ललित सुरजन की कलम से - एक हाथ से ताली नहीं बजती
'हमें भारतीय जनता पार्टी का दु:ख समझ में आता है। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी तब भाजपा को लगा कि उसने दिल्ली फतह कर ली है और उसे कोई चुनौती देने वाला नहीं है। दुर्भाग्य से 2004 में भाजपा का सपना टूट गया

'हमें भारतीय जनता पार्टी का दु:ख समझ में आता है। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी तब भाजपा को लगा कि उसने दिल्ली फतह कर ली है और उसे कोई चुनौती देने वाला नहीं है। दुर्भाग्य से 2004 में भाजपा का सपना टूट गया।
2009 में उसे दुबारा झटका लगा। अडवानीजी सहित बहुत से नेताओं की प्रधानमंत्री बनने की चाहत अधूरी रह गई। संघ परिवार का भी भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना पूरा नहीं हो सका। भाजपा को विश्वास था कि 2009 में वह निश्चित रूप से सत्ता में वापिस लौटेगी, लेकिन जब यूपीए की लकीर एनडीए से लंबी खिंच गई तो भाजपा ने समझा कि अपनी लकीर बड़ी सिध्द करने का बेहतर उपाय यही है कि सामने वाले की लकीर किसी न किसी तरह छोटी कर दी जाए और इस तरह यूपीए नेतृत्व पर राजनीतिक ही नहीं, व्यक्तिगत आरोप लगाने का सिलसिला शुरू हो गया।'
(देशबन्धु में 24 अक्टूबर 2013 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/10/blog-post_23.html


