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नजरअंदाज नहीं की जा सकती जेन जेड की नाराजगी

पड़ोसी देशों में हुए विरोध-प्रदर्शनों का संदर्भ निकालना संभव है लेकिन यह साफ़ है कि नेपाल और पड़ोसी देशों की तुलना में भारत अपने बड़े आकार को देखते हुए अलग स्थिति में है।

नजरअंदाज नहीं की जा सकती जेन जेड की नाराजगी
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  • लेखा रत्तनानी

पड़ोसी देशों में हुए विरोध-प्रदर्शनों का संदर्भ निकालना संभव है लेकिन यह साफ़ है कि नेपाल और पड़ोसी देशों की तुलना में भारत अपने बड़े आकार को देखते हुए अलग स्थिति में है। इतने बड़े देश में विरोध का बढ़ना लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेफ्टी वॉल्व के महत्व को दिखाता है। जैसा कि हम आज देख रहे हैं- जब इन्हें दबाया या ब्लॉक किया जाता है तो भारत जैसे बड़े देश में भी भाप नए तरीकों से निकल सकती है।

ृ20 जुलाई को जब दिल्ली में सुबह हुई तो जंतर-मंतर एक युद्ध के मैदान में बदलने लगा। नई दिल्ली की 300 साल पुरानी वेधशाला की ओर जाने वाली सड़कों पर छात्र उतर आए। कई युवा रात भर का सफ़र कर पड़ोसी राज्यों और देश के दूसरे हिस्सों से उस जगह पर जमा हुए जो भारत में छात्रों का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन बन गया है। हाथ से बने पोस्टर और प्लेकार्ड लेकर वे भारत की संसद तक मार्च करने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्ती$फे की मांग करने आए थे। पूरे भारत में मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए होने वाली परीक्षा नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट (नीट) के पेपर लीक होने के बाद यह सब हुआ।

जंतर-मंतर से संसद तक की दूरी 2 किलोमीटर से भी कम है लेकिन यह रास्ता लंबा साबित हुआ। दुनिया यह सब देख रही थी तो छात्रों के जुलूस को बुरी तरह रोका गया। वे लाउडस्पीकर लगे एक ट्रक के पीछे चल रहे थे जो संसद का रास्ता दिखा रहा था। प्रदर्शनकारियों का सामना जंतर-मंतर से लगभग 500 मीटर दूर सात फुट ऊंचे मेटल बैरिकेड्स की दीवार से हुआ। इसके बाद उन्हें आंसू गैस के गोले, वॉटर कैनन, दंगा-रोधी गाड़ियां और पुलिस बल का सामना करना पड़ा। निषेधाज्ञा, सरकार के आदेश पर इंटरनेट बंद करने और लाठी लिए दिल्ली पुलिस की बाधाओं को छात्रों का गुस्सा पार कर गया। इसकी तस्वीरें हर जगह हैं जिनमें एक कॉन्स्टेबल बेहोश लड़के को हिलाकर होश में लाने की कोशिश कर रहा है, छात्रों की पिटाई हो रही है, कपड़े फाड़े जा रहे हैं और उन्हें घसीटा जा रहा है। यह युवाओं और सरकारी तंत्र के बीच का टकराव है जिसमें बल प्रयोग हुआ, कई लोग घायल हुए और कम से कम 150 छात्रों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। यह विरोध-प्रदर्शन गुस्से और अचानक उपजे जोश से भरा है। जो लोग अव्यवस्था के बजाय व्यवस्था चाहते हैं उनके लिए राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव बताते हैं कि इतिहास गवाह है कि ऐसे आंदोलन गुस्से से ही पनपे हैं।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था को खराब करने वाले बढ़ते कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार, शासन की कमी, बढ़ती लागत, कोचिंग हब और तकनीकी गड़बड़ियों के ख़िलाफ़ निराशा और गुस्सा सामने आया है। हद तब हो गई जब 3 मई को डॉक्टर बनने के इच्छुक लगभग 22 लाख छात्रों ने मेडिकल परीक्षा दी। नौ दिन बाद पेपर लीक होने के कारण परीक्षा रद्द कर दी गई। 21 जून को दोबारा परीक्षा हुई लेकिन मेडिकल परीक्षा की तैयारी में दो साल से ज़्यादा समय बिताने वाले छात्रों पर इसका बहुत बुरा असर पड़ा और कम से कम 20 युवाओं की आत्महत्या की ख़बरें आईं।

मई से भारत में एक अनोखे नाम वाले दल 'कॉकरोच जनता पार्टीÓ (सीजेपी) की तरफ़ से विरोध-प्रदर्शनों की एक नई लहर देखी जा रही है। यह पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन को टक्कर दे रही है। सीजेपी का उदय अचानक ही हुआ और देखते ही देखते लाखों लोग इससे जुड़ गए। पार्टी ने 6 जून को नई दिल्ली में अपना पहला बड़ा ज़मीनी विरोध प्रदर्शन किया जिसमें शिक्षामंत्री धर्मेंन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग की गई। इसके अलावा आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवज़ा देने और लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को सफ़दरजंग अस्पताल से रिहा करने की भी मांग की जा रही है। वांगचुक की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें 18 जुलाई को ज़बरदस्ती सफ़दरजंग अस्पताल ले जाया गया था लेकिन अब उन्हें गुरुग्राम के एक प्राइवेट अस्पताल में शिफ़्ट कर दिया गया है। वांगचुक ने 28 जून को जंतर-मंतर पर छात्रों का साथ देकर उनकी आवाज़ को सबके सामने रखा और उनके समर्थन में 'कॉकरोच' के बैनर तले अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की।

विरोध के प्रतीक के तौर पर मई में बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र और पॉलिटिकल कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट अभिजीत दिपके ने 'कॉकरोच' (तिलचट्टा) का विचार दिया था। यह नाम भारत के चीफ जस्टिस की एक टिप्पणी से आया जिसमें उन्होंने नौकरी न पाने वाले युवाओं के बारे में बात करते हुए कॉकरोच का ज़िक्र हल्के-फुल्के अंदाज़ में किया था। जब दिपके ने विरोध के प्रतीक के तौर पर कॉकरोच का इस्तेमाल किया तो उन्हें जो प्रतिक्रिया मिली उससे वे हैरान रह गए। चीफ जस्टिस ने साफ़ किया था कि उनका मतलब सिफ़र् उन लोगों से था जो नौकरी पाने के लिए फ़ज़ीर् डिग्री का इस्तेमाल करते हैं, न कि देश के युवाओं से। किन्तु यह बात उन कॉकरोच के नीचे दब गई जो मीम्स, वीडियो, गानों और अब ज़मीनी स्तर पर विरोध प्रदर्शनों में दिखाई दे रहे हैं। अपने विरोध को एक ठोस रूप देने के लिए दिपके 6 जून को बोस्टन से लौटे थे।

कॉकरोच के डिजिटल रूप को सरकार नज़रअंदाज़ कर सकती थी और उसने किया भी, लेकिन दिल्ली में हो रहे ज़मीनी विरोध को दबाया नहीं जा सकता। इसने हज़ारों छात्रों को राष्ट्रीय राजधानी की ओर आकर्षित किया है और पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। बड़े पैमाने पर फैल रहे इस विरोध से पहले भी कॉकरोच चर्चा का विषय रहा है क्योंकि चीफ जस्टिस ने भारत के एक और अहम मुद्दे- बेरोज़गारी पर बात की है।

भारत में अनुमानित '1.1Ó करोड़ युवा ग्रेजुएट्स के लिए आज बेरोज़गारी एक गंभीर सच्चाई है। इस साल मार्च में प्रकाशित एक प्रमुख सालाना लेबर रिपोर्ट ('द स्टेट ऑफ़ वर्किंग इंडिया 2026'- भारत में स्वतंत्र अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की नवीनतम जॉब्स रिपोर्ट') के पांचवें संस्करण से पता चलता है कि 20-29 साल की उम्र के सभी बेरोज़गार युवाओं में से 67 प्रतिशत ग्रेजुएट हैं। यानी 148 करोड़ की आबादी वाले यानी 'युवा' देश में 1.1 करोड़ लोग, जहां औसत उम्र 29.2 साल है और 52 प्रतिशत आबादी 30 साल से कम उम्र की है, वे बेरोजगार हैं। दो दशक पहले बेरोज़गार युवाओं की श्रेणी में ग्रेजुएट्स की संख्या इससे आधी से भी कम मतलब 32 प्रति सैकड़ा थी। इन दो दशकों में युवा आबादी में उनकी हिस्सेदारी 10 से बढ़कर 28 फीसदी हो गई है।

बेरोज़गारी अब एक कठोर और लगातार बनी हुई आर्थिक अनिश्चितता के माहौल में है जिसे मध्य पूर्व के संघर्ष ने और बढ़ा दिया है। कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह स्थिति पिछले 50 सालों में सर्वाधिक गंभीर है।

कुछ मायनों में भारत एक बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रहा है। 'कॉकरोच पार्टी' लोकतंत्र में असहमति ज़ाहिर करने का एक अनोखा और अप्रत्याशित तरीका है और यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब देश अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़े कई तरह के दबावों का सामना कर रहा है।

हालांकि पड़ोसी देशों में हुए विरोध-प्रदर्शनों का संदर्भ निकालना संभव है लेकिन यह साफ़ है कि नेपाल और पड़ोसी देशों की तुलना में भारत अपने बड़े आकार को देखते हुए अलग स्थिति में है। इतने बड़े देश में विरोध का बढ़ना लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेफ्टी वॉल्व के महत्व को दिखाता है। जैसा कि हम आज देख रहे हैं- जब इन्हें दबाया या ब्लॉक किया जाता है तो भारत जैसे बड़े देश में भी भाप नए तरीकों से निकल सकती है।

(लेखिका 'द बिलियन प्रेस' की मैनेजिंग एडिटर हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)


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