ललित सुरजन की कलम से - छत्तीसगढ़ के चार कथाकार
'एक कहानी में काव्यात्मकता हो, गीतात्मकता हो, इसमें किसी को क्या उज्र होने चला? लेकिन कविता और कहानी दोनों स्वतंत्र विधाएं हैं और मेरा मानना है कि दोनों का आविष्कार अलग-अलग जरूरतों को पूरा करने के लिए हुआ है

'एक कहानी में काव्यात्मकता हो, गीतात्मकता हो, इसमें किसी को क्या उज्र होने चला? लेकिन कविता और कहानी दोनों स्वतंत्र विधाएं हैं और मेरा मानना है कि दोनों का आविष्कार अलग-अलग जरूरतों को पूरा करने के लिए हुआ है।
कविता का आस्वाद लेने के लिए एक खास किस्म के मानसिक अवकाश की जरूरत होती है, जबकि कहानी सामान्य तौर पर आपके संग-संग चलती है। बहरहाल रामकुमार के सामाजिक सरोकारों में किसी तरह का द्वंद्व नहीं है।
यह इन कहानियों से स्पष्ट होता है। पहली ही कहानी 'पत्ते की तरह' में नायक अपने पुराने जिए कस्बे में बरसों बाद लौटता है और उसे बस स्टैण्ड के होटल में कभी काम करने वाले नेपाली लड़के की बेसाख्ता याद आती है। एक अन्य कहानी में रोजी-रोटी के लिए पलायन पर मजबूर किसान के मजदूर बनते जीवन की व्यथा मार्मिकता के साथ उभरी है। यहां लेखक कहता है- 'मैं नाटक के शो में एक पात्र का अभिनय करता हुआ-सा ट्रेन से उतर जाता हूं। जीवन के शो में अपने पीपे और गर के साथ सुमारू उतर जाता है।'
(अक्षर पर्व फरवरी 2014 अंक में प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/02/blog-post_25.html


