ललित सुरजन की कलम से - कुछ साहित्यिक यात्रा संस्मरण
देवतालेजी के घर में मेरा सबसे पहले स्वागत तीन-चार श्वानों ने किया। मालूम पड़ा कि राजनीतिशास्त्र की प्रोफेसर उनकी बेटी कनुप्रिया सड़क पर दुर्दशा को प्राप्त श्वान शावकों को उठा लाती हैं और फिर वे इस छोटे से परिवार के स्थायी सदस्य बन जाते हैं

'देवतालेजी के घर में मेरा सबसे पहले स्वागत तीन-चार श्वानों ने किया। मालूम पड़ा कि राजनीतिशास्त्र की प्रोफेसर उनकी बेटी कनुप्रिया सड़क पर दुर्दशा को प्राप्त श्वान शावकों को उठा लाती हैं और फिर वे इस छोटे से परिवार के स्थायी सदस्य बन जाते हैं।'
'मुझे ध्यान आया कि देवतालेजी पिछले दो-तीन सालों से बकु पंडित पर अक्षर पर्व के लिए संस्मरण भेजने का वायदा कर रहे हैं। ये बकु पंडित भी उनके एक प्रिय श्वान थे, जो दिवंगत हो चुके हैं। खैर! इस स्वागत के बाद कवि का हुक्म हुआ कि हम लोग कुछ देर आंगन के छतनार पेड़ की छाया में बैठें। आदेश का पालन करना ही था। हम लोग भरी दोपहरी उस पेड़ की छाया में बैठकर उनके छोटे से बगीचे की शोभा का आनंद लेते रहे। यह देखकर मजा आया कि उस पेड़ पर पान की दो-तीन बेलें चढ़ी हुई हैं। एक बेल बंगला पान की थी, जो स्वाद में काफी तीखा होता है और एक हल्के पीले रंग वाले नाजुक से कपूरी पान की। एक अच्छी दोपहरी चंद्रकांतजी और बेटी के साथ बीती। बरसों बाद हमने दुनिया जहान की बातें कीं, साथ में खाना खाया, उनकी कुछ नई, कुछ अधूरी कविताएं सुनीं। उनकी नई पुस्तक भी भेंटस्वरूप प्राप्त की और हम दोनों के अजीज़ सुदीप बनर्जी को भावुक मन से याद किया। जब वापिस चलने का समय आया तो मैं पान की दोनों बेलों में से पान तोड़कर स्वाद लेने के मोह से नहीं बच सका।'
(अक्षर पर्व मई 2015 अंक की प्रस्तावना)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2015/05/blog-post.html


