गाजा संघर्ष : नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल
सयुक्त राष्ट्र की हालिया स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की रिपोर्ट ने इजरायल और कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्रों में जारी हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों की गंभीर तस्वीर पेश की है।

- आर. सूर्यामूर्ति
गाजा संघर्ष ने प्रमुख शक्तियों के दोहरे मानदंडों की बहस को भी तेज किया है। अमेरिका इजरायल की सुरक्षा का समर्थन करते हुए मानवीय स्थिति पर चिंता जताता है। यूरोपीय देशों के भीतर भी मतभेद दिखाई देते हैं, जबकि रूस और चीन अंतरराष्ट्रीय कानून की बात करते हैं, लेकिन स्वयं भी ऐसे आरोपों से घिरे रहे हैं।
सयुक्त राष्ट्र की हालिया स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की रिपोर्ट ने इजरायल और कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्रों में जारी हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों की गंभीर तस्वीर पेश की है। यह रिपोर्ट केवल अत्याचारों का दस्तावेज नहीं, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अपनी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता खोती जा रही है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था इस सिद्धांत पर आधारित थी कि कोई भी देश, सेना या सशस्त्र संगठन अंतरराष्ट्रीय कानून से ऊपर नहीं होगा। इसी उद्देश्य से जिनेवा कन्वेंशन, संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय जैसी संस्थाओं की स्थापना की गई थी, ताकि शक्ति पर कानून का नियंत्रण बना रहे। लेकिन गाजा और कब्जे वाले पश्चिमी तट की स्थिति यह संकेत देती है कि ये संस्थाएं अब जवाबदेही सुनिश्चित करने के बजाय केवल उल्लंघनों का रिकॉर्ड तैयार करने तक सीमित होती जा रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कब्जा और अधिक गहरा हुआ है, बस्तियों का विस्तार तेज हुआ है और आम नागरिकों की पीड़ा सामान्य स्थिति बन गई है। रिपोर्ट इजरायल पर ऐसे हालात बनाने का आरोप लगाती है, जिनमें बसने वालों की हिंसा राजनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने का माध्यम बनती जा रही है। दूसरी ओर, रिपोर्ट हमास द्वारा फिलिस्तीनियों के खिलाफ फांसी, यातना और भय का वातावरण बनाकर नियंत्रण स्थापित करने की भी चर्चा करती है। इस संघर्ष में आम नागरिक एक ओर राज्य की सैन्य शक्ति और दूसरी ओर उग्रवादी हिंसा के बीच फंस गए हैं।
इजरायल अपनी सुरक्षा और सात अक्टूबर के हमलों का हवाला देता है, जबकि फिलिस्तीनी दशकों से चले आ रहे कब्जे, विस्थापन और सैन्य कार्रवाई की ओर ध्यान दिलाते हैं। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं, लेकिन इनमें से कोई भी नागरिकों पर हमले, बंधक बनाने, सामूहिक दंड, यातना या जबरन जनसंख्या परिवर्तन को उचित नहीं ठहरा सकता। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि युद्ध के दौरान भी मानवीय सीमाएं तय करने के लिए बनाया गया है।
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि अत्याचारों के दस्तावेजीकरण और जवाबदेही के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। आज संयुक्त राष्ट्र उपग्रह चित्रों, डिजिटल फॉरेंसिक तकनीकों और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही के माध्यम से पहले से कहीं अधिक प्रभावी ढंग से जांच करने में सक्षम है। इसके बावजूद राजनीतिक स्तर पर कार्रवाई का अभाव बना हुआ है। रिपोर्टें तैयार होती हैं, आपात बैठकें बुलाई जाती हैं, और प्रस्ताव पारित किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर हिंसा और मानवीय संकट जारी रहते हैं।
पश्चिमी तट की स्थिति इस विफलता को और स्पष्ट करती है। लंबे समय तक बसने वालों की हिंसा को कुछ चरमपंथी व्यक्तियों की अलग-थलग घटनाओं के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन आयोग का कहना है कि हमलों की निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और फिलिस्तीनी समुदायों की सुरक्षा में लगातार विफलता ने दंडमुक्ति की संस्कृति को बढ़ावा दिया है। जब हिंसा का इस्तेमाल समुदायों को विस्थापित करने, जनसांख्यिकीय बदलाव लाने और क्षेत्रीय नियंत्रण बदलने के लिए होने लगे, तो वह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह जाती, बल्कि नीति का साधन बन जाती है।
रिपोर्ट हमास की भूमिका पर भी उतनी ही स्पष्ट है। इसमें बताया गया है कि संगठन ने फांसी, यातना और सार्वजनिक भय के जरिए अपने नियंत्रण को मजबूत किया। यह निष्कर्ष उन चयनात्मक राजनीतिक धारणाओं को चुनौती देता है, जिनमें एक पक्ष को पूरी तरह सही और दूसरे को पूरी तरह गलत मान लिया जाता है। यदि मानवाधिकारों का मूल्यांकन राजनीतिक निष्ठा के आधार पर होने लगे, तो कानून की सार्वभौमिकता समाप्त हो जाएगी।
रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि यह संकट केवल गाजा तक सीमित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार कई बार ऐसे समय सामूहिक कार्रवाई को रोक देता है, जब उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। गाजा, यूक्रेन, सूडान और म्यांमार जैसे संघर्षों में बार-बार यही स्थिति देखने को मिली है कि प्रस्ताव आते हैं, कूटनीतिक गतिरोध बना रहता है और आम नागरिक सबसे अधिक कीमत चुकाते हैं।
गाजा संघर्ष ने प्रमुख शक्तियों के दोहरे मानदंडों की बहस को भी तेज किया है। अमेरिका इजरायल की सुरक्षा का समर्थन करते हुए मानवीय स्थिति पर चिंता जताता है। यूरोपीय देशों के भीतर भी मतभेद दिखाई देते हैं, जबकि रूस और चीन अंतरराष्ट्रीय कानून की बात करते हैं, लेकिन स्वयं भी ऐसे आरोपों से घिरे रहे हैं। इससे विशेषकर वैश्विक दक्षिण के देशों में यह धारणा मजबूत हुई है कि नियम-आधारित व्यवस्था सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं होती।
यदि जवाबदेही चयनात्मक दिखाई देगी, तो देश कानूनी दायित्वों के बजाय राजनीतिक संरक्षण की गणना करने लगेंगे। इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया भर की सेनाएं और सशस्त्र संगठन गाजा को भविष्य के युद्धों के लिए एक उदाहरण के रूप में देख रहे हैं। यदि मानवीय कानून के उल्लंघन की राजनीतिक कीमत लगातार घटती गई, तो भविष्य के संघर्ष और अधिक क्रूर हो सकते हैं।
इस संघर्ष का सबसे गहरा प्रभाव अगली पीढ़ी पर पड़ेगा। फिलिस्तीनी बच्चे विस्थापन, अभाव और हिंसा के बीच बड़े हो रहे हैं, जबकि इजरायली बच्चे आतंकवाद, असुरक्षा और कठोर होती राजनीतिक सोच के माहौल में जीवन जी रहे हैं। भवन और सड़कें दोबारा बनाई जा सकती हैं, लेकिन विश्वास और सामाजिक संबंधों का पुनर्निर्माण कहीं अधिक कठिन होता है।
केवल युद्धविराम, मानवीय सहायता या पुनर्निर्माण स्थायी समाधान नहीं दे सकते। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जवाबदेही की उस व्यवस्था को मजबूत करना होगा, जिसमें जांच केवल अभिलेख तैयार करने तक सीमित न रहे, बल्कि उसके आधार पर कानूनी, कूटनीतिक और राजनीतिक कार्रवाई भी सुनिश्चित हो। गाजा का सबसे बड़ा नुकसान केवल वहां की तबाह इमारतें और बिखरे जीवन नहीं, बल्कि यह भी हो सकता है कि दुनिया का यह विश्वास ही समाप्त हो जाए कि कानून अब भी शक्ति को नियंत्रित कर सकता है। एक बार यह विश्वास टूट गया, तो उसे दोबारा स्थापित करना किसी भी उजड़े शहर के पुनर्निर्माण से कहीं अधिक कठिन होगा।


