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ललित सुरजन की कलम से- स्वच्छ प्रशासन की चिंता

'देश की जनता को अपने अफसरों से यह सवाल करना चाहिए कि आप तो लोक सेवक हैं; जो भी सरकारी संस्थाएं हैं वे ठीक से काम करें यह देखना आपकी अपनी जिम्मेदारी है

ललित सुरजन की कलम से- स्वच्छ प्रशासन की चिंता
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'देश की जनता को अपने अफसरों से यह सवाल करना चाहिए कि आप तो लोक सेवक हैं; जो भी सरकारी संस्थाएं हैं वे ठीक से काम करें यह देखना आपकी अपनी जिम्मेदारी है। फिर ऐसा क्यों है कि आप अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ने नहीं भेजते; आपके घर में कोई बीमार पड़ता है तो आप सरकारी अस्पताल नहीं जाते, आप सार्वजनिक यातायात का कभी उपयोग नहीं करते; फिर अगर ये संस्थाएं ठीक से काम न करें तो इसमें दोष किसका है?

सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश के पीछे भावना सही हो सकती है, लेकिन अगर एक अफसर एक ही जगह पर दो साल से तैनात है तो इस बात की क्या गारंटी है कि वह ईमानदारी के साथ अपना काम करेगा। अगर वह भ्रष्ट और अक्षम है तो क्या उसे दो साल तक अपनी गलतियां दोहराते जाने का अवसर दिया जाना चाहिए? दरअसल इस पूरे मामले को एक दूसरे धरातल पर देखने की जरूरत है।'

'देश की चुनावी राजनीति में अभिजात समाज का दबदबा कम हुआ है और वे साधारण लोग तेजी से सामने आए हैं तो कल तक सिपाही व पटवारी से भी डरते थे। इन्हें प्रशासन का वांछित अनुभव नहीं है, जबकि अधिकारी अभी भी ज्यादातर अभिजात समाज से आते हैं।'

(देशबन्धु में 7 नवम्बर 2013 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/11/blog-post.html


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