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ललित सुरजन की कलम से - नक्सली तांडव : नई रणनीति की जरूरत

'छत्तीसगढ़ में नक्सलियों द्वारा शुरु हिंसा का तांडव थमने के कोई आसार नजर नहीं आते

ललित सुरजन की कलम से - नक्सली तांडव : नई रणनीति की जरूरत
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'छत्तीसगढ़ में नक्सलियों द्वारा शुरु हिंसा का तांडव थमने के कोई आसार नजर नहीं आते। 25 मई को बस्तर में कांग्रेस के काफिले पर हमला कर कई वरिष्ठ नेताओं सहित कोई तीस व्यक्तियों को मार देने का जो जघन्य अपराध उन्होंने किया है उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।

यह तय है कि नक्सलवाद अपने प्रारंभिक दौर के सिध्दांतों को पूरी तरह छोड़ एक नई राह पर चला गया है। नक्सली दस्ते जिस दु:साहस के साथ अविचारित हत्याएं कर रहे हैं उससे जाहिर होता है कि वे न सिर्फ छत्तीसगढ़ प्रदेश बल्कि अपने सारे प्रभाव वाले क्षेत्र में आतंक की सत्ता कायम रखना चाहते हैं। महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल और उनके बेटे को जिस नृशंसता से मारा गया, इसका प्रमाण हैं।

आज के ये नक्सली किसी भी तरह से चारू मजूमदार और कनु सान्याल के वारिस नहीं हैं। देश का न्यायतंत्र इन्हें कब, क्या सजा दे पाता पाता है, पता नहीं। लेकिन समय आ गया है जब इनके अमानुषिक कृत्यों पर शाब्दिक निंदा या भर्त्सना करने की औपचारिकता निर्वाह करने से आगे बढ़कर समस्या को जड़मूल से समाप्त करने के बारे में विचार किया जाए।'

(देशबन्धु में 27 मई 2013 को प्रकाशित विशेष सम्पादकीय)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/05/blog-post_26.html


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