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ललित सुरजन की कलम से दलबदल: गलत कब और क्यों?

'विगत तीस वर्षों में अनेक प्रदेशों में दल-बदल के अनेक कुत्सित प्रयास जनता ने देखे हैं।

ललित सुरजन की कलम से दलबदल: गलत कब और क्यों?
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'विगत तीस वर्षों में अनेक प्रदेशों में दल-बदल के अनेक कुत्सित प्रयास जनता ने देखे हैं। जो बड़े प्रदेश हैं, वहां स्थिति बेहतर है, लेकिन अपेक्षाकृत छोटे प्रदेशों में जहां विधानसभा में निर्वाचित सदस्यों की संख्या कम है, हालात चिंताजनक ही कहे जाएंगे। वर्तमान कानून का सबसे ज्यादा मखौल तो शायद गोवा प्रदेश में किया गया है, जहां मात्र चालीस सदस्यों की विधानसभा है। अभी हाल तक वहां कब कौन सदस्य दल बदल कर किस पार्टी में चला जाए कुछ समझ ही नहीं आता था। एक उदाहरण तो मेरे गृह प्रदेश छत्तीसगढ़ का है, जहां कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने सदन में स्पष्ट बहुमत होते हुए भी भाजपा के बारह विधायकों को तोड़कर कांग्रेस में शामिल कर लिया। इस राजनैतिक चातुरी का खामियाजा आज भी प्रदेश में कांग्रेस पार्टी भुगत रही है। अविभाजित मध्यप्रदेश में भी हमने दर्शक दीर्घा में बैठकर वह तमाशा देखा था जब गुजरात के बागी भाजपा नेता शंकर सिंह वाघेला अपने साथ कितने अन्य बागियों को लेकर खजुराहो में म.प्र. की दिग्विजय सरकार के मेहमान हुए थे।'

'इधर केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने भी मानो तय कर लिया है कि कल तक कांग्रेस ने जो किया, वह हम भी करेंगे। इसमें इतना संशोधन कर देना उचित होगा कि जो रास्ता पहले-पहल भाजपा ने दिखाया, मसलन म.प्र. में श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के संरक्षण में, वही रास्ता कांग्रेस ने अपनाया और आगे बढ़ते हुए भाजपा पुन: अपने पुराने मार्ग पर आ गई है।'

(देशबन्धु में 28 अप्रैल 2016 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/05/blog-post.html


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