ललित सुरजन की कलम से - राजनीति बनाम व्यापार
'यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि राजनीति और व्यापार दोनों किसी हद तक एक-दूसरे पर आश्रित हैं, इसके बावजूद दोनों के बीच एक अदृश्य रेखा है जिसका उल्लंघन करना अभी हाल तक ठीक नहीं माना जाता था

'यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि राजनीति और व्यापार दोनों किसी हद तक एक-दूसरे पर आश्रित हैं, इसके बावजूद दोनों के बीच एक अदृश्य रेखा है जिसका उल्लंघन करना अभी हाल तक ठीक नहीं माना जाता था।
कोई भी देशकाल हो, व्यापार उसमें एक अनिवार्य गतिविधि की तरह होगा तथा सत्ताधीशों को पूंजीपतियों से समय-असमय सहयोग लेने की भी आवश्यकता होगी। दूसरी तरफ उद्यमी वर्ग अपने कामकाज के लिए बेहतर परिस्थितियां मांगने के लिए सरकार पर जब-तब दबाव और प्रलोभन का भी सहारा लेगा, लेकिन पारंपरिक सोच कहती है कि बात इसके आगे नहीं बढऩा चाहिए।
यही कारण है कि सामान्य तौर पर व्यापारी अपने आपको राजनीति से दूर रखते आया है। चुनावी राजनीति उसे अक्सर रास नहीं आती तथा राजनीति में किसी बड़े पद पर पहुंचने की वह इच्छा भी नहीं रखता। यही कारण है कि हमारे अधिकतर चुने हुए नेता या तो किसान हैं या वकील या अध्यापक या फिर शुद्ध राजनेता।'
(देशबन्धु में 07 मई 2015 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2015/05/blog-post_6.html


