एसआईआर को हरी झंडी और बाहर हुए लोगों की मुश्किलें
एक गहरे स्तर पर एसआईआर प्रक्रिया की यह अव्यवस्था भारतीय लोकतंत्र के कामकाज में मौजूद एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा करती है।

- जगदीश रत्तनानी
एक गहरे स्तर पर एसआईआर प्रक्रिया की यह अव्यवस्था भारतीय लोकतंत्र के कामकाज में मौजूद एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा करती है। यह समस्या उस विशाल और भव्य संवैधानिक ढांचे और उन कमियों के बीच का अंतर है जो तब सामने आती हैं जब इस ढांचे को एक ऐसे राष्ट्र में लागू किया जाता है जहां सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अन्य कई तरह की ढांचागत असमानताएं मौजूद हैं।
इतिहास ही तय करेगा कि चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन- एसआईआर) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को किस नज़र से देखा जाएगा। इसी एसआईआर की वजह से पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों के चुनावों में बड़ी संख्या में मतदाताओं को बाहर कर दिया गया है। 27 मई को चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने जो $फैसला सुनाया वह आयोग के लिए एक बड़ी और निर्णायक जीत है। यह फैसला और भी कई राज्यों में ज़ोर-शोर से एसआईआर प्रक्रिया चलाने का रास्ता खोलता है जिससे शायद वोटर लिस्ट से और भी लोगों को बाहर किया जाएगा। ऐसे में जिन लोगों पर इसका असर पड़ेगा, उन्हें अगर दोबारा लिस्ट में शामिल होने की गुज़ारिश करनी है तो उन्हें और भी दस्तावेज़ पेश करने और अपील दायर करने की एक जटिल प्रक्रिया से गुज़रना पड़ेगा।
इसमें यह प्रक्रिया वोटर लिस्ट से निकाले गए लोगों पर बहुत ज़्यादा बोझ डालती है- भले ही वे पहले लिस्ट में रहे हों और नागरिक भी हों। इस प्रक्रिया की मुश्किलों का एक अंदाज़ा वंचित समुदायों के लिए काम करने वाले एक ट्रस्ट सबार इंस्टीट्यूट के एक पब्लिकेशन से मिलता है। एसआईआर की वजह से वोट देने के अधिकार से वंचित लोगों के लिए इसकी 82 पन्नों की गाइड 'एसआईआर अपील: ए सिटीज़नÓस हैंडबुक' है। इस तरह यह एक ऐसा मामला बन जाता है जिसमें समाधान कागज़ों पर तो उपलब्ध है लेकिन असल में उसे पाना बहुत मुश्किल है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुश्किल को माना तो है लेकिन इसे सुलझाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। जजों ने लिखा- 'हम इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि इतने बड़े पैमाने पर की जाने वाली इस प्रक्रिया से लोगों को काफ़ी परेशानी हो सकती है, खासकर उन लोगों को जिन्हें प्रक्रिया से जुड़ी औपचारिकताओं को पूरा करने में दिक्कतें आ सकती हैं। हालांकि, 'समानुपातिकता के सिद्धांत' (डॉक्टरिन ऑफ प्रपोर्शिनिलिटी) के अनुसार यह ज़रूरी नहीं है कि सारी परेशानियां पूरी तरह से खत्म कर दी जाएं बल्कि यह ज़रूरी है कि उचित सुरक्षा उपायों के ज़रिए ऐसी परेशानियों को कम किया जाए।' समानुपातिकता का सिद्धांत भारतीय कानून में न्यायिक समीक्षा का एक सिद्धांत है जो यह सुनिश्चित करता है कि सरकारी कार्रवाई या सजा, उस उद्देश्य की तुलना में अत्यधिक कठोर न हो जिसे वह प्राप्त करना चाहती है। यह मौलिक अधिकारों और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच संतुलन बनाता है। इसका अर्थ यह है कि यदि सरकार किसी नागरिक के अधिकार पर प्रतिबंध लगाती है तो वह प्रतिबंध 'आवश्यक' और 'तार्किक' होना चाहिए, न कि मनमाना।
हटाए गए नामों की संख्या से साफ़ देखा जा सकता है कि इस प्रक्रिया का व्यापक दायरा और चुनाव प्रणाली पर इसका ज़बरदस्त असर पड़ा है। चुनाव खत्म होने के काफ़ी समय बाद भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त अपीलीय ट्रिब्यूनलों के पास पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के ख़िलाफ़ लगभग 25 लाख अपीलें लंबित हैं। अभी पिछले हफ़्ते ही पश्चिम बंगाल कांग्रेस की एसआईआर समिति के प्रमुख प्रसेनजीत बोस ने बताया कि 14 मई तक ट्रिब्यूनलों ने 6,581 अपीलों का निपटारा किया और इनमें से 61प्रतिशत मतदाताओं (4043 अपीलें) के नाम वोटर लिस्ट में फिर से शामिल कर लिए गए- जिसका मतलब है कि वे वोट देने के योग्य थे लेकिन अप्रैल में हुए विधानसभा चुनावों में वोट नहीं डाल पाए क्योंकि उनके नाम ग़लती से वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे। अगर यही रुझान जारी रहता है, तो यह एसआईआर की वैधता और पश्चिम बंगाल में मिले जनादेश पर सवाल खड़े करता है- खासकर जब कई सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या, जीत के अंतर से भी ज़्यादा थी।
प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़े जोखिमों के अलावा एसआईआर प्रक्रिया उस चीज़ को भी, जिसे भारतीय लोकतंत्र के उत्सव के रूप में मनाया जाता है, उन लोगों के लिए एक बुरे सपने में बदल देती है जिन्हें इससे बाहर रखा गया है। यह विभाजन पैदा कर सकती है और पड़ोसियों को बांट सकती है, खास कर उस समय जब लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा हो और मुकाबला कड़ा हो। जैसा कि पश्चिम बंगाल के हालिया उदाहरण में देखने को मिला। इस प्रकार एक काल्पनिक 'शुद्धता' की तलाश में (जिसे शायद वह कभी हासिल न कर पाए) एसआईआर प्रक्रिया चुनाव आयोग के शब्दों में- 'चुनाव का पर्व, देश का गर्व' को नुकसान पहुंचाने का जोखिम उठाती है।
एक गहरे स्तर पर एसआईआर प्रक्रिया की यह अव्यवस्था भारतीय लोकतंत्र के कामकाज में मौजूद एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा करती है। यह समस्या उस विशाल और भव्य संवैधानिक ढांचे और उन कमियों के बीच का अंतर है जो तब सामने आती हैं जब इस ढांचे को एक ऐसे राष्ट्र में लागू किया जाता है जहां सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अन्य कई तरह की ढांचागत असमानताएं मौजूद हैं। जो सिद्धांत हिमालय जैसी ऊंचाइयों पर एकदम पवित्र और शुद्ध लगते हैं वे 1.4 अरब लोगों वाले इस राष्ट्र के ज़मीनी स्तर पर लागू किए जाने पर अक्सर समझौतों, अपनी सहूलियतों और कभी-कभी चालाकियों में बदल जाते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा तय की गई अनिवार्यताओं का सीधा सा मतलब यह है कि वंचित समुदायों व गरीब तबकों के लोगों के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ हासिल करना, अपील करना या अपने अधिकारों के लिए लड़ना और भी मुश्किल हो जाएगा और संभवत: वे चुनावी सूचियों से बाहर रहने को ही अपनी नियति मान लेंगे- इस तरह इस व्यवस्था द्वारा वोट देने का उनका अधिकार प्रभावी रूप से छिन जाएगा।
इसे आप सिद्धांत और व्यवहार, आदर्श और व्यावहारिकता या योजनाओं और वास्तविकता के बीच का अंतर कह सकते हैं पर इसे लागू करने की प्रक्रिया कई बार संविधान के दायरे में सोची गई मूल भावना से अलग हो सकती है जिससे कथनी और करनी के बीच एक खाई पैदा होती है। इस खाई पर बारीकी से नज़र रखना और इसे लगातार कम करने की कोशिश करना ज़रूरी है क्योंकि इसमें संविधान के मूल उद्देश्य को ही- साथ ही उन कानूनों और कार्यकारी कार्यों के उद्देश्य को भी विफल करने का खतरा छिपा होता है जो संविधान की रोशनी में ही बनाए जाते हैं और अंतत: इससे हमारे गणतंत्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। एसआईआर मामले में ज़मीनी स्तर से मिल रहे सभी सबूत यही इशारा करते हैं कि यह खाई और भी ज़्यादा चौड़ी हो गई है।
फिर भी, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कागज़ों पर सभी प्रक्रियाएं एकदम बेदाग और त्रुटिहीन हैं। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी टिप्पणी की है- 'विचाराधीन प्रक्रिया एक वैध और संवैधानिक रूप से मान्य उद्देश्य पर आधारित थी- यानी, मतदाता सूचियों की सटीकता, पूर्णता और विश्वसनीयता को बहाल करना। जिस समस्या का समाधान करने का प्रयास किया जा रहा था उसकी प्रकृति को देखते हुए इस प्रक्रिया के विशाल दायरे को देखते हुए और इसे लागू करते समय अपनाई गई प्रक्रियागत सुरक्षा व्यवस्थाओं को देखते हुए- आयोग द्वारा उठाए गए कदमों को, हासिल किए जाने वाले उद्देश्य के अनुपात में असंतुलित या अनुचित नहीं कहा जा सकता।'
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की विशेषज्ञता का भी ज़िक्र किया। उसने कहा: 'इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि चुनाव संबंधी समीक्षा प्रक्रिया के तौर-तरीके, पैमाने और स्वरूप को तय करने के लिए आयोग एक विशिष्ट स्थिति में है।' यह बात नोटबंदी से जुड़े एक पिछले फैसले से ली गई थी जिसमें कहा गया था-'जटिल और व्यवस्थागत चिंताओं को दूर करने के लिए कौन सा उपाय उचित या प्रभावी होगा, यह तय करना मुख्यरूप से उन विशेष संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आता है जिनके पास ज़रूरी विशेषज्ञता होती है।'
फिर भी, यह बात अच्छी तरह समझी जाती है कि विशेषज्ञों पर पूरी तरह से निर्भर रहने में आम लोगों को कमज़ोर करने का जोखिम होता है क्योंकि जिन विशेषज्ञों के हाथों में हितों की रक्षा, नीति-निर्माण और $फैसले लेने का अधिकार होता है उस फैसले की प्रक्रिया में शायद ही कभी उन आम लोगों की असल ज़िंदगी की सच्चाइयों को शामिल किया जाता है जिन पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ने वाला होता है। चुनाव आयोग के मामले में कहा जाए तो उसे अपनी ज़िम्मेदारी को प्रभावी ढंग से निभाने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरत लोगों और राजनीतिक दलों के पूरे भरोसे की है, न कि वोटर लिस्ट को इतना ज़्यादा 'परफेक्टÓ बनाने की कोशिश करना जिसकी क़ीमत उन लोगों को बाहर करने के रूप में चुकानी पड़े जिनकी आवाज़ शायद उतनी बुलंद न हो।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।सिंडिकेट:द बिलियन प्रेस)


