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ललित सुरजन की कलम से - वे आपसे मिलना चाहते हैं

जनता आपको काम करने के लिए चुनती है। आपकी इज्जत भी करती है, लेकिन जब आप अहंकार में आ जाते हैं

ललित सुरजन की कलम से - वे आपसे मिलना चाहते हैं
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जनता आपको काम करने के लिए चुनती है। आपकी इज्जत भी करती है, लेकिन जब आप अहंकार में आ जाते हैं, भ्रष्टाचार करते समय आगा-पीछा नहीं सोचते, आम आदमी से दुर्व्यवहार करने लगते हैं, आपकी लालबत्ती उसे डराने लगती है, आपके काफिले को रास्ता देने के लिए उसे दुबकना पड़ता है, आपके मीठे आश्वासन जब झूठे हो जाते हैं, जब आप अवसरवादियों और खुशामदखोरों के चक्कर में पड़ जाते हैं, जब आप मोटा चंदा देने वालों के चंगुल में फंस जाते हैं, जब आप जनता को अधिकार नहीं, दया का पात्र मान बैठते हैं, तब ऊपर से जनता भले ही खामोश रहे, भीतर-भीतर वह तड़पती रहती है और सबक सिखाने के लिए मौके का इंतजार करती है।

- बाबा रे बाबा! आप ऐसी बात सोच रहे हैं। वे जब आपसे मिलेंगे तब क्या यही बातें कहेंगे?

- हां भाई! मिलूंगा तो यही कहूंगा। आप कहें तो आपके साथ चलकर वे दिल्ली, भोपाल, जयपुर, रायपुर जहां भी रहते हों उनसे सामने-सामने यह बात कर सकता हूं।

- ऐसा कहकर तो आप मेरी नौकरी खा जाएंगे। बेहतर है कि आप उनसे ना ही मिलें।

- यही तो मैं शुरू से ही कह रहा था कि मेरे जैसा आम आदमी उनके काम का नहीं है।

(देशबंधु में 25 अप्रैल 2013 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/04/blog-post_25.html


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