गांधी की नजर में अवैध है, यहूदियों का इजरायल
नाजी जर्मनी में यहूदियों के उत्पीड़न से दुखी होकर महात्मा गांधी ने उनके प्रति गहरी मानवीय सहानुभूति व्यक्त की थी।

- विवेकानंद माथने
संसार की अन्य अनेक जातियों की तरह यहूदी भी उसी देश को अपना देश और अपना घर क्यों नहीं बना लेते जहाँ उनका जन्म हुआ और जहां वे जीविकोपार्जन करते हैं? यहूदियों के वतन के रूप में फिलिस्तीन उन्हें पूर्णत: या अंशत: वापस मिल जाये, इसके लिए स्वाभिमानी अरबों को तबाह करना निश्चय ही मानवता के विरुद्ध अपराध होगा।
नाजी जर्मनी में यहूदियों के उत्पीड़न से दुखी होकर महात्मा गांधी ने उनके प्रति गहरी मानवीय सहानुभूति व्यक्त की थी। गांधीजी ने ईसाई जगत द्वारा यहूदियों पर किए गए अत्याचारों को ईसाई धर्म के नाम पर कलंक माना था। उन्होंने जर्मनी के यहूदियों को सलाह दी थी कि वे जिस देश के नागरिक हैं, वहीं अहिंसक संघर्ष के माध्यम से अपने अधिकार प्राप्त करें, लेकिन जब यहूदियों ने ब्रिटेन और अमेरिका के समर्थन से फिलिस्तीन में अपना राष्ट्र स्थापित करने का मार्ग अपनाया और इसके लिए अरबों के अधिकारों का दमन शुरू हुआ, तब गांधीजी ने इसका विरोध किया। उनका स्पष्ट मत था कि फिलिस्तीन अरबों का है और यहूदियों द्वारा फिलिस्तीनियों का दमन करना पाप है।
गांधीजी ने यहूदियों की स्थिति की तुलना दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों और भारत में दलितों के साथ किए जाने वाले भेदभाव से की थी। उनका विश्वास था कि उत्पीड़ित लोगों को हिंसा के बजाय अहिंसक संघर्ष के माध्यम से अपने अधिकार प्राप्त करने चाहिए। 12 अक्टूबर 1929 को गांधीजी ने कहा था : हिंदू धर्म में सबसे बड़ी बुराई छूआछूत ही है। पश्चिम के देशों में यहूदियों को अछूत मानने की भावना पाई जाती है। वह ऐसी ही बुराई है। उन लोगों को शहर से बाहर अछूत बस्तियों (घेटों) में रहने के लिए बाध्य किया जाता है। यह दोष हमारे यहां कब आया, इसका इतिहास मुझे मालूम नहीं है। जब तथाकथित उच्च वर्ग के लोगों ने ऐसे लोगों से, जिन्हें वे नीचे दर्जे का समझते थे, अपने आपको अलग रखने की बात सोची, सामाजिक रूप से इसका आरंभ तब से माना जा सकता है।
अक्टूबर 1931 में उन्होंने कहा था- 'सामी-विरोधी (यहूदी-विरोधी) प्रवृत्ति वास्तव में बर्बरता का एक अवशेष है। यहूदियों के प्रति इस विरोध की भावना को मैं कभी समझ ही नहीं पाया हूँ। बिना किसी अपराध के यहूदी लोग पहले ही कितनी यातना सह चुके हैं। मुझे तब भी लगा था और अब भी लगता है कि यह सारा प्रपीड़न, उन लोगों के लिए बड़े अपयश की बात है, जिन्होंने चिरकाल से कष्ट सहने वाली इस जाति को ईसाई धर्म के नाम पर यातनाएं दी हैं।'
1931 में 'ज्यूइश क्रॉनिकल' को दिए गए साक्षात्कार में गांधीजी ने कहा था- हिन्दुस्तान में हम अपनी बड़ी-से-बड़ी सेवा करने वाले ढेड़, भंगी इत्यादि को, जिन्हें हम अस्पृश्य मानते हैं, गांव के बाहर अलग रखते हैं। गुजराती में उनकी बस्ती को ढेड़वाड़ा कहते हैं। इसी प्रकार यूरोप के ईसाई समाज में यहूदी लोग अस्पृश्य माने जाते थे और उनके लिए जो ढेड़वाड़ा बसाया जाता था, उसे घेटो कहते थे। इसी तरह दक्षिण अफ्रीका में हम हिन्दुस्तानी लोग ढेड़ बन गये हैं।
नवंबर 1938 में 'यहूदी लोग' लेख में गांधीजी ने लिखा - यहूदियों से मुझे पूरी सहानुभूति है। वे ईसाई समाज के द्वारा अस्पृश्य माने जाते रहे हैं। उनके प्रति ईसाईयों के व्यवहार और अस्पृश्यों के प्रति हिंदुओं के व्यवहार में बहुत समानता है। दोनों ही समुदायों के साथ किये जाने वाले अमानवीय व्यवहार का औचित्य सिद्ध करने के लिए धर्म की दुहाई दी गई है, लेकिन मेरी सहानुभूति इस बात की ओर से मेरी आँखें बंद नहीं कर सकती कि न्याय के तकाजे क्या हैं। यहूदियों के लिए एक अलग देश की माँग मुझे कोई खास नहीं जंचती। इस माँग का समर्थन बाइबिल के हवाले से और यहूदियों की फिलिस्तीन लौटने की सतत और तीव्र लालसा की चर्चा करके किया जाता है।
संसार की अन्य अनेक जातियों की तरह यहूदी भी उसी देश को अपना देश और अपना घर क्यों नहीं बना लेते जहाँ उनका जन्म हुआ और जहां वे जीविकोपार्जन करते हैं? यहूदियों के वतन के रूप में फिलिस्तीन उन्हें पूर्णत: या अंशत: वापस मिल जाये, इसके लिए स्वाभिमानी अरबों को तबाह करना निश्चय ही मानवता के विरुद्ध अपराध होगा।
गांधीजी ने यहूदियों द्वारा फिलिस्तीन में ब्रिटेन की सैन्य शक्ति के सहारे अपना राष्ट्र स्थापित करने का विरोध किया था। वे लिखते हैं : मुझे इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि जो रास्ता यहूदियों ने अपनाया है, वह गलत है। लेकिन अगर उन्हें भौगोलिक फिलिस्तीन को अपना देश मानना ही है, उसे स्वदेश के रूप मे देखना ही है, तो ब्रिटेन की संगीनों की छाया में उसमें प्रवेश करना तो उनका बिलकुल गलत तरीका है।
कोई धर्मकार्य संगीनों और बमों के बल पर कैसे किया जा सकता है? वे फिलिस्तीन में अरबों की सद्भावना के सहारे ही बस सकते हैं। उन्हें अरबों का हृदय परिवर्तन करने की कोशिश करनी चाहिए। जो ईश्वर यहूदियों के हृदय का नियामक है वही अरबों के हृदय का भी है। अरबों को समझाने के हजार रास्ते हैं, बशर्तें कि यहूदी ब्रिटेन की संगीनों का सहारा लेना छोड़ दें, लेकिन अभी तो वे उन लोगों को तबाह करने में ब्रिटेन के साझीदार बने हुए हैं जिन्होंने उनका कुछ नहीं बिगाडा।
गांधीजी का विश्वास था कि यहूदियों के लिए अहिंसा ही न्यायपूर्ण और नैतिक मार्ग हो सकता है, यदि वे अहिंसा के उस अद्वितीय अस्त्र को अपना लें, जिसके उपयोग की शिक्षा उनके श्रेष्ठतम पैगम्बरों ने दी है और जो खुशी-खुशी काँटों का ताज पहनने वाले यहूदी ईसा कराहती मानवता को विरासत में दे गये हैं तो उनका पक्ष दुनिया का पक्ष बन जायेगा और मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि यहूदियों ने विश्व को जो अनेक चीजें दी हैं, यह उन सबसे श्रेष्ठ और उज्ज्वल होगी।
महात्मा गांधी के इन विचारों में यहूदियों की ऐतिहासिक पीड़ा के प्रति गहरी सहानुभूति और फिलिस्तीन के अरबों के अधिकारों के प्रति अडिग न्यायबोध एक साथ दिखाई देता है। वे नाजी उत्पीड़न का विरोध करते हुए यहूदियों को अपने अधिकारों के लिए अहिंसक संघर्ष का मार्ग सुझाते हैं, लेकिन किसी अन्य पीड़ित समुदाय के अधिकारों को कुचलकर अपना राष्ट्र स्थापित करने को न्यायसंगत नहीं मानते।
(लेखक 'आजादी बचाओ आंदोलन' एवं 'किसान स्वराज आंदोलनÓ से संबद्ध है)


