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हंसा मेहता ने महिलाओं को 'मानव' का दर्जा दिलाया

केंद्र सरकार ने साल 2023 में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' कानून बनाया था।

हंसा मेहता ने महिलाओं को मानव का दर्जा दिलाया
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नीतीश कुमार सिंह

संविधान सभा में हंसा मेहता कहती हैं- 'इस देश की सामान्य स्त्री शताब्दियों से उस पर पुरुष समाज के नियम, व्यवहार और रीति-रिवाजों द्वारा लादी हुई असमानताओं से पीड़ित है, जो कि सभ्यता के उच्च शिखर से, जिसका कि हम सबको गौरव था, पतित हो गया है। उस गौरव की प्रशंसा डॉ. एस. राधाकृष्णन सदैव करते रहे हैं।' मेहता ने कहा, 'आज ऐसी हजारों स्त्रियां हैं जिन्हें साधारण मानवीय अधिकारों से वंचित रखा जाता है। उन्हें परदों के अंदर घर की चारदीवारी में बंद रखा जाता है।

ंकेंद्र सरकार ने साल 2023 में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' कानून बनाया था। उसमें प्रावधान रखा- 'नई जनगणना व परिसीमन के बाद ही 33 फीसदी आरक्षण लागू होगा।' ऐसे में परिसीमन को लेकर ही यह संविधान संशोधन बिल 16 से 18 अप्रैल तक चले संसद के विशेष सत्र के दौरान पटल पर रखा गया था, जो पारित न हो सका।

संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार हर दस साल में होने वाली जनगणना के बाद देश में परिसीमन होता है। इसके अनुसार साल 2021 में जनगणना प्रस्तावित थी। उस दौर में कोरोना और उससे उपजी परिस्थितियों के कारण वह तब टल गयी थी। हालांकि इस साल 17 अप्रैल से विभिन्न राज्यों में जनगणना शुरू हुई है जो 2027 तक दो चरणों में पूरी होगी।

उसके बाद सीटों के समायोजन के लिए परिसीमन कराना था। इसके लिए संविधान संशोधन के तहत आवश्यक दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी, जिसके नहीं जुटा पाने और बिल को लेकर विपक्ष में अविश्वास के बीच संशोधन पर अभी ब्रेक लग गया है।

अब चहुंओर नारी सशक्तिकरण की बहस-मुनादी का शोर है। यदि सत्ता पक्ष अपने संगठन में महिलाओं की समुचित भागीदारी देकर सकारात्मक कदम बढ़ाए तो विपक्ष के सामने लंबी लकीर खींच सकता है। यह नैतिक और न्यायोचित होगा।

वैसे तो महिलाओं की भागीदारी संविधान बनने के दौरान बेहद कम थी परन्तु वह सशक्त थी। संविधान सभा में सिर्फ 15 महिला सदस्य ही थीं। उनमें सर्वाधिक मुखर हंसा मेहता, सुचेता कृपलानी, अमृता कौर, दुर्गाबाई देशमुख, रेणुका राय, विजयलक्ष्मी पंडित और सरोजिनी नायडू ने विभिन्न अवसरों पर बेबाकी से अपने विचार व्यक्त किए थे।

हंसा मेहता संविधान सभा में अपनी भूमिका अदा करने के संग-संग वर्ष 1946 से 1948 तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत की प्रतिनिधि भी थीं। उन्होंने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के मसौदे में 'आल मेन आर बॉर्न फ्री एंड इक्वल' (शाब्दिक अनुवाद- सभी पुरुष स्वतंत्र और समान पैदा हुए हैं) वाक्यांश को बदलवाकर 'आल ह्यूमन बींग्स आर बॉर्न फ्री एंड इक्वल' (सभी मानव स्वतंत्र और समान पैदा हुए हैं) करवाया था। इसे लैंगिक समानता को लेकर महान बदलाव के तौर पर आज भी याद किया जाता है। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि 'मैन' (पुरुष) शब्द से महिलाओं के अधिकार सीमित न हों। ऐसे ही छोटे और प्रभावी कदमों से महिला सशक्तिकरण की दिशा में मजबूत पहल हो सकती है। उदाहरणार्थ, बिहार ने गरीबी और पिछड़ापन से निकलने के लिए आधी आबादी को सरकारी नौकरियों में 35 फीसदी आरक्षण दिया। पुलिस, शिक्षा और स्वास्थ्य सरीखे क्षेत्रों में महिलाएं नौकरियां पा रही हैं। बिहार ने ही हरेक पंचायत में बारहवीं तक स्कूल खोले और बच्चियों को साइकिलें मुहैया कराईं। इससे व्यापक बदलाव हुए।

ऐसे ही, केरल में कुटुंबश्री, ओडिशा में मिशन शक्ति जैसी आर्थिक सशक्तिकरण की योजनाओं ने महिलाओं को सुदृढ़ किया है। कई राज्यों में महिलाओं के लिए पंचायत स्तरीय चुनाव में 33 से लेकर 50 फीसदी तक का आरक्षण किया गया है। हालांकि संविधान सभा की मंशा अभी अधूरी है।

संविधान सभा में हंसा मेहता कहती हैं- 'इस देश की सामान्य स्त्री शताब्दियों से उस पर पुरुष समाज के नियम, व्यवहार और रीति-रिवाजों द्वारा लादी हुई असमानताओं से पीड़ित है, जो कि सभ्यता के उच्च शिखर से, जिसका कि हम सबको गौरव था, पतित हो गया है। उस गौरव की प्रशंसा डॉ. एस. राधाकृष्णन सदैव करते रहे हैं।' मेहता ने कहा, 'आज ऐसी हजारों स्त्रियां हैं जिन्हें साधारण मानवीय अधिकारों से वंचित रखा जाता है। उन्हें परदों के अंदर घर की चारदीवारी में बंद रखा जाता है। वे स्वतंत्रतापूर्वक अपने घरों से बाहर भी नहीं जा सकतीं। इन परिस्थितियों में जो भी उनका शोषण करना चाहते हैं उनकी वह सरल आखेट बन जाती हैं.'

वे आगे कहती हैं- 'उसने कभी भी संरक्षित स्थान, अपना अनुपातिक भाग या पृथक निर्वाचन की मांग नहीं की है। जो कुछ भी हमने मांगा है, वह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय है। हमने केवल उस समानता की मांग की है जो कि पारस्परिक सम्मान और समझौते का आधार हो सकती है।'

महिला और परिसीमन बिल के इस शोर-शराबे में हमें उन मूल्यों और मार्गदर्शन को याद करना होगा जो हमारी जीवन शैली का आधार बन सकते हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और राजनीति शास्त्र के शिक्षक हैं।)


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