ललित सुरजन की कलम से - 'स्मार्ट सिटी' का सपना
स्मार्ट सिटी की चर्चा करते हुए एक भय भी मन में उपजता है। अनेक वर्ष पूर्व इरविंग वालेस का उपन्यास आया था- द आर डाक्यूमेंट

स्मार्ट सिटी की चर्चा करते हुए एक भय भी मन में उपजता है। अनेक वर्ष पूर्व इरविंग वालेस का उपन्यास आया था- द आर डाक्यूमेंट। इसमें बताया गया था कि एक औद्योगिक नगरी में किस तरह हर रहवासी पर कड़ी नज़र रखी जाती थी। इसके बाद बांग्ला के लोकप्रिय लेखक शंकर का उपन्यास- 'सीमाबद्ध' पढऩे मिला। इसमें जिक्र था कि कंपनी के बड़े साहब ने एक अधिकारी को बुलाकर आदेश दिया कि तुम्हारे बूढ़े माँ-बाप को आए तीन दिन हो गए, तुम्हारा ध्यान उनकी तरफ लगा रहेगा तो यहां काम कौन करेगा, उन्हें वापिस भेज दो और इलाज़ के लिए पैसा भेज दिया करो।
क्या हमारी 'स्मार्ट सिटी' में भी कुछ ऐसा ही वातावरण बनेगा? यह डर इसलिए बढ़ जाता है कि स्मार्ट सिटी के साथ-साथ अब देश में प्राइवेट सिटी याने निजी नगरों की अवधारणा भी प्रचलित होने जा रही है। महाराष्ट्र के लवासा को भारत की पहिली प्राइवेट सिटी निरूपित करते हुए उम्मीद की जा रही है कि शीघ्र ही ऐसे कोई तीस निजी नगर खड़े हो जाएंगे।
इनके अलावा औद्योगिक नगरों का भी बखान हो रहा है। मुझे एक औद्योगिक नगर के बारे में पता है कि वहां कोई चालीस साल तक महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित नहीं होने दी गई थी। अगर स्मार्ट सिटी, प्राइवेट सिटी, इंडस्ट्रियल सिटी- सब का रवैय्या यही रहा तो भारत के मजदूर वर्ग को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जनतांत्रिक अधिकार, मानवीय गरिमा आदि के बारे में भूल जाना पड़ेगा। हम उम्मीद करते हैं कि इस पर खुली बहस होगी।
(देशबन्धु में 30 जुलाई 2015 को प्रकाशित)
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