ललित सुरजन की कलम से सिद्धांत बनाम पद
देश में इस समय अघोषित आपातकाल लागू होने की बात भी चर्चाओं में उभरने लगी है।

'यह एक विडंबना ही मानी जाएगी कि इन दिनों जब चालीस साल पहिले लगे आपातकाल का स्मरण अपने-अपने ढंग से किया जा रहा है, तब देश में इस समय अघोषित आपातकाल लागू होने की बात भी चर्चाओं में उभरने लगी है। मैं मानता हूं कि 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद यदि श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस्तीफा दे दिया होता तो मात्र दो सप्ताह बाद उन्हें आपातकाल लगाने जैसा अतिरेकी कदम उठाने की आवश्यकता न पड़ती। अदालत का फैसला सही था या गलत, देश की आंतरिक स्थिति उस समय कैसी थी, इत्यादि प्रश्न हैं जिन पर अलग से चर्चा की जा सकती है, किंतु यह तय है कि इंदिराजी ने तत्काल इस्तीफा न देकर नैतिक दुर्बलता का परिचय दिया था, जिससे उनकी प्रतिष्ठा का ह्रास हुआ। वे अपने किसी विश्वस्त सहयोगी को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंप देतीं तो कुछ समय बाद सर्वोच्च न्यायालय से निर्दोष सिद्ध होने पर वापिस पदासीन हो सकती थीं। यही गलती राजीव गांधी ने दोहराई, जब बोफोर्स की आंच उन तक पहुंचने के बाद वे त्यागपत्र देने का नैतिक साहस नहीं जुटा पाए। इसके तुरंत बाद हरियाणा विधानसभा आदि में पराजय के बावजूद वे अपने पद पर बने रहे, जिसकी दु:खद परिणति 1989 की पराजय में हुई। अगर वे 1987 में मध्यावधि चुनाव में चले जाते तो अपनी खोई प्रतिष्ठा को वापिस पा सकते थे।Ó
(देशबन्धु में 16 जुलाई 2015 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2015/07/blog-post_15.html


