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प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है हरेली तिहार

खेती के साथ मिट्टी-पानी और पर्यावरण का संरक्षण करते हुए देश भर बिना रासायनिक व प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है हरेली तिहार
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  • बाबा मायाराम

खेती के साथ मिट्टी-पानी और पर्यावरण का संरक्षण करते हुए देश भर बिना रासायनिक व प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत किसानों को केंचुआ खाद, हांडी खाद और जैव कीटनाशकों को तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे खेती में लागत खर्च कम हुआ है, मिट्टी में सुधार हुआ है, और उत्पादन बढ़ा है। इस काम को आगे बढ़ाने के लिए इलाके में प्रशिक्षणकर्ता तैयार किए हैं, जो किसानों को जैविक खाद व जैव कीटनाशक तैयार करने के लिए प्रशिक्षण देते हैं।

हाल ही में छत्तीसगढ़ में हरेली तिहार मनाया गया। यह तिहार खेती-किसानी से जुड़ा है, और इसमें किसान उनके कृषि औजारों व पशुधन की पूजा करते हैं। यह प्रकृति, हरियाली और खेती किसानों के प्रति सम्मान दर्शाता है। यह मनुष्य के साथ प्रकृति के अटूट रिश्ते को भी बताता है, जिसमें वह प्रकृति का संरक्षण करते हुए अपना पालन-पोषण भी करता रहा है। आज इस कॉलम में इसी पर विस्तार से बात करना चाहूंगा।

यह पर्व सावन की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। यह त्योहार भी हमारे अन्य त्योहारों की तरह खेती-किसानी, पशुधन, हरियाली और गांव- किसान से जुड़ा हुआ है। इस त्योहार पर खेती किसानी के औजारों व पशुधन की पूजा की जाती है। किसान अच्छी फसल की कामना करते हैं। हरेली का अर्थ हरियाली से है, जिसकी आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरत है। जलवायु बदलाव के दौर में इसकी शिद्दत से महसूस की जा रही है।

हमारे देश के अधिकांश तीज-त्योहार खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं। पोला, अक्ति और नवाखाई और दीपावली भी खेती से जुड़े हैं। अक्ति त्योहार पर गांवों में किसान चना, तिवरा, मसूर, उड़द और महुआ को भूनकर लाई बनाते हैं, ठाकुरदेव की पूजा करते हैं। इसी मौके पर धान के दानों को छींटकर नागर के लोहे से जोता जाता है। किसान घरों से धान बीज बांस की टोकरियों में लेकर खेत जाते हैं और सांकेतिक रूप से धान को बोते हैं। यह पारंपरिक है, सालों से कर रहे हैं। यह बीजों के आदान- प्रदान, बीजों की विविधता और संरक्षण का किसानों का तरीका है।

इसी प्रकार, दिवाली पर गाय, बैल आदि सभी जानवरों को सजाया जाता है। उनकी पूजा की जाती है। हल-बक्खर जैसे कृषि-औजारों की पूजा की जाती है। यह वह समय होता है जब किसान के घर में खरीफ की फसल आ जाती है- ज्वार, मक्का, चावल और उड़द जैसी दालें। अरहर की फसल को छोड़कर, वह बाद में आती है। इस दिवाली में समस्त जीव-जगत के पालन का विचार था। यह दिवाली लोगों को आपस में जोड़ती है।

खेती के साथ मिट्टी-पानी और पर्यावरण का संरक्षण करते हुए देश भर बिना रासायनिक व प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत किसानों को केंचुआ खाद, हांडी खाद और जैव कीटनाशकों को तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे खेती में लागत खर्च कम हुआ है, मिट्टी में सुधार हुआ है, और उत्पादन बढ़ा है। इस काम को आगे बढ़ाने के लिए इलाके में प्रशिक्षणकर्ता तैयार किए हैं, जो किसानों को जैविक खाद व जैव कीटनाशक तैयार करने के लिए प्रशिक्षण देते हैं। इन प्रयासों में राज्य और केन्द्र सरकार के साथ किसान और गैर-सरकारी संस्थाएं भी प्रयास कर रही हैं।

इस प्रक्रिया के तहत समुदाय आधारित बीज बैंक बनाए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं। ओडिशा में देसी बीज सुरक्षा मंच की पहल ने किसानों को जैविक खेती की ओर मोड़ा है। उन्हें जैव खाद व जैव कीटनाशक बनाने का प्रशिक्षण दिया है। देसी बीज बैंक बनाए हैं, जिससे देसी बीजों की सुरक्षा के साथ-साथ उनका संवर्धन भी हो रहा है। इससे मिट्टी-पानी का संरक्षण भी हो रहा है और खेती में लागत खर्च कम हो रहा है और लोगों को जैविक उत्पाद व जैविक भोजन उपलब्ध हो रहा है। इसी प्रकार, उत्तराखंड की विविधता आधारित बारहनाजा पद्धति भी काफी उपयोगी है। इस पद्धति के प्रचार-प्रसार में लगे बीज बचाओ आंदोलन के विजय जड़धारी बताते हैं कि बारहनाजा का शाब्दिक अर्थ बारह अनाज है, पर इसके अंतर्गत बारह से ज्यादा अनाज आते हैं। इसमें दलहन, तिलहन, शाक-भाजी, मसाले व रेशा सभी शामिल हैं। मंडुआ बारहनाजा परिवार का मुखिया कहलाता है। असिंचित व कम पानी में यह अच्छा होता है। पहले मडुंवा की रोटी ही लोग खाते थे, जब गेहूं नहीं था। पोषण की दृष्टि से यह भी बहुत पौष्टिक है।

वे आगे बताते हैं कि बारहनाजा मिश्रित फसल पद्धति है, जिसमें खरीफ की फसलें होती हैं। इस पद्धति में मिट्टी के साथ रिश्ता है। मंडुवा, रामदाना, कुट्टू ज्यादा ताकत लेते हैं। इसलिए दलहन की फसलें लगाई जाती है। यह मिट्टी को उपजाऊ बनाने का काम करती हैं। दालों से नत्रजन मिलता है। यह सब किसानों ने अपने अनुभव से करके सीखा है।

इन अनाजों में कोदा ( मंडुवा), मारसा (रामदाना), ओगल (कुट्टू), जोन्याला (ज्वार), मक्का, राजमा, गहथ (कुलथ), भट्ट (पारंपरिक सोयाबीन), रैयास (नौरंगी), उड़द, सुंटा, रगड़वांस, तोर, मूंग, भगंजीर, तिल, जख्या, सण (सन), काखड़ी इत्यादि।

इसकी फसलें अलग-अलग होते हुए भी एक दूसरे की सहायक हैं। रामदाना, मंडुवा, ज्वार ऊपर की तरफ बढ़ते हैं। बेलवाली दालें उससे लिपट जाती हैं। एक दूसरे को सहारा देती हैं। नियंत्रित करती हैं और उन्हें बढ़ाने में सहायक होती है।

यह खेती बिना लागत वाली है। बीज खुद किसानों का होता है, जिसे वे घर के बिजुड़े (पारंपरिक भंडार) से ले लेते हैं और पशुओं व फसलों के अवशेष से जैविक खाद मिल जाती है, जिसे वे अपने खेतों में डाल देते हैं। परिवार के सदस्यों की मेहनत से फसलों की बुआई, निंदाई-गुड़ाई, देखरेख व कटाई सब हो जाती हैं। इसके अलावा निंदाई-गुड़ाई के लिए कुदाल, दरांती, गैंती, फावड़ा आदि की लकड़ी भी पास के जंगल से मिल जाती है। गांव के लोग ही खेती के औजार बनाते थे।

वे आगे बताते हैं कि पहले बारहनाजा के बीज सभी किसान रखते हैं। खाज खाणु अर बीज धरनु (खाने वाला अनाज खाओ किन्तु बीज जरूर रखो)। बिना बीज के अगली फसल नहीं होगी। बीजों को सुरक्षित रखने के लिए तोमड़ी ( लौकी की तरह ही) का इस्तेमाल किया जाता था।

जलवायु परिवर्तन हो रहा है, यह असलियत है। लेकिन बारहनाजा में इसका मुकाबला करने की क्षमता बारहनाजा में है, ऐसा अनुभव रहा है। जैसे अगर ज्यादा बारिश होती है, सूखा होता है या जंगली जानवर का आक्रमण होता है तो इनसे अगर कुछ फसलों का नुकसान होता है तो उसकी पूर्ति दूसरी फसलों से हो जाती है।

बारहनाजा की फसलों से प्रकृति को बिना नुकसान पहुंचाए पैदावार बढ़ाई जा सकती है, पर्यावरण व मित्र जीवों की रक्षा की जा सकती है। इससे पशुपालन व कृषि का समन्वय किया जा सकता है, इसमें खेती की लागत भी बहुत कम है। इससे गांवों में स्थायी, टिकाऊ खेती से आजीविका व भोजन सुरक्षा की जा सकती है। साथ ही दीर्घकालीन दृष्टि रखकर मिट्टी, पानी का संरक्षण भी किया जा सकता है।

हमारी देश की जलवायु, जैव विविधता और पर्यावरण खेती के लिए अनुकूल है। हरेली तिहार जैसे हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। प्रकृति का, मिट्टी-पानी, पर्यावरण और जैव विविधता का संरक्षण करते हुए आजीविका का भी संरक्षण किया जा सकता है और हमारी भाईचारा बढ़ाने वाली व प्रकृति के साथ समन्वय करने वाली कृषि और उसकी संस्कृति भी बचेगी।


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