से निकली आम जनता यानी किसान, मजदूर, कर्मचारी, छोटे व्यवसायी आदि की केंद्रीयता की याद दिला दें, जिसे मोदी युग मेें पूरी तरह से गायब ही कर दिया गया है। बेशक, आजादी की लड़ाई की राष्टï्रवाद की कल्पना में, देसी पूंजीपतियों की भी जगह थी और स्वतंत्र भारत में अपनायी गयी विकास की नीति में, उन्हें महत्वपूर्ण भूमिका दी गयी थी, हालांकि राजकीय क्षेत्र की भूमिका को उसके ऊपर रखा गया था। धीरे-धीरे पूंजीवादी क्षेत्र की जगह बढ़ती भी गयी। फिर भी शासन की भूमिका आम तौर पर आम लोगों यानी किसानों, मजदूरों व अन्य मेहनत करने वालों के पक्ष में संतुलन को रखने की ही रही। नब्बे के दशक के आरंभ में नव-उदारवाद के आने के साथ, शासन के लिए औपचारिक रूप से आम लोगों की इस केंद्रीयता को जैसे छोड़ ही दिया और आम लोगों के हितों को, हाशिए के बचाव उपायों तक सीमित कर दिया गया। फिर भी पूंजीवादी क्षेत्र को बढ़ावा देने के बावजूद, शासन या राज्य और उसके बीच एक अंतर बना रहा।
बहरहाल, मोदी युग में यह अंतर ही मिटा दिया गया है और सत्ता पर सीधे सांप्रदायिक-कारपोरेट गठजोड़ का कब्जा करा दिया गया है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी युग के साथ ही इसकी भी शुरूआत हुई थी, जो बाद में 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के पद के लिए संघ-भाजपा के उम्मीदवार से पहले, कारपारेटों के लगभग सर्वसम्मत उम्मीदवार के रूप में प्रमोट किए जाने में अपने उत्कर्ष पर पहुंची। और मोदी के प्रधानमंत्रित्व में, शासन द्वारा खुले आम और देश व आम जनता के हितों की कीमत पर चहेते कारपोरेटों को आगे बढ़ाए जाने में तो इसे चरमोत्कर्ष पर ही पहुंचा दिया गया। संयोग ही नहीं है कि संघ-भाजपा के लिए धन्ना-सेठों ने भी अपनी तिजोरियों के दरवाजे पूरे खोल दिए हैं, जिसमें मुख्यधारा के मीडिया की सेवाएं भी शामिल हैं। सांप्रदायिक तुरुप के साथ, यह गठजोड़ भी संघ-भाजपा की और उसमें भी खासतौर पर मोदी और उनकी मंडली की ताकत बल्कि अजेयता का, सबसे बड़ा स्रोत है। जाहिर है कि मोदी युग से पहले भारत ऐसा कभी नहीं था।
और आखिर में वह, जो आज सबसे ज्यादा सामने है। ईरान पर अमेरिका-इजरायल के अकारण और वास्तव में बातचीत के बीच में होने के चलते विश्वासघाती हमले पर, मोदी युग के भारत की चुप्पी ने भारत की उस पहचान को पूरी तरह से ही त्याग दिया है, जो हमारी साम्राज्यवादविरोधी आजादी की लड़ाई से बनी थी। भारत आज अगर किसी के साथ है तो, एक स्वतंत्र देश की संप्रभुता के हरण के साम्राज्यवादी हमले के साथ है! यह, वेनेजुएला के मामले में और क्यूबा के मामले में भी चुप्पी से भी आगे का मामला है। मोदी युग ने वाकई भारत को ऐसे बदल दिया है कि पहचानना ही मुश्किल है।
(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)


