ललित सुरजन की कलम से - देशबन्धु : चौथा खंभा बनने से इंकार- 21
1967 में लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनाव आखिरी बार साथ-साथ संपन्न हुए थे

1967 में लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनाव आखिरी बार साथ-साथ संपन्न हुए थे। लोकसभा में कांग्रेस को कामचलाऊ बहुमत मिला था, गो कि विधानसभा में सर्वत्र उसे विजय मिली थी। इस दौर में डॉ राममनोहर लोहिया द्वारा दिए गए गैरकांग्रेसवाद के नारे ने सारे विपक्षी दलों को बेहद आकर्षित किया था।
उनके मन में बैठ गया था कि अगर सत्ता सुख भोगना है तो उन सबको कांग्रेस के खिलाफ़ साथ आना ही पड़ेगा। इस सोच के तहत अनेक राज्यों में संविद अर्थात संयुक्त विधायक दल का गठन हुआ। जहां कांग्रेस के खिलाफ़ संख्या बल में कमी थी, वहां दलबदल को प्रोत्साहित किया गया तथा अभूतपूर्व उत्साह के साथ खिचड़ी सरकारें बनाईं गईं।
शेर और बकरी एक घाट पर आ मिले। उत्तर प्रदेश की संविद सरकार में जनसंघ के साथ समाजवादी दल ही नहीं, भाकपा और माकपा के विधायक भी मंत्री बने। भाकपा के झारखंडे राय तथा माकपा के रुस्तम सैटिन के नाम मुझे अभी तक याद हैं।
डॉ लोहिया के इस कांंग्रेस विरोधी प्रयोग की परिणति धुर दक्षिणपंथी जनसंघ/ भाजपा के दिनोंदिन मजबूत होने व समाजवादी तथा साम्यवादी दलों के उसी अनुपात में अशक्त होते जाने में हुई। यह हम और आप आज देख ही रहे हैं।
(देशबन्धु में 29 अक्टूबर 2020 को प्रकाशित)
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