ललित सुरजन की कलम से - समृद्धि (?) की कीमत
'आज जब सीएजी द्वारा एक के बाद एक रिपोर्ट में सरकारी कामकाज में कथित भ्रष्टाचार का खुलासा किया जा रहा है, तब यह याद कर लेना उचित होगा कि इन नीतियों से किसे लाभ पहुंचा है

'आज जब सीएजी द्वारा एक के बाद एक रिपोर्ट में सरकारी कामकाज में कथित भ्रष्टाचार का खुलासा किया जा रहा है, तब यह याद कर लेना उचित होगा कि इन नीतियों से किसे लाभ पहुंचा है।
अगर ये नीतियां न होतीं तो न तो जीडीपी बढ़ती, न शेयर मार्केट और उद्योगों में पूंजी निवेश होता, न छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हो पातीं, न फोरलेन-सिक्सलेन राजमार्ग बनते, न दिल्ली का टी-3 विमानतल बनता, न माल खुलते, न बच्चे-बच्चे के हाथ में मोबाइल फोन होता, न वे अन्य सारी सुख-सुविधाएँ जुड़तीं जिनके लिए भारत का मध्यवर्ग तरसता था।
जब अर्थनीति और उसके साथ-साथ सामाजिक परिदृश्य में इतना क्रांतिकारी परिवर्तन आना था तो उसके साथ बहुत सी विसंगतियाँ भी आनी ही थीं। अभी यादा वक्त नहीं गुजरा है, 2010 तक तो देश का मध्यवर्ग मनमोहन सिंह पर मुग्ध था।'
'यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के ऐसे संगीन आरोप तो पिछले डेढ़-दो साल के दौरान ही लगे हैं। ऐसा कैसे हुआ कि जो डॉ. सिंह इतने लम्बे समय तक सदाचार की प्रतिमूर्ति माने जाते थे, अब उन पर ही व्यक्तिगत आरोप लग रहे हैं और उनके इस्तीफे की मांग हो रही है?'
(देशबन्धु में 20 अगस्त 2012 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2012/08/blog-post_19.html


