बाढ़ को रोकने की अच्छी परंपराएं
हमारी बरसों पुरानी परंपराओं में ही आज की बाढ़ जैसी समस्या के समाधान के सूत्र छिपे हैं।

- बाबा मायाराम
हमारी बरसों पुरानी परंपराओं में ही आज की बाढ़ जैसी समस्या के समाधान के सूत्र छिपे हैं। अगर ऐसे समन्वित विकल्पों पर काम किया जाए तो न केवल बाढ़ जैसी बड़ी समस्या से निजात पा सकते हैं। पर्यावरण और जैव-विविधता और बारिश के पानी का संरक्षण कर सकेंगे। सदानीरा नदियों को भी बचा सकेंगे।
हाल ही में नेपाल में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है, जिससे जान-माल का काफी नुकसान हुआ है। प्राकृतिक आपदा ने लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। अब तो हालत यह हो गई है कि थोड़ी भी बारिश हुई कि तो जगह-जगह पानी भर जाता है, और लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
हमारे देश में बाढ़ आफत लेकर आती है। बिहार, असम, हिमालय के कई हिस्सों से बाढ़ की खबरें आती रही हैं। देश के अन्य हिस्सों से भी बाढ़ से बर्बादी होती है। शहरी इलाकों में विशेषकर, बाढ़ की खबरें आती रही हैं। पिछले कुछ सालों में मुंबई और चेन्नई की बाढ़ की चर्चा में रही है। जबकि यही बाढ़ पहले उपजाऊ मिट्टी लेकर आती थी, जिससे खेत उर्वर होते थे। नदियां साफ होती थीं।
बारिश पहले भी होती थी, ज्यादा होती थी, पर बहुत ज्यादा होती थी तभी बाढ़ आती थी। लेकिन अब तो थोड़ी भी बारिश हुई तो बाढ़ आ जाती है। एक तो कारण अब कुछ पर्यावरणविद् और जानकार बताने लगे हैं कि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, टूट रहे हैं, भूस्खलन हो रहे हैं।
इसके अलावा, बांध पहले बाढ़ नियंत्रण के उपाय बताए जाते थे, अब वही बाढ़ के कारण बन रहे हैं। लेकिन बाढ़ के कारण और भी हैं। जैसे रेत खनन, जंगल की कटाई, नदियों के आसपास की जमीन पर कब्जा होना, नदियों के रास्ते मोड़ना या रास्ता बदल देना और पानी के परंपरागत ढांचों की उपेक्षा और जलवायु बदलाव भी एक कारण बताया जा रहा है।
पहले नदियों के आसपास खाली परती जम़ीन, नाले, ताल, तालाब हुआ करते थे। पेड़ पौधे, छोटी-मोटी झाड़ियां हुआ करती थीं। गांवों में लोगों के घर भी मिट्टी के होते थे। घरों के आगे-पीछे सब्जी बाड़ी हुआ करती थीं। गांवों के आसपास भी खाली जमीन हुआ करती थीं। अगर बाढ़ आती भी थी, तो उसका पानी यहां प्रवेश कर जाता था, और नदियों का वेग कम हो जाता था। बारिश का पानी धरती का पेट भरता था। यानी धरती में समा जाता था, जिससे जलस्तर ऊंचा होता था। परिणामस्वरूप बाढ़ से ज्यादा नुकसान नहीं होता था।
पहले नदियों के आसपास लम्बे-लम्बे चारागाह होते थे, उनमें पानी थम जाता था। नदियों के अतिरिक्त पानी की ठेल ऐसी जगह होती थी। बड़ी नदियों का ज्यादा पानी छोटे-नदी, नालों में भर जाता था। लेकिन अब उस जगह पर भी या तो खेती होने लगी है या अतिक्रमण हो गया है।
पहले नदियों के तट विशाल व फैले हुए होते थे। वहां की रेत पानी को स्पंज की तरह जज्ब करके रखती थी। अब रेत खनन का बड़े पैमाने पर हो रहा है। जब रेत ही नहीं रहेगी तो पानी कैसे रुकेगा, नदी कैसे बहेगी, कैसे बचेगी। अगर रेत रहेगी तो नदी रहेगी। लेकिन जैसे ही बारिश ज्यादा होती है, वेग से पानी बहता है, उसे ठहरने की कोई जगह नहीं रहती।
जंगल और पेड़ भी बारिश के पानी को रोकते हैं। वह पानी को बहुत देर तो नहीं थाम सकते लेकिन पानी के वेग को कम करते हैं। स्पीड ब्रेकर का काम करते हैं। लेकिन पेड़ नहीं रहेंगे तो बहुत गति से पानी नदियों में आएगा और बरबादी करेगा।
कई बांध व बड़े जलाशयों में नदियों को मोड़ दिया जाता है, उससे नदी ही मर जाती है। निचले हिस्से में लोग समझते हैं, नदी ही नहीं तो वे उसकी जमीन पर खेती करने लगते हैं या कोई और उपयोग, तो जब बारिश ज्यादा होती है तो पानी को निकलने का रास्ता नहीं मिलता। नदियों के किनारे और तट की जमीन अब दिखाई नहीं देती।
शहरों में तो यह समस्या बड़ी है। पानी निकलने का रास्ता ही नहीं है। जैसे करीब दो दशक पहले मुंबई की बाढ़ का किस्सा सामने आया था। वहां मीठी नदी ही गायब हो गई, और जब पानी आया तो शहर जलमग्न हो गया। ऐसी हालत ज्यादातर शहरों की हो जाती है।
मौसम बदलाव भी एक कारण है। पहले सावन-भादो में लंबे समय तक झड़ी लगी रहती थी। रिमझिम बारिश होती रहती थी। हफ्ते पखवाड़े पर सूर्य के दर्शन नहीं होते थे। यह पानी फसलों के लिए और भूजल पुर्नभरण के लिए बहुत उपयोगी होता था। फसलें भी अच्छी होती थी और धरती का पेट भी भरता था। अब बड़ी-बड़ी बूंदों वाला पानी कुछ दिन बरसता है, जिससे कुछ ही समय में बाढ़ आ जाती है। वर्षा के दिन भी कम हो गए हैं।
इसके अलावा पानी के परंपरागत ढांचों की भी भारी उपेक्षा हुई है। ताल, तलैया, तालाब, खेतों में मेड़ बंधान आदि से भी पानी रुकता है। पहले हर गांव में तालाब हुआ करते थे। छत्तीसगढ़ में तो एक गांव में कई-कई तालाब अब भी है। यहां पानीदार परंपरा है । लेकिन आजकल इन पर ध्यान न देकर भूजल के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है।
जंगल बचाना, पेड़ लगाना भी अच्छा तरीका है, मिट्टी कटाव को रोकने का, जिसकी आज बहुत जरूरत है। उत्तराखंड में टिहरी गढ़वाल जिले के जड़धार गांव में जंगल बचाने का अनूठा काम हुआ है। एक जमाने में यहां बांज-बुरांस का सदाबहार जंगल था, जो सूख गया था। उजड़ गया था। इससे जलस्रोत भी सूख गए। इससे चिंतित होकर यहां के लोगों ने जंगल बचाने का काम किया, इसकी रखवाली की, जंगल बचाने के नियम बनाए, दोषियों पर जुर्माना लगाया, जिससे कुछ ही सालों में जंगल फिर से जी उठा। हरा-भरा हो गया।
मैं कुछ साल पहले इस गांव में गया था। यह जंगल मैंने देखा है। चारों ओर हरियाली लौट आई है। पानी के स्रोत फिर से फूट पड़े हैं। वे फिर से बहने लगे हैं। कई पक्षियों की प्रजातियां लौट आई हैं। औषधियां पेड़-पौधे भी हैं। अब गांव के लोगों को घास और ईंधन के लिए लकड़ियों को दूर नहीं जाना पड़ता है। इसके साथ ही इस गांव में देसी बीजों की बारहनाजा पद्धति को फिर से चलन में लाने का श्रेय जाता है। इन सब प्रयासों से मिट्टी-पानी और जैव विविधता का संरक्षण हो रहा है।
कुल मिलाकर, हमारी बरसों पुरानी परंपराओं में ही आज की बाढ़ जैसी समस्या के समाधान के सूत्र छिपे हैं। अगर ऐसे समन्वित विकल्पों पर काम किया जाए तो न केवल बाढ़ जैसी बड़ी समस्या से निजात पा सकते हैं। पर्यावरण और जैव-विविधता और बारिश के पानी का संरक्षण कर सकेंगे। सदानीरा नदियों को भी बचा सकेंगे।


