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ललित सुरजन की कलम से माओवाद बनाम कॉर्पोरेट पूंजी
'मेरा मानना है कि कारपोरेट पूंजी का एक गहरा षड़यंत्र बस्तर सहित देश के उन तमाम हिस्सों में चल रहा है

'मेरा मानना है कि कारपोरेट पूंजी का एक गहरा षड़यंत्र बस्तर सहित देश के उन तमाम हिस्सों में चल रहा है जो प्राकृतिक संपदा के धनी हैं। इन इलाकों से आदिवासी बेदखल होंगे तभी संसाधनों पर पूरी तरह कब्जा करने का उनका मंसूबा पूरा होगा। माओवादी ही नहीं, राजनीतिक दल भी पूंजी के हाथों कठपुतली बनकर खेल रहे हैं। इसके अलावा, यह मैंने पहले भी लिखा है कि हथियारों के सौदागरों की दुकानें तभी चल पाएंगी जब दुनिया में हिंसक उपद्रव होते रहेंगे। आतंकवादी हों या माओवादी या फिर उनसे लड़ने वाले सशस्त्र बल, सबको हथियारों की जरूरत होती है और यह एक भीषण सच्चाई है कि विश्व में सैन्य सामग्री तथा सुरक्षा उपकरणों का व्यापार सबसे ज़्यादा आकर्षक और मुनाफा देने वाले व्यापारों में से एक है। '
(15 मई 2012 को देशबन्धु में प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2012/05/13.html
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