ललित सुरजन की कलम से तीसरा मोर्चा बनाम वामदल
'1952 में पहले आम चुनाव के बाद भारत की कम्युनिस्ट पार्टी प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी थी।

'1952 में पहले आम चुनाव के बाद भारत की कम्युनिस्ट पार्टी प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी थी। सवाल उठता है कि जो पार्टी या जो विचारधारा 1952 में कांग्रेस के विकल्प के रूप में मौजूद थी वह उस जगह से अपदस्थ कैसे हुई और उग्रराष्ट्रवादी हिन्दुत्ववादी शक्तियों ने वामपंथी ताकतों को धीरे-धीरे कर भारतीय राजनीति के हाशिए पर क्यों कर धकेल दिया। यह एक प्रकट वास्तविकता है और इसका सामना करने का साहस वामदलों में होना चाहिए। मेरा मानना है कि आम चुनाव के समय क्षेत्रीय दलों से अल्पकालीन गठजोड़ करने से वामपंथी ताकतें मजबूत नहीं बल्कि और कमजोर ही होंगी। मेरा यह भी मानना है कि आज के वैश्विक परिदृश्य को समझने की क्षमता भारत में या तो कांग्रेस में है या फिर वामपंथियों में; और अपनी तार्किक क्षमताओं का मैदानी कार्रवाई में रूपांतरण करने से ही वाममोर्चा 1952 में या उससे बेहतर स्थिति में पहुंच सकता है।'
(देशबन्धु में 16 मई 2013 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/06/blog-post_22.html


