ललित सुरजन की कलम से - चाट भण्डार का जूठा दोना
'जब नया राज्य बना तो हमारे मन में उत्साह था कि प्रदेश में कुछ नई परंपराएं डलेंगी जो भावी पीढ़ियों के पथ-प्रदर्शन में काम आएंगी। लेकिन यह नायाब मौका देखते न देखते गंवा दिया गया

'जब नया राज्य बना तो हमारे मन में उत्साह था कि प्रदेश में कुछ नई परंपराएं डलेंगी जो भावी पीढ़ियों के पथ-प्रदर्शन में काम आएंगी। लेकिन यह नायाब मौका देखते न देखते गंवा दिया गया। प्रदेश के विश्वविद्यालयों में जो मानद उपाधियां दी गईं उसमें यह बात स्पष्ट हुई कि प्रतिभाओं को सम्मानित करने के मामले में हमारी सोच कितनी नीचे चली गई है। पहले राज्योत्सव के समय से ही जो पुरस्कार दिए गए उसमें भी सम्मान के बजाय अवमानना का भाव ही प्रकट हुआ।
एक तो पुरस्कार किनके नाम पर दिए जाएं, इस बारे में ही कोई सुविचारित नीति नहीं बनी। फिर जो चयन समितियां बनाई गईं उनमें भी बेहद चलताऊ तरीके से काम लिया गया। पुरस्कार के लिए आवेदन करने का नियम बना दिया गया वह पहले जितना बेहूदा था आज भी उतना है। अगर चयन समिति में विषय विशेषज्ञ हों तो उनके ज्ञान व विवेक पर निर्णय छोड़ा जाना चाहिए था।
जब सार्वजनिक आवेदन मांगे जाने लगे तो हर कोई अपने आपको सुपात्र मानने लगा। ये 'सुपात्र' फिर इस-उस दरवाजे कैनवासिंग करते घूमने लगे। मतलब एक अरुचिकर स्थिति निर्मित कर दी गई। इतना जैसे पर्याप्त नहीं था तो जूरी के निर्णय को भी सरकारी इशारों पर बदलने के प्रसंग भी सामने आए।'
( देशबन्धु में 19 नवम्बर 2009 को प्रकाशित)
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