'एक देश एक चुनाव की अवधारणा कितनी जरूरी'
जनता ने जिस काल अवधि के लिए जनादेश दिया है उसे कम करना संविधान सम्मत नहीं होगा।

- सुनील शुक्ल
जनता ने जिस काल अवधि के लिए जनादेश दिया है उसे कम करना संविधान सम्मत नहीं होगा। इसी तरह 'एक देश एक चुनाव' को देश के संघीय ढांचे और क्षेत्रीय दलों के अनुकूल नहीं कहा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होने से राष्ट्रीय दलों के पक्ष में बनने वाली राजनीतिक लहर में क्षेत्रीय मुद्दे गौड़ हो जायेगें।
देश में इस समय कुछ सविधान संशोधनों को लेकर चर्चाएं बहुत गरम हैं। सरकार की ओर इन्हें हर हाल में संसद की मुहर लगाने के प्रयास किये जा रहे हैं। इनमें 'एक देश एक चुनाव' सम्बन्धी संशोधन विधेयक प्रमुख है। सरकार ने इस प्रस्ताव पर विचार करने और अपनी अनुशंसा देने के लिए सितम्बर 2023 में पूर्व राष्ट्रपति माननीय रामनाथ कोविद की अध्यक्षता में एक उच्च अधिकार प्राप्त समिति का गठन किया था। समिति से इस सम्बन्ध में विचार करने और अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था। यह पहली बार हुआ कि किसी पूर्व राष्ट्रपति को सरकार के किसी विधायी प्रस्ताव पर विचार करने के लिए किसी समिति का प्रमुख बनाया गया। इस समिति ने विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, नागरिक समाज सहित अन्य सम्बन्धित पक्षों से विचार विमर्श के बाद सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। समिति ने एक देश एक चुनाव की अवधारणा को दो चरणों में लागू करने का सुझाव दिया था। पहले चरण में लोक सभा और राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव साथ-साथ कराने और दूसरे चरण में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने की अनुशंसा की गई थी।
मोदी सरकार ने सितम्बर 2024 को कोविद समिति की अनुशंसाओं को मंत्रिमण्डल की बैठक में स्वीकार कर लिया। समिति ने चुनाव सम्बन्धी व्यवस्थाओं को लागू करने के लिए 18 संविधान संशोधन के सुझाव दिये हैं। उन्होंने संविधान में 82ए अनुच्छेद शामिल करने का सुझाव दिया जिससे राष्ट्रपति को राज्यों की विधान सभाओं के चुनावों को टालने का अधिकार प्राप्त होगा। सभी चुनाव एक साथ कराने के लक्ष्य को वर्ष 2029 के लोक सभा चुनाव के साथ हासिल करने का प्रस्ताव है। इसके लिये संविधान के अनुच्छेद 83 और 172 में भी संशोधन का प्रस्ताव है। इन संशोधनों को संसद के दोनों सदनों से अलग-अलग दो तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है और साथ में आधे से अधिक राज्यों की विधान सभाओं से भी इन संशोधनों का अनुमोदन कराना होगा। मान.रामनाथ कोविद उच्च अधिकार प्राप्त समिति में चार आधारों पर अपनी संस्तुतियां दी हैं। कोविद समिति ने चुनाव खर्चों में कमी, आदर्श आचार संहिता लागू होने से नीतिगत फैसलों में विलम्ब को रोकने, सरकारी कर्मचारियों की तैनाती और खर्चे में कमी लाने और आर्थिक विकास की गति को बनाये रखने के लिये अपनी संस्तुतियों को आधार बनाया है।
एक देश एक चुनाव के लिए दिये गये सुझावों के आधारों का सम्यक विश्लेषण जरूरी है। इसके अभाव में इस अवधारणा को समझने में असुविधा होगी।
एक देश एक चुनाव से देश के आर्थिक विकास को गति मिलेगी यह सबसे चौंकाने वाला तर्क है। चुनाव और देश की आर्थिक तरक्की सम्बन्धी आकड़े इसका समर्थन करते नहीं दिखते हैं। देश में 1952 में हुए पहले चुनावों से लेकर 1967 के आम चुनाव तक लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होते रहे हैं। यह सिलसिला कुछ हद तक 1980 के मध्य तक चलता रहा। लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराये जाने की इस अवधि में देश की आर्थिक तरक्की के आंकड़े और बाद के वर्षों में इन चुनावों के अलग-अलग अवधि में हुए चुनावों के दौरान देश की आर्थिक विकास की दर कि तुलना करने पर 'एक देश एक चुनाव' से बेहतर आर्थिक विकास का तर्क समझ से परे है। साथ-साथ हुए चुनावों के दौरान देश के आर्थिक विकास का दर 3.5: प्रतिवर्ष माना गया था। देश में 8 से 9: की आर्थिक विकास दर वर्ष 2003 से 2011 के बीच हासिल किया जब लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव अलग-अलग समयों पर कराये गये थे। आर्थिक उदारीकरण, विदेशी निवेश में वृद्धि, सूचना प्रौद्योगिकी का विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता और 1991 के आर्थिक सुधार जैसे नीतिगत फैसले उस दौर में किये गये जब लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव साथ-साथ नहीं हो रहे थे।
'एक देश एक चुनाव' के पक्ष में चुनाव खर्च में कमी को भी प्रमुख आधार बनाया गया है सवाल यह है कि यह कितना तर्कसंगत है। इसका विश्लेषण करने पर यह तर्क खरा नहीं उतरता है। केन्द्र सरकार चुनावों के आयोजन के लिए अपनी बजट का 1 प्रतिशत धनराशि भी खर्च नहीं करती है। आम तौर पर चुनावों के आयोजन के लिए केन्द्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जा रही धनराशि आम बजट का 0.1प्रतिशत तक पाया गया है। सवाल यह है कि चुनावों में किसका पैसा खर्च होता है और कितना पैसा खर्च होता है और कौन लोग इसको खर्च करते हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों को माने तो चुनाव को खर्चीला राजनीतिक दल और उम्मीदवार बनाते हैं। आंकड़ों में उम्मीदवार खर्च की सीमा से आधा खर्च व्यय करते हुए पाये जाते हैं लेकिन व्यवहारिक पक्ष क्या है? क्या उम्मीदवार और राजनीतिक दल उतनी ही धनराशि व्यय करते हंै जितना वह अपने अभिलेखों में दिखाते हैं? वास्तव में व्यवहारिक रूप से खर्च होने वाली धनराशि का कही उल्लेख ही नहीं होता।
बहुत सारी धनराशि काला धन के रूप में बेहिसाब तरीके से खर्च होता है जो आम तौर पर उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के स्तर पर होता है। एक अध्ययन के अनुसार 2024 के लोक सभा चुनावों के दौरान एक लाख करोड़ रुपये बिना हिसाब-किताब के खर्च किये गये। यह काला धन क्या 'एक देश एक चुनाव' की व्यवस्था में खर्च नहीं होगा। इस व्यय को रोकने की प्रभावी व्यवस्था की जा सकेगी। चुनावों को मंहगा करने का आरोप हाल के दिनों में भारतीय जनता पार्टी पर भी लगते रहे हैं। चुनावी अभियान को विशाल और भव्य बनाने का सिलसिला भाजपा ने ही शुरू किया है। काले धन के उपयोग को रोकने के लिये चुनाव व्यवस्था में सुधार की जरूरत है और इसके लिये एक देश और एक चुनाव की अवधारणा का पालन आवश्यक नहीं है वरन इसके लिये कठोर कदम उठाने होंगे। चुनाव सुधार अपने आप में एक व्यापक विषय है और इसे एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था से हासिल नहीं किया जा सकता है।
लोक सभा और राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव अलग-अलग समयों पर कराने से नीतिगत फैसलों में सरकार के स्तर पर विलम्ब होता है और उन्हें लागू करने में अनावश्यक देरी होने का भी तर्क दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि चुनाव के कारण आदर्श आचार संहिता लम्बे समय तक लागू रहती है जिससे नीतिगत फैसलों में विलम्ब होता है। एक अनुमान के अनुसार प्रत्येक चुनाव में 45 से 60 दिनों तक सरकार के नीतिगत फैसलों की घोषणा रुकी रहती है। नीति आयोग का अनुमान है कि देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग चुनावों के कारण प्रत्येक वर्ष लगभग 4 माह की अवधि आदर्श आचार संहिता के कारण प्रभावित होती है। लेकिन एक साथ चुनाव कराने पर भी पूरे देश में एक काल खण्ड में आदर्श आचार संहिता लागू रहेगी। उस दौरान भी सरकार पर नीतिगत फैसले लेने पर रोक लगी रहेगी। ऐसे में चुनाव कराने की अवधि कम किये जाने के प्रयास किये जाने चाहिए। दरअसल आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने नुकसान का ब्यौरा नहीं दिया जा रहा है। केवल इसे आधार बनाया जा रहा है। आदर्श आचार संहित के लागू होने में नीतिगत फैसलों की प्रक्रिया को लकवाग्रस्त होने के रूप में चित्रित किया जाना तर्कसंगत नहीं है।
आदर्श आचार संहिता को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराये जाने के उद्देश्य से लागू किया जाता है न कि प्रशासनिक अवरोध के लिए। कहा गया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संसदीय लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के आधारभूत ढांचे के रूप में इसे शामिल किया है। 'एक देश एक चुनाव' की व्यवस्था में बहुमत खोने वाली सरकारों के अगले चुनाव तक सत्ता में बने रहने को लेकर संवैधानिक अड़चनें हैं। कोई भी सरकार तभी तक सत्ता में बनी रह सकती है जब तक उसे जनता का विश्वास प्राप्त है। जनता का विश्वास उसके चुने हुये प्रतिनिधियों के माध्यम से ही व्यक्त होता है। विश्वास खो देने वाली सरकार को किसी भी आधार पर सत्ता में बनाये रखना संविधान सम्मत नहीं कहा जा सकता है। इसके पक्ष में कहा जाने वाला कोई भी तर्क संविधान के मूल ढांचे के विपरीत ही होगा।
'एक देश एक चुनाव' को पहली बार लागू करने के लिए राज्य विधान सभाओं की अवधि या तो कम करनी होगी या बढ़ानी होगी जो संविधान की धारा 83 और 172 का उल्लंघन होगा। संविधान में इन धाराओं के माध्यम से विधान सभाओं की अवधि बढ़ाने से रोका गया है। इसी तरह चुनी गई विधान सभाओं की अवधि को कम किया जाना भी जनादेश का उल्लंघन है। जनता ने जिस काल अवधि के लिए जनादेश दिया है उसे कम करना संविधान सम्मत नहीं होगा। इसी तरह 'एक देश एक चुनावÓ को देश के संघीय ढांचे और क्षेत्रीय दलों के अनुकूल नहीं कहा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होने से राष्ट्रीय दलों के पक्ष में बनने वाली राजनीतिक लहर में क्षेत्रीय मुद्दे गौड़ हो जायेगें। इससे देश के संघीय स्वरूप पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
'एक देश एक चुनाव' की अवधारणा से देश के त्रिस्तरीय पंचायतों और स्थानीय निकायों के चुनाव प्रभावित होंगे। इन चुनाओं की व्यवस्था 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा कराये जाने का प्रावधान किया गया है। ये नगण्य चुनाव नहीं है। देश की कई महानगरपालिकायें और नगर निगम ऐसे हैं जिनका बजट छोटे-छोटे राज्यों के बजट के बराबर या उससे अधिक हैं। दिल्ली, मुम्बई, बंगलुरू, अहमदाबाद और चेन्नई जैसे महानगरों की स्थानीय इकाईयां इसमें शामिल हैं। 'एक देश एक चुनावÓ की अवधारणा में पंचायतीराज और स्थानीय निकायों के चुनावों को शामिल कर लेने से इनकी स्वायत्ता और राजनीतिक महत्ता पर असर पड़ेगा। आज देश में सभी चुनाव एक साथ कराये जाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है- चुनाव सुधार। चुनावों में काले धन के दुरूपयोग पर रोक, सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग रोकने, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा बेहिसाब धन खर्च किये जाने पर प्रतिबन्ध लगाने, चुनावों को अपराधियों से मुक्तरखने, मतदाता सूची को अद्यतन रखने, आदर्श आचार संहिता का कड़ाई से पालन और चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष होना ज्यादा जरूरी है। 'एक देश एक चुनावÓ के नारे में चुनाव सम्बन्धी प्रमुख समस्याओं की अनदेखी हो रही है। संसदीय लोकतंत्र के लिए साफ-सुथरा चुनाव नितान्त जरूरी है न कि सभी चुनाव एक साथ कराया जाना।
(वरिष्ठ पत्रकार हैं)


