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ललित सुरजन की कलम से अपसंस्कृति के अखबार

भारतीय समाज वैसे तो शायद कभी भी एक अनुशासित समाज उस तरह से नहीं रहा, जैसा चीन, जापान आदि को हम देखते हैं।

ललित सुरजन की कलम से अपसंस्कृति के अखबार
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भारतीय समाज वैसे तो शायद कभी भी एक अनुशासित समाज उस तरह से नहीं रहा, जैसा चीन, जापान आदि को हम देखते हैं। लेकिन इस वक्त जो अराजकता हमारे बीच फैल रही है, वह अभूतपूर्व है। ऐसा एक तो शायद इसलिए हो रहा है कि सार्वजनिक जीवन में हमारे सामने कोई आदर्श व्यक्तित्व नहीं है। पंडित नेहरू के बाद हमारे पास कोई महानायक नहीं बचा है जिसका कि अनुसरण किया जा सके। एक समय जे.पी. इस रिक्त स्थान को भरने के लिए आगे आए थे, लेकिन उन्होंने अराजक लोगों को ही अपने नेतृत्व में इस तरह इक_ा किया कि उससे आगे अराजकता ही बढ़ी। दूसरे, महानायकों का स्थान सार्वजनिक जीवन में आभासी नायकों ने ले लिया है। याने जिनका नायकत्व सिर्फ रूपहले पर्दे पर दिखता है। इस विचित्र समय में विचार और विवेक का स्थान बाजार ने ले लिया है तथा अब हमारा समूचा जीवन उसके ही इंगितों पर संचालित होता है।

10 .07. 2008

पुस्तक- तुम कहॉँ हो जॉनी वाकर

पृष्ठ- 41


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