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हम करें तो लंगोट ढीला आप करो तो रासलीला!

विरोध प्रदर्शन में युवाओं के आक्रोश को पहले पुलिस अदालतें और सरकारें सब समझते थे। आज की तरह मुद्दा नहीं बनाया जाता था। उल्टा पीठ थपथपा कर कहा जाता जाओ नेता बनोगे।

हम करें तो लंगोट ढीला आप करो तो रासलीला!
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- शकील अख्तर

विरोध प्रदर्शन में युवाओं के आक्रोश को पहले पुलिस अदालतें और सरकारें सब समझते थे। आज की तरह मुद्दा नहीं बनाया जाता था। उल्टा पीठ थपथपा कर कहा जाता जाओ नेता बनोगे। बीजेपी के और उन दिनों समाजवादी और कम्युनिस्ट बहुत प्रदर्शन करते थे बताएं कि उन दिनों कैसा व्यवहार किया जाता था? विरोध का अधिकार संविधान ने दिया है। मौलिक अधिकारों में आता है।

क्या दिन ले आए? उस भाषा और मुहावरों को याद करना पड़ रहा है जो कभी अच्छे नहीं लगे। मगर इन्हें अच्छे भी वही लगते थे और समझ में भी वही आते हैं।

अमर सिंह कहते थे हम करें तो लंगोट ढीला और आप करें तो रासलीला! मुंबई में 26/11 के हमले के समय जब सुरक्षा बल और सरकार आतंकवादियों से लड़ रही थे। वास्तविक रूप से आमने-सामने। तब मोदी प्रेस कान्फ्रेंस करके सरकार पर आरोप लगा रहे थे। और देश एवं सुरक्षा बलों का ध्यान भटका रहे थे।

वह राष्ट्रीय सुरक्षा का भी सवाल था और अन्तरराष्ट्रीय भी। ऐसे कई उदाहरण हैं। मगर अभी कांग्रेस के नहीं उसके यूथ मोर्चे के एक प्रदर्शन को लेकर भाजपा ही नहीं विपक्ष के दूसरे दल भी और गोदी मीडिया एवं भक्त तो थे ही कांग्रेस और राहुल पर हमलावर हो गए।

उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय के शिक्षक सब्बरवाल की हत्या विद्यार्थी परिषद के नेताओं ने पीट-पीट कर कर दी थी। पूरी भाजपा की राज्य सरकार हत्यारों के साथ खड़ी हो गई थी। किसी को सज़ा नहीं हुई। अदालत से सब बरी हो गए। परिवार वाले रोते रहे। यूथ कांग्रेस ने केवल प्रदर्शन किया था और उसके सदस्यों पर गिरफ्तारी के साथ गैर जमानती धाराओं में केस दर्ज किया गया।

प्रधानमंत्री मोदी से लेकर अभी निवर्तमान हुए भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा कहते हैं कि कांग्रेस को विपक्ष की भूमिका कैसे निभाना चाहिए यह हम सिखा सकते हैं! क्या सिखाएंगे के देश का प्रधानमंत्री जब अमेरिका में अन्तरराष्ट्रीय नेताओं से बात कर रहा हो पाकिस्तान के आतंकवादी हमलों के बारे में उन्हें बता रहा हो तो आप भारत में उसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को कोट करके कहेंगे कि भारत का प्रधानमंत्री देहाती औरतों की तरह बात करता है! मनमोहन सिंह के लिए कहा था यह मोदी ने। और किसका हवाला देकर? कहा था नवाज शरीफ अमेरिका के राष्ट्रपति से यह कह रहे हैं।

यह दो नहीं तीन मामले थे। अन्तरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की प्रतिष्ठा का भी। और भारतीय प्रधानमंत्री का सम्मान कैसे किया जाता है इसका एक उदाहरण। अभी नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि भारत का कोई प्रधानमंत्री ऐसा नहीं कर सकता है।

राहुल ने भारतीय प्रधानमंत्री पद की पूरी गरिमा रखते हुए कहा था कि अगर व्यक्तिगत रूप से किसी का कोई मुद्दा न हो तो अमेरिका के साथ ऐसी डील कोई भारतीय प्रधानमंत्री नहीं करेगा। प्रधानमंत्री पद की लाज रखी और मोदी के व्यक्तिगत रूप से कम्प्रोमाइजड होने पर सवाल किया।

विपक्ष के रूप में यह भारीपन संयम और देश के सम्मान का ख्याल रखना क्या गलत है? जो कांग्रेस को विपक्ष में क्या करना है यह सिखाना चाहते हैं। जब यह इतने पढ़े-लिखे और दुनिया भर में अपनी विद्वता के लिए सम्मानित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए देहाती औरत, चुगली करने वाली बोलते हैं तो इनके लिए जिनकी डिग्री पर ही सवाल है के लिए अगर इन्हीं जैसा विपक्ष होता तो क्या बोलता? खुद ही सोच लेना चाहिए और गोदी मीडिया, भक्तों को भी।

इसीलिए अमर सिंह के इस तकिया कलाम की याद आई- हम करें तो लंगोट ढीला और आप करें तो रासलीला। जब देश का माहौल सभ्य बनाया जाता है तो पढ़े-लिखे लोगों के कोट ( उद्धरण) याद आते हैं। लेकिन आज के समय में उसे समझेगा कौन? हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का नाम जब तुक मिलाने के लिए हार्ड वर्क के साथ लिया जाता हो तब आप समझ सकते हैं कि देश की सोच समझ को किस तरह गलत मुहावरों भाषाई जाल में जकड़ा जा रहा है।

किसी भी देश समाज को अंदर से खोखला करने के लिए जो एक तत्व सबसे ज्यादा जिम्मेदार होता है वह है दोहरा चरित्र। दो पैमाने। आप के लिए कुछ अपने लिए कुछ। पाखंड। हिप्पोक्रेसी। यह अन्तरविरोध, सेल्फ कंट्राडिक्शन व्यक्ति को ही नहीं, समाज और देश को भी मार देते हैं।

खुद को अलग पैमानों पर खड़ा समझता है। और बाकियों को खुद के ही निर्धारित दूसरे पैमानों पर नीचे खड़ा देखने लगता है। काल्पनिक शक्ति, दंभ के नशे में। वही हाल है। मुद्दा था अमेरिका के साथ इकतरफा डील का। जो रोज अमेरिका की तरफ से ही बताई जाती है। उसी की शर्तें होती है। मगर तुमने उसका विरोध इस तरह से क्यों कर दिया? क्या पहले इस तरह के विरोध नहीं हुए थे? तब हुए थे जब कोई मुद्दा ही नहीं था। केवल विरोध करने के लिए विरोध हुए थे। आज तो मुद्दे से कोई इनकार नहीं कर रहा।

मगर जब कामनवेल्थ गेम के समय विरोध किया गया था तब क्या वह जिला स्तरीय खेल थे। अन्तरराष्ट्रीय नहीं? भाजपा ने केवल सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन ही नहीं किए थे। उसके सहारे एक नकली आंदोलन की शुरूआत करके प्रधानमंत्री बनने वाले मोदी ने अभी दो साल पहले जी 20 जो मोदी के प्रधानमंत्री होने के नाते हमारे यहां आयोजित नहीं हुआ था क्रमवार हर देश में होता रहता है उस समय क्या कहा था? कहा था कामलवेल्थ गेम में देश की बदनामी हुई थी।

विरोध करके बदनामी तो आपने करवाई थी। 2010। क्या क्या आरोप लगाए थे। 16 साल हो रहे हैं। इनमें 12 साल आपकी सरकार को। क्या हुआ? घोटाले के कोई सबूत नहीं मिले। कोर्ट ने क्लीन चिट दे दी। फिर आपके उसके खिलाफ प्रदर्शन और अभी जी 20 के अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान खुद अपने देश के कामनवेल्थ को लेकर झूठी बदनामी करने क्योंकि उसमें खुद आपकी सरकार कुछ नहीं ढूंढ पाई को क्या कहेंगे?

यही हिप्पोक्रेसी है। आपको प्रधानमंत्री पद मिल गया। लेकिन देश कहां पहुंच गया? अमेरिका के शिकंजे में। इसका विरोध करने पर सारा हंगामा खड़ा कर दिया। ऐसे नहीं ऐसे करना था। हम से सीखते। क्या सिखाते?

झूठे आरोप लगाकर प्रधानमंत्री बनने का रास्ता। कामनवेल्थ के बाद टूजी लाए। और एक आज तक का सबसे हिप्पोक्रेट आदमी अन्ना हजारे! मनमोहन सिंह के घर में सीबीआई पहुंचाई थी। क्या मिला?

बीजेपी सिर्फ इशु को डाइवर्ट करना जानती है। इसमें मीडिया उसका सबसे बड़ा सहयोगी है। बीजेपी का सत्ता में रहना नहीं रहना उसके लिए महत्व नहीं रखता। वह क्लास सिम्पैथी है। वर्गीय सहयोग। दोनों सामान्य जन के विरोधी हैं। सेठ साहूकारों के समर्थक। यूपीए की सरकार के समय 2010 से मीडिया उसका विरोध करने लगा था। कारण सोनिया गांधी की आम जन के हितों की योजनाएं थीं। किसानों की कर्ज माफी से लेकर, मनरेगा, राइट टू इन्फारमेशन, महिला बिल जैसे सारे कार्यक्रम आम लोगों से जुड़े हुए थे।

राहुल भी आज आम लोगों की बात करते हैं। अमेरिका के साथ डील में किसान को छोटे उद्योपतियों एमएसएमई ( सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग) को क्या नुकसान होगा इसकी बात कर रहे हैं। गारमेंट इंडस्ट्री जो देश की सबसे बड़ी निर्यात करने वाली और देश में रोजगार देने वाली इंडस्ट्री है उस पर पहले 50 फिर 25 फिर 18 अब 15 परसेन्ट सब इकतरफा लगने वाले अमेरिकी शुल्क (टैरिफ) पर चिन्ता व्यक्त कर रहे हैं। गारमेंट में जिस देश के साथ सबसे ज्यादा काम्पिटिशन है बांग्लादेश उस पर टैरिफ शून्य है। मतलब वह हमसे सस्ता कपड़ा भेजेगा। और इसके साथ जिस पर सबसे कम बात हो रही है वह है अमेरिका से आने वाला काटन (कपास)। जिस पर लगने वाले टैक्स को मोदी ने हटा दिया है। अमेरिका से कपास का आयात 7 गुना बढ़ने वाला है। अभी भी सबसे ज्यादा कपास भारत ही भेजा जा रहा है। जबकि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश है। आत्मनिर्भर।

राहुल यही सवाल उठा रहे हैं। मगर लोगों का ध्यान इन पर न जाए इसलिए विरोध करने के तरीके पर हंगामा मचा रहे हैं। मेराडोना से एक फाउल हुआ था। अगर हमारे यहां मेराडोना होता और कांग्रेस राज में यह घटना होती तो यह शायद विश्व कप ही वापस कर आते।

विरोध प्रदर्शन में युवाओं के आक्रोश को पहले पुलिस अदालतें और सरकारें सब समझते थे। आज की तरह मुद्दा नहीं बनाया जाता था। उल्टा पीठ थपथपा कर कहा जाता जाओ नेता बनोगे। बीजेपी के और उन दिनों समाजवादी और कम्युनिस्ट बहुत प्रदर्शन करते थे बताएं कि उन दिनों कैसा व्यवहार किया जाता था? विरोध का अधिकार संविधान ने दिया है। मौलिक अधिकारों में आता है। लेकिन अब तो देश के सम्मान और देश पर खतरे से जोड़ा जा रहा है!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


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