सपा-कांग्रेस मिलते हैं तो एक और एक ग्यारह, झगड़ते हैं तो जीरो!
ओवैसी तो बंगाल बिहार हर जगह थे मगर उत्तर प्रदेश में मायावती भी हैं। विपक्ष को यहां कई मोर्चों पर लड़ना है।

लोग कहते हैं कि सपा के नेता भी कांग्रेस पर हमला करते हैं। सही है। मगर यह नहीं समझते कि सपा के पास केवल एक उत्तर प्रदेश है। वह वहीं की पार्टी है। अगर वहां नहीं बोलेगी तो कहां बोलेगी? दूसरे इस बात में तो कोई दो राय है नहीं कि 37- 38 साल से कांग्रेस यूपी में नहीं है। सिर्फ चुनाव के समय उसके प्रदेश के नेताओं का पार्टी मजबूत करने का ख्याल आता है।
ओवैसी तो बंगाल बिहार हर जगह थे मगर उत्तर प्रदेश में मायावती भी हैं। विपक्ष को यहां कई मोर्चों पर लड़ना है। लेकिन फिलहाल तो वह आपस में लड़ता हुआ ही दिख रहा है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेता आपस में एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। इससे क्या हासिल होगा? जो वोट भाजपा में जाना नहीं चाहते इन दोनों दलों के नेताओं की एकदम निचले स्तर की बयानबाजी देखकर मजबूरी में ओवैसी और मायावती की तरफ जा सकते हैं। बीजेपी को इससे भी फायदा होगा।
भाजपा इस समय रक्षात्मक मुद्रा में है। 12 साल में यह पहली बार है जब बीजेपी बचाव में है और विपक्ष हमला कर रहा है। जनता में भी आक्रोश है। और जो पूरे देश में है यूपी में उससे ज्यादा है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अभी कहा कि एन्टी इन्कम्बेन्सी असर नहीं कर रही। सही है। लेकिन यूपी में सामान्य से बहुत ज्यादा सत्ता विरोधी माहौल (एंटी इन्कम्बेन्सी) है। और चुनाव आयोग के वोट चोरी का उसके ही तीन में दो चुनाव आयुक्तों ने भंडाफोड़ कर दिया है। चुनाव आयोग के खिलाफ लोगों में गुस्सा है। ऐसे में वह जो अभी तक एंटी इन्कम्बेन्सी को अपनी वोट चोरी से काउंटर कर देती थी अब नहीं कर पाएगी और तब तो बिल्कुल नहीं जब सत्ता विरोधी भावनाएं चरम पर हों।
चुनाव आयोग के अलावा भाजपा की जीत का दूसरा सबसे बड़ा कारण हिन्दू-मुसलमान की उसकी राजनीति थी। मगर अब यूपी में हिन्दू -मुसलमान भी चलता हुआ नहीं दिख रहा। हिन्दू -मुसलमान के अलावा दूसरी जातियों के खिलाफ नफरत फैलाना भी यूपी में सबसे ज्यादा हो रहा था। खासतौर से ओबीसी और उसमें यादव, दलित और ब्राह्मण यह अपने आपको सबसे ज्यादा अन्याय और अत्याचार का शिकार महसूस करने लगे हैं।
यह सब मिलाकर इस समय यूपी में भाजपा के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां बन गई हैं। खेवनहार अकेले मोदी थे। मगर इस समय वे खुद राहुल के इन आरोपों से खुद को बचाने में लगे हुए हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तो एक पुर्जे हैं। असली दोषी तो प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह हैं।
जनता के सबसे बड़े अधिकार उसकी ताकत वोट का ही मतलब खत्म करने में लगे हुए हैं। जनता के पास अगर वोट की ताकत ही नहीं बचेगी तो उसके पास कुछ नहीं बचेगा। उसकी फिर कोई सुनवाई होने का सवाल ही नहीं।
राहुल ने सीधे जनता को मोदी के सामने खड़ा कर दिया है। यह पहली बार है जब मोदी राहुल पर विपक्ष पर आक्रमण नहीं कर पा रहे हैं, बल्कि खुद को उनके हमलों से बचाने में लगे हुए हैं। ऐसे में वे यूपी में मुख्यमंत्री योगी की कोई मदद कर पाएंगे कहना मुश्किल है।
लेकिन प्रधानमंत्री मोदी मदद कर पाएं या नहीं कांग्रेस के कैमरा देखते ही लपकने वाले कुछ नेता जरूर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की मदद कर रहे हैं। अनावश्यक रूप से वे सपा पर हमला कर रहे हैं। और यहां तक कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर भी।
अखिलेश ही यूपी में विपक्ष का चेहरा हैं। अगर नैया पार लगाएंगे तो वे ही लगाएंगे और कोई विपक्ष के पास नेता या चेहरा नहीं है। लेकिन पता नहीं क्यों उनके साथ कांग्रेस के कुछ नेता मुकाबला करने की कोशिश कर रहे हैं। वे पूर्व मुख्यमंत्री हैं। कांग्रेस का कोई है पूर्व मुख्यमंत्री यूपी में? मुख्यमंत्री छोड़िए कोई बड़ा नेता भी ऐसा जिसका राज्य भर में प्रभाव हो। नेता की जो हमारे यहां पहचान मानी जाती है कि जहां खड़ा हो जाए सौ-पचास आदमी अपने आप इक_ा हो जाएं।
ऐसा नहीं है कि यूपी में कांग्रेस को ही सपा की जरूरत हो। सपा को भी कांग्रेस की उतनी ही जरूरत है। मगर क्या सपा के किसी नेता ने राहुल पर सवाल उठाए? इसके बरअक्स कांग्रेस के सांसद इमरान मसूद सीधे अखिलेश को चैलेंज करते रहते हैं। नाचने गाने वाले, ढोल बजाने वाले जैसे हल्के शब्दों का उपयोग करते हैं। हल्के शब्द बीजेपी में चल जाते हैं। वहां तो प्रधानमंत्री तक भैंस और श्मशान कब्रिस्तान जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। मगर उनकी राजनीति का आधार नकारात्मक है इसलिए वहां नकारात्मक शब्द ही चलते हैं। कांग्रेस की राजनीति का आधार सकारात्मक है। यहां ये शब्द नहीं चलते।
लोग कहते हैं कि सपा के नेता भी कांग्रेस पर हमला करते हैं। सही है। मगर यह नहीं समझते कि सपा के पास केवल एक उत्तर प्रदेश है। वह वहीं की पार्टी है। अगर वहां नहीं बोलेगी तो कहां बोलेगी? दूसरे इस बात में तो कोई दो राय है नहीं कि 37- 38 साल से कांग्रेस यूपी में नहीं है।
सिर्फ चुनाव के समय उसके प्रदेश के नेताओं का पार्टी मजबूत करने का ख्याल आता है। लेकिन उसके बाद पांच साल नहीं। हर चुनाव के टाइम पार्टी की बात करने वाले पार्टी के हितैषी नहीं। चुनाव के समय तो केवल जीत की बात करना चाहिए। पार्टी की बात पूरे पांच साल होना चाहिए। मगर यूपी क्या बिहार में भी यही हाल था, बंगाल में भी यही। कहीं पार्टी संगठन नाम की चीज ही नहीं है। केवल एक चीज काम करती है पार्टी की सब को साथ लेकर चलने की नीति और राहुल पर लोगों का विश्वास।
पार्टी चाहे यूपी में कमजोर हो मगर प्रभाव बहुत है और यह बात अखिलेश जानते हैं। कांग्रेस के साथ आने से सपा की स्वीकार्यता दस गुना बढ़ जाती है।
यूपी में इस समय मुस्लिम वोट इशु नहीं है। लेकिन हद दर्जे की बेवकूफी करके कांग्रेस के यूपी से संबंधित नेता उन्हें अपनी तरफ खींचने में लगे हुए हैं। जरूरत है इस समय दलित को लाने की। दलित कांग्रेस पर विश्वास करता है। सपा पर उसका संदेह कम हुआ है पर पूरी तरह मिटा नहीं है।
मगर जब सपा कांग्रेस के साथ आती है तो दलित को विश्वास हो जाता है और वह इस तरफ आ जाता है। 2024 लोकसभा चुनाव से बड़ा उदाहरण कोई नहीं है। मायावती के बीजेपी से जुड़ने से नाराज दलित और दलित में वह जाति विशेष जाटव जिस पर मायावती की पूरी राजनीति टिकी है सपा और कांग्रेस के साथ आ गया था। मायावती को यह बहुत बड़ा झटका था। लोकसभा में वह साफ हो गईं थीं। साथ ही बीजेपी भी। कांग्रेस और सपा दोनों ने मिलकर 80 में से 43 सीटें जीत लीं थीं। अगर वही अनुपात अब विधानसभा में देखा जाए तो कांग्रेस सपा को 403 की विधानसभा में स्पष्ट बहुमत मिल रहा है। जबकि अब बीजेपी ज्यादा कमजोर हो गई है। ऐसे में यह बहुमत और बड़ा हो सकता है।
मुस्लिम वोट कहीं नहीं जा रहा। ऐसे में कांग्रेस को दलित के अलावा ब्राह्मण और यादव के अलावा उन दूसरी ओबीसी जातियों, अति पिछड़ा पर ध्यान देने की जरूरत है जो दलित की तरह ही सपा पर पूरा विश्वास नहीं कर पा रही हैं। यही कांग्रेस की ताकत है कि हर जाति समुदाय उस पर विश्वास करता है।
कांग्रेस पर किसी एक जाति का प्रभुत्व नहीं है। बसपा में है, सपा में है, यूपी में भाजपा पर है मगर कांग्रेस के लिए कोई यह नहीं कह सकता कि वह किसी जाति विशेष के लिए काम करती है, और किसी जाति विशेष के खिलाफ रहती है। अखिलेश यह बात अच्छी तरह जानते हैं। बस कांग्रेस के ही यूपी में काम कर रहे नेता भूल रहे हैं। भूल सुधार जितनी जल्दी हो उतनी ही कांग्रेस सपा की ताकत बढ़ेगी और भाजपा के लिए फिर यूपी 2024 लोकसभा चुनाव की तरह बन जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


