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ललित सुरजन की कलम से - शिक्षा और परीक्षा

'एक कोई वक्त था जब 31 मार्च तक सारी परीक्षाएं निपट जाती थीं। शालाओं के परीक्षाफल 30 अप्रैल तक और विश्वविद्यालय के मई के दूसरे सप्ताह तक घोषित हो जाते थे

ललित सुरजन की कलम से - शिक्षा और परीक्षा
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'एक कोई वक्त था जब 31 मार्च तक सारी परीक्षाएं निपट जाती थीं। शालाओं के परीक्षाफल 30 अप्रैल तक और विश्वविद्यालय के मई के दूसरे सप्ताह तक घोषित हो जाते थे। विद्यार्थियों को मई-जून दो माह का पूरा अवकाश मिलता था, जिसका सदुपयोग करने के लिए बहुत सी योजनाएं होती थीं।

बहुत से बच्चे अपने गांव या मामा गांव जाते थे, एक नया माहौल जिसमें सीखने के लिए काफी कुछ होता था, जिनको सुविधा होती थी वे देशाटन पर जा सकते थे और कुछ नहीं हुआ तो गर्मी की दोपहरें घर के भीतर परिवार के सदस्यों तथा मित्रों के साथ भांति-भांति के खेल खेलने में बीत जाती थीं।

जिन्हें पढऩे का शौक होता था वे लाइब्रेरी से किताबें लेकर आ जाते थे। यही समय खासकर उत्तर-भारत में शादियों का सीजन होता था तो उसका आनंद भी घराती या बराती बनकर बच्चे उठाते थे।

कुल मिलाकर छुट्टियों के दिन, छुट्टियों की तरह बीतते थे जिसका बेहद मनोरंजक चित्र अजीत कुमार ने अपने लघु उपन्यास 'छुट्टियां' में किया है।'

(देशबंधु में 15 जुलाई 2017 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2017/06/blog-post_14.html


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