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ललित सुरजन की कलम से देशबन्धु : चौथा खंभा बनने से इंकार- 25

अजीत जोगी जिलाधीश का पद सम्हालने रायपुर आए, उसके कुछ माह पहले वे एक अन्य घटना के चलते रायपुर में चर्चित हो गए थे।

ललित सुरजन की कलम से देशबन्धु : चौथा खंभा बनने से इंकार- 25
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'अजीत जोगी जिलाधीश का पद सम्हालने रायपुर आए, उसके कुछ माह पहले वे एक अन्य घटना के चलते रायपुर में चर्चित हो गए थे। रायपुर की एक फुटबॉल टीम किसी टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए वर्ष 1978 में शहडोल गई। वहां किसी कारण से रायपुर के खिलाड़ियों का मेजबान टीम के खिलाड़ियों के साथ झगड़ा हो गया। मारपीट की नौबत आ गई। रायपुर के कुछ खिलाड़ी घायल हो गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। उस समय शहडोल ज़िले के युवा कलेक्टर ने अस्पताल पहुंच कर उन नौजवानों की मिजाजपुर्सी की तथा स्वस्थ होने के बाद उन्हें रायपुर भेजने का प्रबंध किया। यह किस्सा एक रोज मेरे मित्र व लोकप्रिय अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ शंकर दुबे ने सुनाया। उस युवा कलेक्टर का नाम अजीत जोगी था। यह रोचक संयोग था कि कुछ माह बाद उन्हीं जोगी का तबादला रायपुर हुआ। वैसे रायपुर उनके लिए नई जगह नहीं थी। 1967 में वे शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय में व्याख्याता के रूप में कुछ समय तक सेवाएं दे चुके थे। फिर वे 1969 में आईपीएस और उसके एक साल बाद आईएएस के लिए चुन लिए गए। वे जब सन् 2000 में तीसरी बार लौटे तो मुख्यमंत्री के लिए कोई और आलीशान भवन चुनने के बजाय उन्होंने उस सौ साल से अधिक पुराने कलेक्टर बंगले में ही रहना पसंद किया जहां वे पहले लगभग ढाई साल रह चुके थे।'

(देशबन्धु में 26 नवंबर 2020 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/06/blog-post_11.html


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