'वोट चोरी' के खिलाफ विपक्ष की रैली से बदलाव की उम्मीद
मतदाता सूची से जुड़ी ये समस्याएं ज्ञानेश कुमार के आने से पहले ही शुरू हो गई थीं-

सरकार के लिए आसान रास्ता यह था कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त से कुछ दूरी बनाए रखती या कम से कम दूरी बनाए रखने का दिखावा ही कर लेती। खासकर जब मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यकाल में 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) के तहत बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जिसका बचाव करना लगभग असंभव है। मतदाता सूची से जुड़ी ये समस्याएं ज्ञानेश कुमार के आने से पहले ही शुरू हो गई थीं-
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के आंदोलन के सिलसिले में 1 नवंबर को हुई विपक्ष की संयुक्त रैली अहम मोड़ है जो उन्हें बचाने और बढ़ावा देने वाले 'राजनीतिक आका' के खिलाफ भी है। इस स्थिति में, विपक्ष अब मौजूदा चुनाव आयोग के ढांचे के भीतर रहकर काम नहीं कर सकता क्योंकि ऐसा करने पर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ उनके आंदोलन की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो जाएगी। 2027 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश और चार अन्य राज्यों में चुनाव होने हैं तो ऐसे में स्थिति बिल्कुल साफ है- या तो सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त को बदलने का कोई रास्ता निकाले (हालांकि ऐसा करने पर उसे भारी शर्मिंदगी झेलनी पड़ेगी क्योंकि सरकार ने खुद ज्ञानेश कुमार का बचाव उनसे कहीं ज्यादा किया है) या फिर विपक्ष उनके नेतृत्व में होने वाले चुनावों से दूर रहे। कई लोगों ने पहले ही मांग की है कि अगर ज्ञानेश कुमार अपने पद पर बने रहते हैं तो चुनावों का बहिष्कार किया जाए।
अगर विपक्ष चुनावों का बहिष्कार करता है तो चुनाव एक तमाशा बनकर रह जाएंगे जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा। यहां ऐसा कोई भी बीच का रास्ता नहीं है जिससे सरकार अपनी साख बचा सके और काम-काज पहले की तरह चलता रहे। राजनीतिक टकराव के लिहाज से यह एक खतरनाक मोड़ है, और राष्ट्रीय राजनीति में यह एक तरह से 'करो या मरोÓ की स्थिति है।
दोनों ही स्थितियों में सरकार अपने ही बुने जाल में फंस गई है जबकि विपक्ष एक ऐसी लड़ाई में उलझ गया है जिससे पीछे हटना उसके लिए मुमकिन नहीं है। सरकार के लिए आसान रास्ता यह था कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त से कुछ दूरी बनाए रखती या कम से कम दूरी बनाए रखने का दिखावा ही कर लेती। खासकर जब मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यकाल में 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) के तहत बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जिसका बचाव करना लगभग असंभव है। मतदाता सूची से जुड़ी ये समस्याएं ज्ञानेश कुमार के आने से पहले ही शुरू हो गई थीं- विपक्ष के आरोप 2024 के लोकसभा और महाराष्ट्र चुनावों के समय से ही चले आ रहे हैं। बड़े पैमाने पर किए बदलावों ने सबूत पीछे छोड़ दिए हैं जिससे यह चोरी साफ तौर पर नजर आ रही है।
जैसे-जैसे विरोध प्रदर्शन तेज हो रहे हैं, भाजपा की प्रतिक्रिया खुद को सही साबित करने की कोशिश और विपक्ष की आवाज़ को दबाने वाली रही है। जैसे-जैसे यह धारणा मज़बूत होती है कि भाजपा और चुनाव आयोग एक साथ हैं, राज्यों में उसकी चुनावी जीत और 2024 के लोकसभा चुनावों को लेकर भी सवाल उठने लगते हैं। इसी वजह से विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक रैली में पिछले चुनावों को 'अवैध' करार देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त पर 'देशद्रोह' का आरोप लगाया।
मुख्य सवालों पर कहने के लिए कुछ खास न होने के कारण भाजपा नेताओं ने रैली में जुटी भीड़ पर सवाल उठाए और शिकायत की कि इसके कारण लोगों की दिवाली की खरीदारी में खलल पड़ा। यह एक बेकार बचाव था जिसका उद्देश्य लोगों का ध्यान मुख्य चुनाव आयुक्त के मुद्दे से हटाना था। हकीकत यह है कि 1 नवंबर की 'वोट बचाओ, देश बचाओ' के नारे वाली रैली ने लोगों में एक नई ऊर्जा भर दी है। ज़्यादातर लोगों के अनुसार हाल के वर्षों में राजधानी में हुई सबसे बड़ी रैलियों में से यह एक थी। इसमें देश भर से लोग शामिल हुए। यहां तक कि साधुओं का एक समूह भी इसमें मार्च करता दिखा। सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बड़े पैमाने पर अलग-अलग तरीकों से मज़ाक उड़ाया जा रहा है। बहुत ही सोच-समझकर और बेहिसाब संसाधन खर्च कर दस साल में बनायी गयी छवि अब 'वोट चोरी' के मुद्दे पर बहुत तेज़ी से ढह रही है।
मोदी और उनकी पीआर टीम जरूर सोच रही होगी कि ऐसा कैसे हो गया। इसका एक जवाब उनके अपने काम करने के तरीके में छिपा है। बिना सोचे-समझे चीजों को और अपना फायदा देखने वाले कुछ लोगों ने जोर-शोर से प्रचार करने वाले संचार मॉडल को हर स्थिति के लिए एक बेहतरीन तरीका मान लिया था। तब भी यह साफ था; और अब तो यह बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट हो जाना चाहिए कि जबरदस्ती थोपी गई बातें कभी अच्छा संचार नहीं बन सकतीं। हर जगह छा जाना, बातचीत पर अपना एकाधिकार जमा लेना और बहुत ज्यादा बयानबाजी करना- ये सब कुछ समय के लिए तो शायद सुर्खियां दिला सकते हैं लेकिन इनसे कोई ऐसी चीज नहीं बनती जो लंबे समय तक टिक सके।
वैसे इससे मिलने वाला बड़ा सबक खुद भारत के बारे में है और यह वह नहीं है जिसकी लोगों को उम्मीद थी। 2024 की शुरुआत में 'प्यू रिसर्च सेंटर' के एक सर्वे में पाया गया कि सर्वे में शामिल 85 प्रतिशत भारतीय एक मजबूत नेता या सेना के शासन को पसंद करते हैं। अध्ययन किए गए 24 देशों में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा था। हर तीन में से दो लोग एक ऐसे मजबूत नेता का समर्थन करते हैं जो संसद या अदालतों के दखल के बिना फैसले ले सके। इस हिसाब से देखा जाए तो एक 'मजबूत नेता' की छवि को कोई चुनौती नहीं दी जा सकनी चाहिए थी। मोदी को तो इस समय सबसे ऊंचे मुकाम पर होना चाहिए था लेकिन इसके बजाय उनकी स्थिति कमजोर हो रही है। आखिर ऐसा क्यों हुआ?
कुछ लोगों का तर्क है कि इमरजेंसी के बाद कांग्रेस इसलिए नहीं हारी थी कि अभिव्यक्ति की आजादी और संवैधानिक गारंटी छीन ली गई थी बल्कि इसलिए हारी क्योंकि उस समय जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर जबर्दस्ती नसबंदी जैसे कठोर कदम उठाए गए थे। इस नजरिए से देखें तो भारतीयों के लिए लोकतंत्र का महत्व उतना नहीं है जितना आम तौर पर माना जाता है। फिर भी, 'वोट चोरी' के खिलाफ हुआ आंदोलन एक अलग ही तरह के भारत की कहानी बताता है।
अगर 'प्यू रिसर्च सेंटर' के आंकड़ों पर यकीन करें तो हो सकता है कि भारतीय सैद्धांतिक रूप से 'सख्त शासन' को पसंद करते हों लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में मिलने वाले अधिकार बहुत मायने रखते हैं। वोट देने को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने के एक निमंत्रण के रूप में देखा जाता है। पिछले कई दशकों से चुनाव अधिकारी लोगों के दरवाजे तक जाकर नए मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट में जोड़ते रहे हैं। इसके विपरित 'एसआईआर' के तहत जितनी आसानी से लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। असल में, 'एसआईआर' ने लोगों के मन में डर पैदा कर दिया। निष्पक्ष चुनाव बहुत मायने रखते हैं। भले ही लोगों को चुनावी प्रक्रिया या चुनाव लड़ने और जीतने वाले नेताओं की गुणवत्ता के बारे में शिकायतें हों, परन्तु जब सत्ता हथियाने और उसे बनाए रखने के लिए खुद सिस्टम के साथ ही छेड़-छाड़ की जाती है तो वे विरोध करने के लिए जरूर खड़े हो जाते हैं।
फिर भी देश को कठिन समय के लिए तैयार रहना चाहिए। सोशल मीडिया की पोस्ट हटाने, लोगों को विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने से रोकने, भारी पुलिस बल तैनात करने और आंदोलन के बीच ही विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में जंतर-मंतर की मान्यता खत्म करने जैसे संकेत बता रहे हैं कि शिकंजा कसा जा रहा है। लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों को इतनी आसानी से दबाया नहीं जा सकेगा। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि आगे किस तरह के नए तनाव पैदा होंगे और देश को इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ेगी पर विपक्ष का एकजुट होना और नागरिकों का अपने वोट की रक्षा करने का संकल्प इस घोर निराशा के बीच उम्मीद की एक किरण है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)


